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हाथरस कांड: सुप्रीम कोर्ट में नई याचिका दायर, पुलिस पर एससी-एसटी नियम के तहत मामला दर्ज करने की मांग

Wed, 14 Oct 2020 02:16 PM IST
अमर शर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अमर शर्मा Updated Wed, 14 Oct 2020 02:16 PM IST
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Hathras Case: New PIL filed in Supreme Court for registering case against police, officials under SC-ST Act and investigation by STF
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : For Reference Only
हाथरस मामले में सुप्रीम कोर्ट में एक नई जनहित याचिका दायर की गई है जिसमें घटना से जुड़े पुलिसकर्मियों, चिकित्सा कर्मचारियों और अन्य सरकारी अधिकारियों के खिलाफ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचारों से संरक्षण) कानून के तहत आपराधिक मामला दर्ज करने की मांग की गई है। इसके साथ ही याचिका में एक विशेष कार्य बल (एसटीएफ) का गठन कर मामले की जांच कराए जाने की भी मांग की गई है। अदालत इस याचिका पर 15 अक्तूबर को सुनवाई कर सकती है। 
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बात दें कि हाथरस की घटना ने देश को हिला कर रख दिया था जिसमें एक दलित लड़की के साथ कथित तौर पर बलात्कार किया गया और उसे आई गंभीर चोटों की वजह से उसकी मौत हो गई थी। 
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यह जनहित याचिका महाराष्ट्र के दलित अधिकारों के कार्यकर्ता चेतन जनार्द्धन कांबले ने दायर की है। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश (उप्र) सरकार द्वारा एक अन्य जनहित याचिका में दाखिल हलफनामे से ‘हाथरस सामूहिक बलात्कार और हत्या मामले में गड़बड़ी करने और साक्ष्य नष्ट करने में शासकीय समर्थन’ के बारे में कुछ ज्वलंत तथ्य सामने आने के बाद वह यह जनहित याचिका दायर करने के लिये बाध्य हुए हैं। 
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याचिका में कहा गया है कि मीडिया की खबरों में जो अटकलें लगाई जा रही थी कि सरकारी अस्पतालों द्वारा तैयार मेडिकल रिपोर्ट में लीपा-पोती और आरोपी व्यक्तियों को संरक्षण देने के इरादे से पीड़ित के परिवार की आपत्तियों के बावजूद पुलिसकर्मियों द्वारा उसका रात में ही अंतिम संस्कार कर दिया गया, अब उनका राज्य सरकार के जवाबी हलफनामे और इसके साथ संलग्न दस्तावेजों से खुलासा हुआ है। 

अधिवक्ता विपिन नायर के माध्यम से दायर याचिका में कहा गया है कि इस घटना ने समाज को झकझोर कर रख दिया है कि, "किस तरह से सरकारी तंत्र ने आरोपियों के लिए पूरा संरक्षण सुनिश्चित करने के लिए साक्ष्यों के साथ हेराफेरी की और उन्हें नष्ट करने सहित सभी तरह के प्रयासों का सहारा लिया, इसकी वजह उसे ही पता होगी।" 

याचिका के अनुसार, "तथ्यों से इस अपराध के संबंध में आरोपियों को बचाने और साक्ष्यों को नष्ट करने में उप्र पुलिस और राज्य सरकार की मशीनरी के कतिपय अधिकारियों की संलिप्तता और मिलीभगत के साफ संकेत मिलते हैं।" 

शीर्ष अदालत ने हाथरस में एक दलित लड़की से कथित बलात्कार और बाद में उसकी मृत्यु की घटना को छह अक्टूबर को बेहद ‘लोमहर्षक’ और ‘हतप्रभ’ करने वाली बताते हुए कहा था कि वह इसकी सुचारू ढंग से जांच सुनिश्चित करेगा।

