Ghulam Nabi Azad: चुनाव में साथ उतरेंगे फारूक अब्दुल्ला और आजाद! भाजपा के लिए यह दांव भी सियासी फायदे वाला
Ghulam Nabi Azad: कश्मीर के एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि बीते कुछ दिनों में कश्मीर के राजनीतिक संगठनों में भी एक तरह की उठापटक देखी जा रही है। खासतौर से गुपकार ग्रुप को लेकर जो राजनीतिक घटनाक्रम हुआ है उसे गुलाम नबी आजाद के कांग्रेस छोड़ने वाले बड़े घटनाक्रम से हटकर अलग नहीं देखा जा सकता...
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आने वाले दिनों में कश्मीर की राजनीति में बड़ी उठापटक होने वाली है। गुलाम नबी आजाद के कांग्रेस से इस्तीफा देने के बाद जैसे-जैसे वक्त बीतता जा रहा है कश्मीर से लेकर दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में तमाम तरह की हलचलें बढ़ती जा रही हैं। चर्चाओं का बाजार तो इस तरह भी गर्म है कि दो दिन पहले गुपकार ग्रुप से अलग होने की घोषणा करने वाले नेशनल कॉन्फ्रेंस के फारूक अब्दुल्ला गुलाम नबी आजाद की बनने वाली नई राजनीतिक पार्टी के साथ मिलकर चुनावी मैदान में उतर सकते हैं। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह तभी संभव होगा जब यह तय हो जाए कि गुलाम नबी आज़ाद "भाजपा की पिच" पर नहीं खेलेंगे। जो फिलहाल अभी राजनीतिक पर्दे पर कहीं भी दूर-दूर तक नज़र नहीं आ रहा है। वही सियासी सरगर्मियां इस बात की भी हैं कि जितना गुलाम नबी आजाद कश्मीर में मजबूती से चुनाव लड़ेंगे, उतना ही कश्मीर के मुस्लिम वोट बैंक में सेंध मारी होगी और स्थानीय राजनीतिक दल कमजोर होंगे। जिसका सीधे तौर पर जम्मू इलाके में भाजपा को बड़ा फायदा हो सकता है।
गुपकार में सभी दलों में नहीं बनी बात
कश्मीर में गुलाम नबी आजाद अपनी राजनैतिक पार्टी बनाकर अगले विधानसभा के चुनावों में मैदान में उतरेंगे। चर्चा अभी यही है कि भाजपा के लिए गुलाम नबी आजाद घाटी में बेहतर माहौल बनाकर जम्मू-कश्मीर में तय फॉर्मूले के लिहाज से ही चुनाव लड़ेंगे। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में कश्मीर के राजनीतिक विश्लेषकों की अपनी एक अलग राय है। कश्मीर के एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि बीते कुछ दिनों में कश्मीर के राजनीतिक संगठनों में भी एक तरह की उठापटक देखी जा रही है। खासतौर से गुपकार ग्रुप को लेकर जो राजनीतिक घटनाक्रम हुआ है उसे गुलाम नबी आजाद के कांग्रेस छोड़ने वाले बड़े घटनाक्रम से हटकर अलग नहीं देखा जा सकता। वह बताते हैं कि जिला परिषद के चुनावों में जिस तरीके से गुपकार संगठन ने मिलकर चुनाव लड़ा और जो परिणाम आए उसके बाद तमाम तरीके की आपसी तनातनी रही। इसी बीच नेशनल कांफ्रेंस के फारूक अब्दुल्ला ने दो दिन पहले ही गुपकार ग्रुप से अलग हो कर आने वाले विधानसभा चुनावों में सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का एलान कर दिया।
