जीवन के 90 बसंत देख चुके हैं रामलला की पैरवी करने वाले परासरन, हैरत में डालते हैं उनके तर्क
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सुप्रीम कोर्ट में राममंदिर मुद्दे पर आखिर आज ऐतिहासिक फैसला आ ही गया। इस मामले की सुनवाई के दौरान ‘रामलला विराजमान’ स्वयं एक पक्षकार थे और उनकी तरफ से देश के वरिष्ठ वकील के. परासरन ने कोर्ट में बहस की। इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के वक्त देश के अटॉर्नी जनरल रह चुके 92 वर्षीय के. परासरन की इच्छा थी कि उनके सामने ही इस मामले की सुनवाई पूरी हो जाए और ऐसा हुआ भी। के. परासरन को हिंदू कानूनों का विशेषज्ञ भी माना जाता है।
हमेशा नया करने की इच्छा
के. परासरन के बेहद खास मित्र और विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष अलोक कुमार ने अमर उजाला को बताया कि अधिक उम्र होने के बावजूद के परासरन ने बहुत मजबूती से रामलला का पक्ष सर्वोच्च अदालत में रखा। आलोक कुमार का कहना है कि के परासरन ने उन्हें बताया कि इस उम्र में भी वे कुछ नया करने की सोचते रहते हैं। जब भी उनमें कुछ नया करने की इच्छा होती है, तो वे राममंदिर के केस को पढ़ना शुरू कर देते हैं। नए तथ्य और तर्क खोजते रहते हैं, जिससे कोर्ट में पूरी मजबूती के साथ अपनी बात रखी जा सके। यही नहीं अपने तर्कों से वे कई बार कोर्ट और अन्य पक्षकारों को भी हैरत में डाल देते हैं।
उनके तर्कों से हैरत में था दूसरा पक्ष
के परासरन 2003 में पदम भूषण और 2011 में पदम विभूषण से भी सम्मानित हो चुके हैं। रामजन्म भूमि की विश्वसनीयता पर उन्होंने कहा है कि क्या इसी तरह के सवाल अन्य धर्मों के प्रमुख लोगों के बारे में उठाये जा सकते हैं? रामचरित मानस और वाल्मीकि कृत रामायण में अनेक बार अयोध्या के भगवान राम के जन्मस्थान के रूप में विवरण दिया गया है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या धार्मिक और पौराणिक रचनाओं को तथ्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है या नहीं। आलोक कुमार बताते हैं कि परासरन के इन तर्कों का दूसरे पक्ष के पास कोई जवाब नहीं था।
अदालत के अनुरोध के बाद भी खड़े हो कर की बहस
के परासरन की 92 साल की उम्र को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने सुनवाई के दौरान एक दिन उनसे कहा कि अगर वे चाहें तो बैठकर भी बहस कर सकते हैं। इस पर परासरन ने कहा कि वे बहुत दयालु हैं, जो उन्हें बैठकर बहस करने की अनुमति दे रहे हैं। लेकिन कोर्ट में खड़े होकर बहस करने की परंपरा है और उनकी चिंता इस परंपरा को लेकर है।