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1956 से मेरी सुबह का साथी है अमर उजाला : नीरज

Fri, 20 Jul 2018 01:11 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Fri, 20 Jul 2018 01:11 AM IST
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Gopal Das Neeraj on Amar Ujala from 1956

(कुछ समय पूर्व संवाददाता दीपक शर्मा से बातचीत में नीरज ने कहा कि अमर उजाला के साथ ही मेरे जीवन संघर्ष की भी हुई शुरुआत)

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अमर उजाला के बारे में सोचूं तो आगरा से 1948 में अखबार जब शुरू हुआ तो उस समय में कानपुर में डीएवी कालेज में पढ़ रहा था। साथ ही साथ आजीविका के लिए नौकरी भी कर रहा था। मुझे याद है उस समय दो अंग्रेजी अखबारों का दबदबा था। अमर उजाला की शुरुआत हुई तो बेहद चर्चा हुई। आजादी के बाद का वह दौर और संचार माध्यमों में अखबार एक शक्तिशाली माध्यम था। मैं उस समय बॉलकर्ट्स ब्रदर्स; जो कि अब वोल्टास है, में टाइपिस्ट था। सुबह दस बजे से शाम छह बजे तक नौकरी करता। फिर इसके बाद छह बजे से रात आठ बजे तक पार्ट टाइम काम भी करता। इतनी व्यस्त दिनचर्या में जब भी समय मिलता अमर उजाला के माध्यम से देश और दुनिया की जानकारी करना सुखद लगता था। अब सोचता हूं कि लगता है जैसे अमर उजाला के साथ ही मेरे जीवन संघर्ष की भी शुरुआत हो रही है। 1941 से ही कविता का सफर भी जारी था तो सोचता था कि अमर उजाला में भी मेरी कविताएं और गीत छपें। खैर 1956 में मैं अलीगढ़ के डीएस कालेज में शिक्षक हो गया और यहीं जनकपुरी में मकान बनवाया। तब से आज तक अमर उजाला मेरे यहां पर नियमित आता है। आज मेरी नजर कमजोर हैं लेकिन सुबह का साथ अमर उजाला ही देता है। अखबार देखता हूं और उसके बाद जो खबर चाहिए उसे पढ़वाता हूं। वक्त के साथ मेरा कारवां तो थकता गया लेकिन देखता हूं कि अमर उजाला जवां हो रहा है। उस समय के काले सफेद कलेवर से निकलकर आज का रंगीन और स्मार्ट अमर उजाला देखना अच्छा लगता है। 1955 में वह समय भी आया जब मेरे कवि सम्मेलन की खबर अमर उजाला में छपी। बहुत अच्छा लगा। उस समय स्थानीय खबरें ज्यादा नहीं होती थीं लेकिन अब में देखता हूं कि स्थानीय खबरों को प्राथमिकता देने के लिए अलग से संस्करण निकाले जाते हैं। यह बहुत ही अच्छी बात है। अधिक से अधिक लोगों का अखबार के साथ जुड़ाव होता है। हां एक और बात जो मुझे याद है। आपातकाल का दौर आया तो अखबारों के लिए भी बड़ा चुनौती पूर्ण समय था। मेरी कुछ कविताएं थी जो मैंने आपातकाल के दौरान लिखीं। बाद में वह पंक्तियां अमर उजाला में ही छपीं। वह पंक्तियां यह थीं।
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फूलों की आखों में आंसू इतराया रंग बहारों का
लगता है आने वाला है फिर से मौसम अंगारों का’
‘संसद जाने वाले राही कहना इंदिरा गांधी से
बच न सकेगी दिल्ली भी अब जय प्रकाश की आंधी से’


इसके अलावा और भी गीत छपे। अब तो इतना छपा है कि गिनती भी नहीं है। आप लोगों का (अमर उजाला का) बड़ा स्नेह है कि अभी भी मेरे विचारों को अभिव्यक्ति देते हैं। मैं अभी भी देश और सामाजिक स्थितियों पर चिंतन करता हूं। बिना आपके मेरे विचार लोगों तक पहुंचना संभव नहीं है। कानपुर के डीएवी कालेज से आज तक का अमर उजाला का सफर अपनी आंखों से देखा है। एक छोटे से पौधे को वट वृक्ष बनते देखा है। अच्छा लगता है। जब आपने ‘शब्द सम्मान’ का पोस्टर मुझसे अनावरण कराया तो अच्छा लगा। सामाजिक सरोकारों के साथ साहित्य के क्षेत्र में भी इस पहल से मुझे लगा कि मैं न रहूंगा लेकिन इसी तरह के उपक्रमों से मेरे गीत, मेरी कविताएं, मेरा लेखन आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचेगा।
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शुभकामनाओं सहित,
आपका
गोपाल दास नीरज

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