राजनीतिक विश्लेषक एसएन कॉल कहते हैं कि भाजपा को फायदा गुलाम नबी आजाद को सीधे तौर पर अपने साथ मिलाकर नहीं होने वाला है। वे कहते हैं इसका दूसरा पहलू यह भी है। अगर आजाद वहां पर अकेले लड़ते हैं तो निश्चित तौर पर वहां के क्षेत्रीय दलों में टूट पड़ेगी और मुस्लिम वोटों का जबरदस्त बंटवारा होगा। इसका सीधा फायदा भाजपा को मिलेगा। कॉल कहते हैं कि परिसीमन के बाद जिस तरीके से कश्मीर और जम्मू में सीटों का बंटवारा हुआ है उससे मुस्लिम वोटों में सेंधमारी से जम्मू में भाजपा के वोट बैंक में न सिर्फ एकजुटता दिखेगी, बल्कि चुनावी समीकरण भी भाजपा के पक्ष में आते दिखेंगे। हालांकि उनका कहना है यह सब अभी चुनावी कयासबाज़ी ही है। लेकिन जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक परिदृश्य में इन सभी महत्वपूर्ण पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
फारूक अब्दुल्ला ने भी दिए संकेत
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे हालात में निश्चित तौर पर अब जम्मू-कश्मीर में होने वाले चुनाव में सभी प्रमुख राजनीतिक दल अब अपनी किस्मत आजमाएंगे। जिसमें भाजपा के अलावा कांग्रेस और गुपकार ग्रुप से अलग हुए सभी आठों राजनीतिक दल चुनावी मैदान में होंगे। वहीं दूसरी तरफ गुलाम नबी आजाद कांग्रेस से अलग होकर जम्मू-कश्मीर पहुंचे हैं तो निश्चित तौर पर वह भी बड़ा दांव लगाएंगे ही। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि गुलाम नबी आजाद के कांग्रेस छोड़ने के बाद जिस तरीके से नेशनल कांफ्रेंस के नेता फारूक अब्दुल्ला ने चिंता जाहिर की है, वह आने वाले चुनावों में एक बड़ा संदेश दे रही है। फारूक अब्दुल्ला ने भी इस बात का इशारा किया है कि अगर गुलाम नबी आजाद अपनी पार्टी बनाते हैं और चुनावों में किसी तरीके का सामंजस्य बिठाकर साथ लड़ने का इशारा करते हैं तो निश्चित तौर पर इस गठबंधन के लिए भी देखा जाएगा।
फारूक अब्दुल्ला की ओर से कही गई इस बात से राजनीतिक हलकों में तमाम तरह की चर्चाएं भी शुरू हो गई हैं। दरअसल फारूक अब्दुल्ला की नेशनल कांफ्रेंस समेत अन्य राजनीतिक दलों का गुपकार समूह भाजपा की नीतियों का धुर विरोधी समूह है। चूंकि गुलाम नबी आजाद कांग्रेस से अलग होकर अपनी जो भी सियासी पारी का आगाज करने वाले हैं, उसमें भाजपा के बैक ग्राउंड में बड़ी भूमिका मानी जा रही है। ऐसे में राजनीतिक हलकों में कयास ही लगाए जा रहे हैं कि गुलाम नबी आजाद और फारूक अब्दुल्ला तो फिलहाल एक साथ नहीं जुड़ सकते हैं। हालांकि विशेषज्ञों का यह जरूर कहना है कि अगर गुलाम नबी आजाद अपनी नीतियों में कोई परिवर्तन करते हैं या वह भाजपा की तैयार की गई पिच पर मैदान में नहीं उतरते हैं तो दूसरी तरह की राजनीतिक संभावनाएं देखी जा सकती हैं।
स्थानीय दल आजाद के साथ समीकरण बिठाने में जुटे
जानकारों का मानना है कि आज़ाद के कश्मीर में ताकत झोंकने से वहां की क्षेत्रीय राजनैतिक पार्टियों का चुनावी समीकरण बिगड़ सकता हैं। आज़ाद का घाटी की तकरीबन तीस सीटों पर अच्छा खासा वर्चस्व है। इसी वजह से राजनीतिक विश्लेषकों का अनुमान है कि घाटी की प्रमुख पार्टियों में फारूक अब्दुल्ला की नेशनल कॉन्फ्रेंस, महबूबा मुफ्ती की पीडीपी समेत अन्य राजनीतिक दलों को नुकसान होना तय माना जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में अनुमान लगाया जा रहा है कि अगले कुछ दिनों में हालात को देखने के बाद नए राजनीतिक समीकरण और गठबंधन के रास्ते खुल सकते हैं। क्योंकि गुपकार समूह अलग-थलग पड़ चुका है ऐसे में नई संभावनाओं के तलाशे जाने की उम्मीद बढ़ गयी है। ऐसे में यह जानते हुए कि गुलाम नबी आजाद भाजपा की पिच पर ही राजनीतिक आगाज करने वाले हैं बावजूद इसके स्थानीय पार्टियां आजाद के साथ अपने राजनीतिक समीकरण सेट करने में लग गई हैं।