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Bombay HC: 'अदालत मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकती...', कोर्ट ने बेटियों को नियुक्त किया बुजुर्ग पिता का अभिभावक
Wed, 21 May 2025 04:11 PM IST
निर्मल कांत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई।
Published by: निर्मल कांत
Updated Wed, 21 May 2025 04:11 PM IST
सार
Bombay HC: बॉम्बे हाई कोर्ट ने दो बेटियों को उनके 73 वर्षीय पिता का अभिभावक नियुक्त किया, जो दिल का दौरा पड़ने के बाद दिमागी चोट के कारण बिस्तर पर पड़े हैं और अपनी देखभाल नहीं कर सकते। कोर्ट ने यह फैसला पैरेन्स पेट्रिए के तहत लिया, जिसमें कहा गया कि अदालत उन लोगों की रक्षा करती है जो अपनी रक्षा नहीं कर सकते।
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बंबई उच्च न्यायालय
- फोटो : एएनआई (फाइल)
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विस्तार
बॉम्बे हाई कोर्ट ने दो बेटियों को उनके 73 वर्षीय पिता का अभिभावक नियुक्त किया है, जो दिल का दौरा (कार्डियक अरेस्ट) के दौरान दिमागी चोट (ब्रेन इंजरी) के कारण बिस्तर पर पड़े हैं और अपनी देखभाल नहीं कर सकते। जस्टिस अभय आहूजा की बेंच ने 8 मई को दिए आदेश में कहा कि ऐसी परिस्थितियों में अदालत मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकती।
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हाई कोर्ट करते हैं 'पैरेन्स पेट्रिए' अधिकार का इस्तेमाल
हाई कोर्ट ने पाया कि बुज़ुर्ग मानसिक बीमारी से पीड़ित हैं और खुद की देखभाल या अपनी संपत्ति संभालने में अक्षम हैं। इसलिए कोर्ट ने बेटियों को उनका अभिभावक नियुक्त किया। जस्टिस आहूजा ने कहा, देश के हाई कोर्ट 'पैरेन्स पेट्रिए' (ऐसा कानूनी सिद्धांत जिसमें कोर्ट उन लोगों की रक्षा करती है, जो अपनी रक्षा नहीं कर सकते) अधिकार का उपयोग करती हैं। जीवन की ऐसी वास्तविक स्थितियों में अदालतें चुप नहीं रह सकतीं।
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दिल का दौरा पड़ने से बुजुर्ग को ब्रेन इंजरी
याचिका के मुताबिक, 2024 में दिल का दौरा पड़ने के कारण बुजुर्ग को दिमागी चोट लगी, जिससे दिमाग को ऑक्सीजन और खून की आपूर्ति नहीं मिल पाई। इसके कारण वह आधे बेहोशी की हालत में हैं और आज तक बिस्तर पर हैं। याचिका में कोर्ट से अनुरोध किया गया था कि पिता की देखभाल के लिए बेटियों को अभिभावक नियुक्त किया जाए, क्योंकि वह न तो बात कर सकते हैं और न ही अपनी बुनियादी जरूरतों की देखभाल कर सकते हैं।
याचिका में किया गया था बदलाव
शुरुआत में याचिका संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 के तहत दायर की गई थी, जो केवल नाबालिग बच्चों के लिए अभिभावक नियुक्त करने की अनुमति देता है। बाद में याचिका को बदलाव कर 'लेटर्स पेटेंट' के नियम 17 के तहत दायर किया गया, जिसमें हाई कोर्ट को 'बच्चों, मंदबुद्धियों और पागलों' के मामलों में अधिकार दिए गए हैं। 'लेटर्स पेटेंट' एक विशेष कानून है, जिसके तहत हाई कोर्ट को कुछ मामलों में विशेष अधिकार मिलते हैं, और यह सामान्य कानून से ऊपर होता है।
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'मानसिक बीमारी में सामान्य जीवन नहीं जी पाता व्यक्ति'
हाई कोर्ट ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम के अनुसार मानसिक बीमारी वह स्थिति होती है जिसमें सोचने-समझने की क्षमता काफी हद तक प्रभावित होती है, जिससे व्यक्ति सामान्य जीवन नहीं जी पाता। कोर्ट ने पाया कि व्यक्ति कोई भी निर्णय नहीं ले सकता, उन्हें हर वक्त देखभाल की जरूरत है। कोर्ट ने कहा कि यह मंदबुद्धि का मामला नहीं है, बल्कि यह मानसिक बीमारी का मामला है, जो दिल का दौरा पड़ने के बाद हुई है। जस्टिस आहूजा ने कहा, पागलपन का मतलब है ऐसा मानसिक असंतुलन जो व्यक्ति को सामान्य जीवन के फैसले लेने में अक्षम बना दे। ऐसे मामलों में हाई कोर्ट को कानून के तहत व्यक्ति और उसकी संपत्ति पर अधिकार होता है।