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गुजरात चुनाव में क्या हार्दिक पटेल बन पाएंगे किंग मेकर, किसके लिए होंगे फायदेमंद
Updated Fri, 03 Nov 2017 06:02 PM IST
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हार्दिक पटेल
- फोटो : self
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गुजरात चुनाव की गहमा-गहमी के बीच तीन नए नवेले नेता मीडिया के ही नहीं राजनीतिक पार्टियों के भी आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। इन नेताओं में सबसे प्रमुख हैं हार्दिक पटेल। पाटीदार समुदाय से आने के कारण ऐसा माना जा रहा है कि हार्दिक जिस पार्टी को सपोर्ट करेंगे समुदाय उसी पार्टी को वोट देगा।
हार्दिक पाटीदार अनामत आंदोलन समिति के अध्यक्ष हैं और पाटीदार समुदाय के लिए नौकरी और शिक्षा में आरक्षण की मांग के साथ 2015 में सड़कों पर उतरे और पाटीदार युवाओं की आवाज बने।हार्दिक की पाटीदार समुदाय में कितनी पकड़ है यह साबित होना अभी बाकी है। हालांकि देश की विभिन्न पार्टियों के बड़े नेताओं की नजर उनपर है।
पढ़ें: गुजरात में गरजे राहुल, बोले- बीजेपी को चुनाव के दिन लगेगा करंट, GST ने देश को किया बर्बाद
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शायद यही वजह है कि 24 साल के इस पाटीदार युवक ने महज दो महीनों में वो कर दिखाया जो कांग्रेस ही नहीं गुजरात के कई नेता दशकों से नहीं कर पाए। रातों-रात नेशनल मीडिया में छा जाने वाले हार्दिक चुनावी मैदान में भले न उतरे हों लेकिन वो एक पक्के नेता जरूर हैं। तभी वो कभी आप पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल के साथ नजर आते हैं तो कभी एनसीपी के नेता प्रफुल्ल पटेल से जोड़-तोड़ की बात करते दिखाई देते हैं। तो कभी वो शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के साथ बैठक कर रहे होते हैं।
इस चुनावी घमासान का केंद्र हैं हार्दिक, लेकिन इसके मायने क्या हैं। उनकी बैठकी कांग्रेस के साथ थोड़ी लंबी खिंच गई है और इसका पूरा फायदा उठाने और अपनी आरक्षण मांगों के साथ कांग्रेस के साथ जोड़-तोड़ की राजनीति में जुटे हुए हैं।
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हार्दिक पाटीदार अनामत आंदोलन समिति के अध्यक्ष हैं और पाटीदार समुदाय के लिए नौकरी और शिक्षा में आरक्षण की मांग के साथ 2015 में सड़कों पर उतरे और पाटीदार युवाओं की आवाज बने।हार्दिक की पाटीदार समुदाय में कितनी पकड़ है यह साबित होना अभी बाकी है। हालांकि देश की विभिन्न पार्टियों के बड़े नेताओं की नजर उनपर है।
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शायद यही वजह है कि 24 साल के इस पाटीदार युवक ने महज दो महीनों में वो कर दिखाया जो कांग्रेस ही नहीं गुजरात के कई नेता दशकों से नहीं कर पाए। रातों-रात नेशनल मीडिया में छा जाने वाले हार्दिक चुनावी मैदान में भले न उतरे हों लेकिन वो एक पक्के नेता जरूर हैं। तभी वो कभी आप पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल के साथ नजर आते हैं तो कभी एनसीपी के नेता प्रफुल्ल पटेल से जोड़-तोड़ की बात करते दिखाई देते हैं। तो कभी वो शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के साथ बैठक कर रहे होते हैं।
इस चुनावी घमासान का केंद्र हैं हार्दिक, लेकिन इसके मायने क्या हैं। उनकी बैठकी कांग्रेस के साथ थोड़ी लंबी खिंच गई है और इसका पूरा फायदा उठाने और अपनी आरक्षण मांगों के साथ कांग्रेस के साथ जोड़-तोड़ की राजनीति में जुटे हुए हैं।
गुजरात में पटेल समुदाय की आबादी अच्छी खासी है
मीडिया में दिए एक इंटरव्यू में हार्दिक ने कहा है कि उन्होंने अपने समुदाय के लोगों को बता दिया है कि वह बीजेपी को सत्ता से बाहर करना चाहते हैं, ऐसे में लोगों को पता है कि इसके लिए किसे वोट करना है। पटेल पर कांग्रेस के हाथों बिकने के भी आरोप लगे जिन पर उन्होंने कहा कि ऐसे आरोप लगाने वाले असली पटेल हो ही नहीं सकते हैं।
कई अटकलों के बीच हार्दिक का यह बयान कांग्रेस को सपोर्ट में वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल से मिलने के बाद आया है। माना ये भी जा रहा है कि पटेल आरक्षण पर दोनों ने किसी कानूनी रास्ते पर बात की होगी।