न्यायालय ने इसके साथ ही उप्र सरकार से आठ अक्टूबर तक हलफनामे पर यह जानना चाहा है कि घटना से संबंधित गवाहों का संरक्षण किस तरह हो रहा है। 

उप्र सरकार ने इस मामले में पहले दाखिल किए हलफनामे में इसकी जांच शीर्ष अदालत की निगरानी में केंद्रीय एजेंसी से कराने का आदेश देने का अनुरोध किया था। 

केंद्र ने इस घटना की जांच सीबीआई को सौंपने का उप्र सरकार का अनुरोध स्वीकार कर लिया था। इसके बाद सीबीआई ने नया मामला दर्ज करके अपनी जांच शुरू कर दी है।

हाथरस के एक गांव में 14 सितंबर को 19 वर्षीय दलित लड़की से अगड़ी जाति के चार लड़कों ने कथित रूप से बलात्कार किया था। इस लड़की की 29 सितंबर को दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में इलाज के दौरान मृत्यु हो गई थी।

पीड़ित की 30 सितंबर को रात के अंधेरे में उसके घर के पास ही अंत्येष्टि कर दी गई थी। उसके परिवार का आरोप है कि स्थानीय पुलिस ने जल्द से जल्द उसका अंतिम संस्कार करने के लिए मजबूर किया। स्थानीय पुलिस अधिकारियों का कहना था कि परिवार की इच्छा के मुताबिक ही अंतिम संस्कार किया गया।

इस घटना को लेकर कई व्यक्तियों, गैर सरकारी संगठनों और वकीलों ने न्यायालय में अनेक जनहित याचिकायें दायर कर इसकी निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच कराने का अनुरोध किया है। इस मामले में हस्तक्षेप के लिए भी कई आवेदन दाखिल किए गए हैं।

इस नई याचिका में आरोप लगाया गया है कि अलीगढ़ स्थित सरकारी अस्पताल ने पीड़ित के स्वैब के नमूने नहीं लिए और न ही उसने पीड़िता के शरीर के जख्मों को देखने के बावजूद फटे हुए कपड़ों और अंत:वस्त्रों पर खून के निशान और उसके कपड़े बदले जाने के बाद ड्रापशीट को एकत्र किया। यही नहीं, अस्पताल ने इस घटना के बाद आठ दिन तक वीर्य के परीक्षण का इंतजार किया और उस समय तक कोई फारेंसिक साक्ष्य मिलने ही नहीं थे।

याचिका में कहा गया है कि इस मामले की जांच पूरी होने से पहले ही राज्य के उच्च स्तर के पुलिस अधिकारियों और सरकारी अधिकारियों ने बलात्कार की संभावना से इंकार कर दिया और इस बारे में सार्वजनिक बयान भी दिए। इससे राज्य की पुलिस और आरोपियों के बीच सांठगांठ का साफ संकेत मिलता है।

याचिका में कहा गया है कि पुलिस अधिकारियों ने जिस तरह रात के अंधेरे में पीड़ित के शव का अंतिम संस्कार किया उससे भी इस अपराध की जांच करने की बजाए इसे रफा दफा करने में उनकी संलिप्तता की बू आती है।

याचिका में सीबीआई और उप्र पुलिस को अलग रखते हुए इस घटना की विशेष कार्य बल से जांच कराने का निर्देश देने और पुलिस, अस्पताल के स्टाफ तथा सरकारी अधिकारियों के खिलाफ एससी-एसटी कानून के तहत आपराधिक मामला दर्ज करने का निर्देश देने का भी अनुरोध किया गया है।


याचिका में केंद्र और राज्य सरकार को पीड़ित और उसके रिश्तेदारों के 14 और 19 सितंबर को दर्ज बयानों की वीडियो रिकार्डिंग और सफदरजंग अस्पताल द्वारा पोस्टमार्टम के दौरान एकत्र साक्ष्यों सहित सारे साक्ष्य जमा कराने का निर्देश देने का भी अनुरोध किया गया है।
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