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Tamil Nadu: मद्रास हाईकोर्ट ने सेना के अधिकारी की सजा को किया रद्द, मांस खरीद में अनियमितता का था आरोप
Thu, 05 Oct 2023 07:44 AM IST
यशोधन शर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चेन्नई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चेन्नई
Published by: यशोधन शर्मा
Updated Thu, 05 Oct 2023 07:44 AM IST
सार
न्यायाधीश ने कहा कि रिकॉर्ड से एक गवाह ने बताया था कि 6 फरवरी, 1988 तक विभिन्न तिथियों पर डिब्बाबंद कीमा की आपूर्ति और वितरण जारी रहा।
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मद्रास हाई कोर्ट
- फोटो : सोशल मीडिया
विस्तार
मद्रास उच्च न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें साल 1987 को श्रीलंका में तैनात तत्कालीन भारतीय शांति सेना (आईपीकेएफ) के सैनिकों के लिए डिब्बा बंद मांस की खरीद में कुछ कथित अनियमितताओं के लिए एक सैन्य अधिकारी को दोषी ठहराया गया था और दो साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी।
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न्यायमूर्ति जी जयचंद्रन ने हाल ही में मेजर जनरल एके गुप्ता की अपील की अनुमति देते हुए सीबीआई मामलों के लिए XIV अतिरिक्त न्यायालय के मई 2013 के आदेश को रद्द कर दिया।
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न्यायाधीश ने कहा कि रिकॉर्ड से एक गवाह ने बताया था कि 6 फरवरी, 1988 तक विभिन्न तिथियों पर डिब्बाबंद कीमा की आपूर्ति और वितरण जारी रहा।
खरीदी का था सामूहिक निर्णय
उन्होंने स्वीकार किया कि वस्तुओं की खरीद शीर्ष गुप्त थी और सैनिकों की आवाजाही, खाद्य पदार्थों की आपूर्ति की जा रही थी। उपरोक्त साक्ष्यों से यह स्पष्ट था कि खरीदी का निर्णय अभियुक्तों की एकतरफा कार्रवाई नहीं थी, बल्कि यह एक सामूहिक निर्णय था।
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सेना का विनियमन स्थानीय खरीद पर रोक नहीं लगाता है और आईपीकेएफ की कार्रवाई के चरम के दौरान एक निजी कंपनी से मांस खरीदा गया था।
अभियोजन पक्ष ने यह दिखाने के लिए कोई सामग्री नहीं रखी है कि कंपनी से डिब्बाबंद मांस की खरीद अधिक मात्रा में की गई थी और आईपीकेएफ के लिए इसकी आवश्यकता नहीं थी।
न्यायाधीश ने कहा, ट्रायल कोर्ट ने केवल भारत में आपूर्ति डिपो में स्टॉक की स्थिति का उल्लेख किया है, न कि श्रीलंका में सैनिकों की आवश्यकता के लिए, जिसके लिए खरीदारी की गई थी।
ऑपरेशन पवन चालने का सौंपा था काम
अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष के गवाह लेफ्टिनेंट जनरल दीपिंदर सिंह, जिन्हें श्रीलंका में 'ऑपरेशन पवन' चलाने का काम सौंपा गया था और यह भी सुनिश्चित किया गया था कि आईपीकेएफ सैनिकों को कपड़े और भोजन समय पर मिले।
LTTE और श्रीलंकाई सेना को एक-दूसरे से लड़ने से रोकने के लिए भेजी गई सेना को LTTE ने लड़ाई में खींच लिया, जिससे भारतीय सेना को सैनिकों की संख्या बढ़ाने और परिणामस्वरूप आपूर्ति की आवश्यकता में वृद्धि करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
अधिकांश निर्णय लिए गए मौखिक
जज ने यह भी बताया था कि गोपनीयता बनाए रखने के लिए अधिकांश निर्णय मौखिक रूप से लिए गए थे। इसलिए, इस न्यायालय का विचार है कि सामग्री के साथ काट-छांट की गई और पूरी तरह से रखी गई सामग्रियों की जांच किए बिना, जांच अधिकारी ने अंतिम रिपोर्ट दायर की थी और अभियोजन पक्ष के दो गवाहों के साक्ष्य पर बहुत अधिक भरोसा किया था, जो इस मामले में जांच अधिकारी थे।
न्यायाधीश ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने बिना कारण बताए अपीलकर्ता को दोषी ठहराया था कि अभियोजन के सबूतों को क्यों नजरअंदाज किया गया, जबकि गवाहों ने स्वीकार किया कि मांस की आपूर्ति की गई थी और कंपनी द्वारा दी गई कीमत सबसे कम थी।
उन्होंने कहा कि सबूत के आधार पर, यह अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि अभियोजन पक्ष संदेह से परे आरोपों को साबित करने में विफल रहा है। इसलिए, संदेह का लाभ अपीलकर्ता को दिया गया और ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया।