सर्जिकल स्ट्राइक के हीरो पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल हुड्डा बोले, चीन सीमा पर तैनात 'आईटीबीपी' पर हो सेना का नियंत्रण
कारगिल की लड़ाई के बाद हुई मंत्रियों के समूहों की बैठक 'जीओएम' में 'एक बॉर्डर, एक फोर्स' की बात सामने आई थी। कारगिल लड़ाई से पहले उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश व लद्दाख में आईटीबीपी की 25 बटालियन थी, लेकिन 2004 में सिक्किम और अरुणाचल बॉर्डर की चौकसी का जिम्मा भी आईटीबीपी को सौंप दिया गया...
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भारत-चीन के बीच पूर्वी लद्दाख में चले सैन्य गतिरोध के बीच इंडियन आर्मी के पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) डीएस हुड्डा ने अपने ब्लॉग में लिखा है कि आईटीबीपी पर सेना का नियंत्रण होना चाहिए। बुलेट को काटने और आईटीबीपी को सेना के संचालन नियंत्रण में रखने का समय आ गया है। उनका यह ब्लॉग चर्चा में है।
आईटीबीपी के एक बड़े अधिकारी ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। चूंकि वे सेवा में हैं, इसलिए उन्होंने नाम न छापने का आग्रह किया है। उक्त अधिकारी कहते हैं कि भारत-चीन बॉर्डर पर 'आईटीबीपी' सेना के साथ 'छोटे भाई' की भूमिका में रहती है।
बॉर्डर की चौकसी में अभी तक शिकायत का मौका नहीं दिया। इसके बावजूद डीएस हुड्डा ने सेना के नियंत्रण की बात कह दी। हाई एल्टीट्यूड में आईटीबीपी की क्षमता से हर कोई वाकिफ है।
पूर्व रक्षा मंत्री स्व. मनोहर पर्रिकर और तत्कालीन गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने इस मुद्दे पर हुई बैठक में आईटीबीपी के कामकाज की सराहना करते हुए इस व्यवस्था को जारी रखने की बात कही थी।
डिप्लोमेसी में रेग्यूलर फोर्स और लड़ाई वाली फोर्स की अलग भूमिका है
आईटीबीपी अधिकारी के मुताबिक, डिप्लोमेसी में कई बातें शामिल होती हैं। उनमें रेग्यूलर फोर्स की अवधारणा अलग से वर्णित है। बॉर्डर गार्ड व देखभाल के लिए लड़ाई लड़ने वाली फोर्स को ही तैनात किया जाए, यह जरूरी नहीं होता।
पीस टाइम मैनेजमेंट और वॉर टाइम मैनेजमेंट, ये इसीलिए बनाए गए हैं कि जो सेना लड़ाई के लिए तैयार की गई है, वह हर समय बॉर्डर पर तैनात नहीं हो सकती। अगर ऐसा होता है तो दोनों देशों के बीच लद्दाख जैसा गतिरोध नियमित तौर पर होने लगेगा।
बॉर्डर पर पत्थरबाजी हो गई, निकट ही आईटीबीपी चौकी थी, लेकिन हमारे जवानों को सेना साथ नहीं ले गई। चीन के साथ लगते बॉर्डर चाहे वह सिक्किम, उत्तराखंड, अरुणाचल प्रदेश या लद्दाख हों, अनेक जगहों पर आईटीबीपी फ्रंट फुट पर है।
कारगिल की लड़ाई के बाद हुई मंत्रियों के समूहों की बैठक 'जीओएम' में 'एक बॉर्डर, एक फोर्स' की बात सामने आई थी। कारगिल लड़ाई से पहले उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश व लद्दाख में आईटीबीपी की 25 बटालियन थी, लेकिन 2004 में सिक्किम और अरुणाचल बॉर्डर की चौकसी का जिम्मा भी आईटीबीपी को सौंप दिया गया।
रक्षा मंत्री, गृह मंत्री और आर्मी चीफ की बैठक में आईटीबीपी को मिली हरी झंडी
2014 में तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर, गृहमंत्री राजनाथ सिंह और आर्मी चीफ दलबीर सिंह सुहाग के बीच 'वन बॉर्डर, वन फोर्स' के मसले पर बैठक हुई थी। इसमें तय हुआ कि आईटीबीपी गृह मंत्रालय के नियंत्रण में अच्छा काम कर रही है।
आईटीबीपी अधिकारी बताते हैं, इस बैठक में कहा गया कि किसी एक बल पर आंख बंद कर भरोसा नहीं कर सकते। आईटीबीपी बेहतरीन कार्य कर रही है। आर्मी जब कभी कोई सलाह देती है, तो वह तुरंत मानी जाती है।
मोदी सरकार 2.0 में भी आईटीबीपी के कामकाज का गहराई से विश्लेषण किया गया। आईटीबीपी ने पिछले साल लेह में अपना नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटियर कार्यालय स्थापित किया है। इस फोर्स ने आर्मी के साथ हमेशा 'छोटे भाई' की भूमिका में ड्यूटी दी है।
अब यदि कोई पूर्व सैन्य अधिकारी आईटीबीपी का नियंत्रण गृह मंत्रालय से लेकर सेना को देने की बात कर रहा है, तो उसके पीछे 'पहचान' की लड़ाई ही सामने आती है।
सर्जिकल स्ट्राइक के हीरो पूर्व ले. जन. डीएस हुड्डा ने क्या कहा
हुड्डा के मुताबिक, भविष्य में चीन के साथ निपटने के लिए एक व्यापक रणनीति की आवश्यकता होगी, जो हमारे राजनयिक, आर्थिक और सैन्य प्रतिक्रिया को जोड़ेगी। हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि चीन के साथ हमारा सैन्य अंतर इतना बड़ा न हो जाए कि एलएसी के साथ जबरदस्ती का विरोध करना मुश्किल हो जाए।
उन्होंने इसके लिए दो संस्थागत उपायों का सुझाव दिया। वर्तमान में, भारत-चीन सीमा के लिए भारत-तिब्बत सीमा पुलिस, गृह मंत्रालय के अधीन है। गत वर्ष की गृह मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है कि 'वन बॉर्डर, वन फोर्स' के सिद्धांत के अनुरूप चीन सीमा की रक्षा की जिम्मेदारी आईटीबीपी को सौंपी गई है।
बतौर हुड्डा, रिपोर्ट का दूसरा पैराग्राफ कहता है कि भारतीय सेना 'आईटीबीपी' के साथ चीन सीमा पर एलएसी के इर्दगिर्द भूमि सीमाओं की रक्षा कर रही है'। दो अलग-अलग मंत्रालयों के तहत दो अलग-अलग बल एक सीमा पर काम करें, यह बेतुकी स्थिति है।
कारगिल रिव्यू कमेटी के उल्लेख के बाद गठित मंत्रियों के समूह ने भी कहा था कि वर्तमान में, एक ही सीमा पर एक से अधिक बल काम कर रहे हैं। इससे कमांड और नियंत्रण में संघर्ष का सवाल अकसर उठता है।
एक ही सीमा पर बलों की बहुलता के कारण बलों की ओर से जवाबदेही में कमी देखी गई है। जवाबदेही को सुनिश्चित करने के लिए सीमा पर 'एक सीमा एक बल' का सिद्धांत अपनाया जा सकता है।
दो साल पहले कही थी ये अहम बात
2018 में, यह घोषणा की गई कि आईटीबीपी की नौ बटालियनों का गठन होगा। बॉर्डर पर दो बीओपी (सीमा चौकी) के बीच की दूरी कम करने के लिए यह कदम उठाया गया। बतौर डीएस हुड्डा, यह इस बात की अपर्याप्त समझ को दर्शाता है कि एलएसी पर सेना की तैनाती कैसे की जाती है।
आईटीबीपी बॉर्डर की सुरक्षा करती है, मगर एलएसी पर सीमा प्रबंधन में सेना ही अग्रणी भूमिका निभाती है। सेना के अधिकारी चीनी सेना के साथ सीमा बैठकों का नेतृत्व करते हैं। कोई भी संकट आता है तो उसे सेना नियंत्रित करती है।
लेह में कोर कमांडर पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ गतिरोध से निपटने के लिए कई आकस्मिक योजनाएं बनाता है। दूसरी ओर आईटीबीपी, गृह मंत्रालय को अपनी रिपोर्ट देता है। एक ऐसा मंत्रालय, जिसकी वर्तमान स्थिति में कोई जिम्मेदारी नहीं है।
एलएसी के दोहरे प्रबंधन की इस विषम परिस्थिति को नियमित रूप से बनाए रखने के लिए अतीत में हरी झंडी दी गई है। ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स की रिपोर्ट में जो कहा गया है, उसे लागू करने का वक्त आ गया है। बुलेट को काटने और आईटीबीपी को सेना के संचालन नियंत्रण में रखने का समय आ गया है।