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हरियाणा के कांग्रेसियों को एकजुट नहीं कर पाईं सोनिया गांधी, नेताओं की एकला चलो मुहिम 

Tue, 01 Oct 2019 01:56 AM IST
संदीप भट्ट जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली Published by: संदीप भट्ट Updated Tue, 01 Oct 2019 01:56 AM IST
सार

  • हरियाणा में कांग्रेस पार्टी अभी तक खुद की कलह से ही बाहर नहीं निकल पा रही 
  • सोनिया गांधी की सीख भी हरियाणा के कांग्रेसियों को एकजुट नहीं कर सकी
  • कांग्रेसियों की यह नीति पार्टी के लिए आत्मघाती सिद्ध हो सकती है

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Haryana assembly election Sonia Gandhi could not unite Haryana Congress leaders
Sonia Gandhi - फोटो : File Photo

विस्तार

हरियाणा विधानसभा के चुनावी रण में भाजपा ने अपने उम्मीदवार उतार दिए हैं तो दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी अभी तक खुद की कलह से ही बाहर नहीं निकल पा रही है। सोनिया गांधी की सीख भी हरियाणा के कांग्रेसियों को एकजुट नहीं कर सकी।

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उनके हस्तक्षेप के बाद पार्टी को नया अध्यक्ष मिल गया, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी भी नए व्यक्ति को दे दी गई, चुनावी घोषणा पत्र तैयार करने और प्रचार की जिम्मेदारी अलग- अलग नेताओं को थमा दी, मगर पार्टी में गुटबाजी कम होने का नाम ही नहीं ले रही।
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 चुनाव में अब महज बीस दिन शेष बचे हैं, लेकिन कांग्रेस में खुद को मुख्यमंत्री पद के दावेदार बताने वाले बड़े नेता अभी तक एकला चलो की राह पर हैं। प्रदेश की राजनीति की नब्ज पहचानने वालों का कहना है कि कांग्रेसियों की यह नीति पार्टी के लिए आत्मघाती सिद्ध हो सकती है।
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बता दें कि हरियाणा कांग्रेस में लंबे समय से चल रही गुटबाजी खत्म करने के लिए पिछले दिनों कांग्रेस पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने प्रदेश के नेताओं की बैठक ली थी। प्रदेश में पार्टी की कमान संभाल रहे अशोक तंवर को उनके पद से हटाकर कुमारी शैलजा को कांग्रेस पार्टी का प्रदेशाध्यक्ष बना दिया गया।

हालांकि, इससे पहले पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने खुद के बागी होने का संकेत पार्टी हाईकमान को दे दिया था। इसके बाद सोनिया गांधी ने प्रदेश में कांग्रेस के सभी खेमों को एक करने के लिए नए सिरे से कार्यकारिणी का गठन किया।

इसमें सभी खेमों को कोई न कोई जिम्मेदारी दे दी गई। सोनिया गांधी को उम्मीद थी कि उनके इस कदम से प्रदेश कांग्रेस के नेता एकजुट होकर चुनाव लड़ेंगे। अब हालत यह हो गई है कि कुमारी शैलजा और भूपेंद्र सिंह हुड्डा जहां पर कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं, वहां दूसरे खेमें के नेता नहीं पहुंच रहे। सभी खेमें एक बार फिर एकला चलों की नीति पर हैं। हुड्डा और शैलजा ने रोहतक में कांग्रेस कार्यकर्ताओं की बैठक ली तो वहां किरण चौधरी, अशोक तंवर और कैप्टन अजय यादव नहीं पहुंचे।

इसके बाद गुरुग्राम में हुई बैठक के दौरान भी ये तीनों नेता नदारद रहे। रेवाड़ी महेंद्रगढ़ के कार्यकर्ताओं का सम्मेलन हुआ तो वहां भी वही स्थितिदेखने को मिली। खास बात है कि हुड्डा शैलजा की इन बैठकों में पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्त रणदीप सुरजेवाला भी नहीं दिखे।

कांग्रेस के लिए आत्मघाती तो भाजपा का फायदा ही फायदा

प्रदेश की राजनीति के जानकार चंद्रप्रकाश का कहना है कि कांग्रेस पार्टी के लिए यह चुनाव आसान नहीं है। जहां एक ओर चुनाव में अब महज बीस दिन शेष बचे हैं तो दूसरी ओर कांग्रेस की खेमेबाजी जोरों पर है। न ही प्रदेशों के नेताओं के बयानों में ही कोई एकता दिख रही है और न ही कार्यकर्ता सम्मेलनों में उनकी एकजुटता नजर आ रही है। प्रदेश कांग्रेस में भारी गुटबाजी है। पूर्व सीएम स्व. भजनलाल का कुनबा भी अलग ही राह पर है।

सभी अपने परिजनों के लिए टिकट मांग रहे हैं, लेकिन पार्टी की एकजुटता की राह पर कोई भी नेता चलने को तैयार नहीं। मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में भाजपा ने जिस तरह से 78 मजबूत उम्मीदवारों की पहली सूची जारी की है, वह कांग्रेस के लिए सबक का काम कर सकती है। वजह, इस सूची में भाजपा ने जिन चेहरों को शामिल किया है, वहां पार्टी में अंदरुनी स्तर पर कोई विरोध नहीं है। यह तय है कि कांग्रेस की खेमेबाजी खुद के लिए आत्मघाती तो भाजपा के लिए फायदेमंद साबित होगी।

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