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Carbon Emissions: भारत का हरित आवरण उत्सर्जन से अधिक कार्बन सोखता है; IISER बोला- सदाबहार जंगल की अहम भूमिका
Mon, 17 Feb 2025 02:13 AM IST
दीपक कुमार शर्मा
एजेंसी, मुंबई
एजेंसी, मुंबई
Published by: दीपक कुमार शर्मा
Updated Mon, 17 Feb 2025 02:13 AM IST
सार
यह खुलासा भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (आईआईएसईआर) भोपाल के वैज्ञानिकों के अध्ययन में हुआ है। यह अध्ययन जलवायु परिवर्तन को रोकने में वनस्पतियों यानी पेड़-पौधों के अहम योगदान को दिखाता है।
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कार्बन डाइऑक्साइड, प्रदूषण (सांकेतिक तस्वीर)
- फोटो : freepik.com
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विस्तार
भारत का हरित आवरण सालाना वातावरण में उत्सर्जन करने से अधिक कार्बन सोखता है, लेकिन सूखे जैसी चरम जलवायु घटनाओं में पेड़-पौधों की कार्बन अवशोषण करने की क्षमता कम हो जाती है। यह खुलासा भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (आईआईएसईआर) भोपाल के वैज्ञानिकों के अध्ययन में हुआ है। यह अध्ययन जलवायु परिवर्तन को रोकने में वनस्पतियों यानी पेड़-पौधों के अहम योगदान को दिखाता है।
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मैक्स प्लैंक पार्टनर ग्रुप जर्मनी की प्रमुख और आईआईएसईआर भोपाल की पृथ्वी एवं पर्यावरण विज्ञान विभाग की प्रमुख सहायक प्रोफेसर धन्यलक्ष्मी पिल्लई कहती हैं कि पेड़-पौधे प्रकाश-संश्लेषण के दौरान कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ2) को वातावरण से अवशोषित करते हैं और श्वसन के माध्यम से इसे वापस छोड़ते हैं। इन दोनों प्रक्रियाओं के बीच के संतुलन को नेट इकोसिस्टम एक्सचेंज (एनईई) कहा जाता है। अगर एनईई सकारात्मक है, तो इसका मतलब है कि पौधे वातावरण में अधिक कार्बन छोड़ रहे हैं। अगर एनईई नकारात्मक है, तो इसका मतलब है कि वे अधिक कार्बन संग्रहित कर रहे हैं।
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बीते एक दशक में पेड़-पौधों ने सालाना सोखा वातावरण से 38 से 53 करोड़ टन कार्बन
पिल्लई के मुताबिक, पिछले 10 वर्षों में भारत में पेड़-पौधों वातावरण से 38 से 53 करोड़ टन कार्बन हर साल अवशोषित कर रही हैं, जो उनके उत्सर्जन से अधिक है। वही, अध्ययन की सह-लेखिका अपर्णा रवि ने कहा कि यह कार्बन अवशोषण दर प्रभावशाली है, लेकिन जब जलवायु परिवर्तन के कारण चरम मौसम घटनाएं होती हैं, तो यह दर घटने लगती है। इससे साबित होता है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने में वनस्पतियों की महत्वपूर्ण भूमिका है।
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सदाबहार जंगल सीओ2 सोखने में हैं नंबर वन
शोधकर्ताओं ने भारत के अलग-अलग तरह के प्रकार के वनस्पति क्षेत्रों में सीओ2 अवशोषण की दर का भी अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि सदाबहार जंगल सीओ2 अवशोषित करने में सबसे अधिक सक्षम हैं। लेकिन पतझड़ वाले जंगल खासकर मध्य भारत में,वातावरण में अधिक कार्बन छोड़ते हैं क्योंकि वहां पौधों की श्वसन क्रिया उनकी प्राथमिक उत्पादकता से अधिक होती है। डॉ पिल्लई के अनुसार, मध्य भारत के पतझड़ वाले जंगल हर साल लगभग 21 करोड़ टन कार्बन छोड़ते हैं। इससे वे कार्बन कार्बन संग्रहकर्ता की जगह इसका स्रोत बन जाते हैं। दूसरी तरफ खेती योग्य भूमि प्रति वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में जंगलों की तुलना में कम कार्बन अवशोषित करती हैं, लेकिन भारत में बहुत बड़े क्षेत्र में फैले होने से ये वातावरण से काफी मात्रा में सीओ2 हटाने में मदद करती हैं।अध्ययन में यह भी पाया गया कि वनस्पतियों में कार्बन अवशोषण हमेशा एक जैसा नहीं रहता। हाल के वर्षों में यह दर घट रही है,खासकर सूखे के दौरान।