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Supreme Court: जस्टिस वर्मा के खिलाफ FIR की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार; सुप्रीम कोर्ट ने कही ये बात

Wed, 21 May 2025 09:47 PM IST
शिव शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: शिव शुक्ला Updated Wed, 21 May 2025 09:47 PM IST
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Supreme Court Updates: Hearing on petition seeking FIR against Justice Verma refused
सुप्रीम कोर्ट (फाइल) - फोटो : ANI

नकदी बरामदगी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायमूर्ति वर्मा पर जांच रिपोर्ट राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भेजी गई है। न्यायमूर्ति अभय एस ओका की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिकाकर्ता से कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर करने से पहले प्रधानमंत्री और भारत के राष्ट्रपति को अपना प्रतिनिधित्व दाखिल करें। पीठ ने याचिका खारिज करने से पहले कहा,  पहले उन अधिकारियों के समक्ष प्रतिनिधित्व दाखिल करें जो उन्हें कार्रवाई करने के लिए कह रहे हैं, फिर परमादेश की मांग करते हुए रिट दाखिल करें।  यह मामला आग लगने के बाद उनके सरकारी आवास से बड़ी मात्रा में जले हुए पैसे बरामद होने का है। 

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गेटवे ऑफ इंडिया के पास यात्री जेटी और टर्मिनल सुविधाओं के निर्माण पर रोक लगाने के मामले में होगी सुप्रीम सुनवाई
वहीं, सुप्रीम कोर्ट बॉम्बे हाई कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ याचिका पर सुनवाई करने के लिए सहमत हो गया है, जिसमें गेटवे ऑफ इंडिया के पास यात्री जेटी और टर्मिनल सुविधाओं के निर्माण पर रोक लगाने से इनकार कर दिया गया था। निवासियों द्वारा हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ कोर्ट में याचिका दायर करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई अगले सप्ताह के लिए टाल दी है।

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आईएएस अधिकारियों से आईएफएस अधिकारियों की समीक्षा कराने का मध्य प्रदेश सरकार का आदेश खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को मध्य प्रदेश सरकार के उस आदेश को अवमाननापूर्ण करार दिया और उसे रद्द कर दिया जिसमें भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को राज्य में भारतीय वन सेवा के अधिकारियों की प्रदर्शन मूल्यांकन रिपोर्टों की समीक्षा करने का निर्देश दिया गया था। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ उन याचिकाओं पर विचार कर रही थी, जिनमें पूछा गया था कि क्या भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) अधिकारी आईएफएस अधिकारियों के लिए रिपोर्टिंग, समीक्षा और स्वीकृति प्राधिकारी हैं। शीर्ष अदालत ने कहा कि यह सरकारी आदेश (जीओ) सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पूरी तरह उल्लंघन है। हमें यह मानने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि विवादित सरकारी आदेश की प्रकृति अवमाननापूर्ण है, क्योंकि यह सरकारी आदेश इस न्यायालय के 22 सितम्बर, 2000 के आदेशों का उल्लंघन है और इसे इस न्यायालय से स्पष्टीकरण/संशोधन मांगे बिना ही जारी कर दिया गया है। 22 सितम्बर, 2000 को सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक के पद तक के अधिकारियों के लिए रिपोर्टिंग प्राधिकारी वन विभाग में तत्काल वरिष्ठ अधिकारी होना चाहिए। पीठ ने कहा कि वह इस तरह के सरकारी आदेश जारी करने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू कर सकती थी, लेकिन हम ऐसा करने से खुद को रोक रहे हैं। उक्त सरकारी आदेश इस अदालत के निर्देशों का उल्लंघन है, इसलिए इसे रद्द किया जाना चाहिए और इसे दरकिनार किया जाना चाहिए।
 
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सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के मामले में व्यक्ति को बरी किया
सुप्रीम कोर्ट ने 2016 के एक हत्या मामले में एक व्यक्ति को आजीवन कारावास की सजा सुनाने के निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए उड़ीसा उच्च न्यायालय का आदेश खारिज कर दिया है। न्यायालय ने कहा कि साक्ष्य उसे दोषी ठहराने के लिए निर्णायक नहीं थे। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ उड़ीसा उच्च न्यायालय के अप्रैल 2024 के आदेश के खिलाफ अपील पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता पद्मन बिभार को 4 अप्रैल, 2016 को अपनी पत्नी के चचेरे भाई की हत्या के लिए एक ट्रायल कोर्ट के दोषी ठहराए जाने के बाद आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी।

पीठ ने कहा कि इस मामले में अपीलकर्ता के खिलाफ एकमात्र सबूत यह है कि वे दोनों आखिरी बार एक साथ देखे गए थे। मकसद का सबूत हमें अपीलकर्ता के खिलाफ प्रतिकूल परिस्थिति होने के लिए संतुष्ट नहीं करता है, क्योंकि अगर अपीलकर्ता को अपनी पत्नी के बारे में कोई संदेह था, तो उसने अपनी पत्नी के चचेरे भाई के बजाय अपनी पत्नी को चोट पहुंचाई होगी या नुकसान पहुंचाया होगा, जिसके साथ उसकी कोई दुश्मनी नहीं थी।

इसमें कहा गया कि अपराध का कथित हथियार, मृतक के सिर को तोड़ने के लिए इस्तेमाल किया गया पत्थर और शव बिभर की निशानदेही पर बरामद नहीं किया गया और न ही उसने अपना अपराध स्वीकार किया। शर्ट और पत्थर पर मानव रक्त पाया गया था, लेकिन रक्त समूह का मिलान नहीं हुआ। न्यायालय ने कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से संदेह पैदा होता है कि बिभर ने हत्या की हो सकती है, लेकिन यह इतना निर्णायक नहीं है कि उसे केवल अंतिम बार एक साथ देखे जाने के साक्ष्य के आधार पर दोषी ठहराया जा सके। पीठ ने कहा कि हम उच्च न्यायालय और निचली अदालत द्वारा दी गई सजा को खारिज करते हैं और अपीलकर्ता को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या) और 201 (साक्ष्य मिटाने) के तहत आरोपों से बरी करते हैं।
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