ये भी पढ़ें: गुजरात विधानसभा चुनाव में टर्निंग पॉइंट ला सकते हैं ये सात चेहरे
पाटीदार समुदाय में उनका दबदबा कितना है इसका पता इस बात से चलता है कि नरेंद्र मोदी के दिल्ली पहुंचने के बाद महज दो साल के अंदर पार्टी को अपना मुख्यमंत्री तक बदलना पड़ा। अपने छोटे से राजनीतिक करियर में हार्दिक की छवि एक बड़े नेता की बन चुकी है। वो 9 महीने जेल की हवा खा चुके हैं वहीं उनपर राजद्रोह का मामला भी चल रहा है। कांग्रेस भी इस छोटा पैकेट लेकिन बड़ा धमाल के साथ पाटीदार समुदाय को अपने साथ करने की जुगत में जुटी है।
ये भी पढ़ें: गुजरात चुनाव: सौराष्ट्र, कच्छ और उत्तर गुजरात में कांग्रेस को टक्कर देने उतरेगी BJP
चूंकि देश में जाति पर राजनीति होती है इसी के मद्देनजर गुजरात में करीब 20 फीसदी मतदाता पाटीदार हैं। मौजूदा सरकार में करीब 40 विधायक और 7 मंत्री पटेल समुदाय से हैं।
कांग्रेस के लिए हार्दिक गुजरात चुनाव के लिए कितने फायदेमंद साबित होंगे ये तो वक्त बताएगा लेकिन इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि पाटीदार बीजेपी के परंपरागत वोटर हैं। ऐसा माना जा रहा है कि नरेंद्र मोदी के पीएम बनने के बाद से पाटीदारों पर बीजेपी की पकड़ कमजोर हुई है हार्दिक पटेल के नेतृत्व में शुरू हुए पटेल आंदोलन ने बीजेपी की पकड़ को और कमजोर किया है। हार्दिक पटेल बीजेपी के खिलाफ लगातार माहौल बनाने के लिए हर संभव कोशिश में लगे हैं और पिछले दिनों तो उन्होंने संकल्प यात्रा भी निकाली थी।
गुजरात में पटेल समुदाय की आबादी अच्छी खासी है। इनमें एक हैं लेउवा पटेल और दूसरे कड़वा पटेल। हार्दिक, कड़वा पटेल हैं जबकि केशुभाई पटेल लेउवा समुदाय से आते हैं। पाटीदार समुदाय में लेउवा का हिस्सा 60 फीसदी और कड़वा का हिस्सा 40 फीसदी है। कांग्रेस को कड़वा के मुकाबले लेउवा से ज्यादा समर्थन मिलता रहा है। पाटीदार समुदाय संगठित होकर मतदान करता है। पिछले चुनाव 2012 के आंकड़े को देखें तो लेउवा पटेल के 63 फीसदी और कड़वा पटेल के 82 फीसदी वोट बीजेपी को मिले थे।
कई अटकलों के बीच हार्दिक का यह बयान कांग्रेस को सपोर्ट में वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल से मिलने के बाद आया है। माना ये भी जा रहा है कि पटेल आरक्षण पर दोनों ने किसी कानूनी रास्ते पर बात की होगी।
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पाटीदार समुदाय में उनका दबदबा कितना है इसका पता इस बात से चलता है कि नरेंद्र मोदी के दिल्ली पहुंचने के बाद महज दो साल के अंदर पार्टी को अपना मुख्यमंत्री तक बदलना पड़ा। अपने छोटे से राजनीतिक करियर में हार्दिक की छवि एक बड़े नेता की बन चुकी है। वो 9 महीने जेल की हवा खा चुके हैं वहीं उनपर राजद्रोह का मामला भी चल रहा है। कांग्रेस भी इस छोटा पैकेट लेकिन बड़ा धमाल के साथ पाटीदार समुदाय को अपने साथ करने की जुगत में जुटी है।
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चूंकि देश में जाति पर राजनीति होती है इसी के मद्देनजर गुजरात में करीब 20 फीसदी मतदाता पाटीदार हैं। मौजूदा सरकार में करीब 40 विधायक और 7 मंत्री पटेल समुदाय से हैं।
कांग्रेस के लिए हार्दिक गुजरात चुनाव के लिए कितने फायदेमंद साबित होंगे ये तो वक्त बताएगा लेकिन इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि पाटीदार बीजेपी के परंपरागत वोटर हैं। ऐसा माना जा रहा है कि नरेंद्र मोदी के पीएम बनने के बाद से पाटीदारों पर बीजेपी की पकड़ कमजोर हुई है हार्दिक पटेल के नेतृत्व में शुरू हुए पटेल आंदोलन ने बीजेपी की पकड़ को और कमजोर किया है। हार्दिक पटेल बीजेपी के खिलाफ लगातार माहौल बनाने के लिए हर संभव कोशिश में लगे हैं और पिछले दिनों तो उन्होंने संकल्प यात्रा भी निकाली थी।
गुजरात में पटेल समुदाय की आबादी अच्छी खासी है। इनमें एक हैं लेउवा पटेल और दूसरे कड़वा पटेल। हार्दिक, कड़वा पटेल हैं जबकि केशुभाई पटेल लेउवा समुदाय से आते हैं। पाटीदार समुदाय में लेउवा का हिस्सा 60 फीसदी और कड़वा का हिस्सा 40 फीसदी है। कांग्रेस को कड़वा के मुकाबले लेउवा से ज्यादा समर्थन मिलता रहा है। पाटीदार समुदाय संगठित होकर मतदान करता है। पिछले चुनाव 2012 के आंकड़े को देखें तो लेउवा पटेल के 63 फीसदी और कड़वा पटेल के 82 फीसदी वोट बीजेपी को मिले थे।