महिला पायलटों ने अपने उन क्षण को किया साझा जब अटकने लगी थी सांसे
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उस रात पहली बार अकेले उड़ान भर रही थी। लड़ाकू विमान की रफ्तार आवाज से भी तेज थी। बिगड़ैल मिजाज बादल और बिजली की कड़क हौसले का इम्तहान ले रही थी। अचानक जमीन और आसमान के बीच फर्क महसूस होना बंद हो गया। बादल से छन कर दिखने वाले तारे और जमीन से आ रही टिमटिमाती रोशनी एक जैसे दिखने लगी। मशीनों के संकेत और दृष्टि का तालमेल खत्म हो चुका था। जमीन से ऊंचाई का अंदाजा लगना बंद हो गया। अनायास सांसें तेज होने लगी। लेकिन संकट में चित्त शांत रखने की ट्रेनिंग काम आई। सिर को स्थिर रख उपकरणों के निर्देशों का सहारा लिया और जहाज जल्द ही काबू में था।
यह दास्तां है वायुसेना की पहली महिला लड़ाकू पायलट प्लाइंग कैडेट मोहना सिंह की जब ट्रेनिंग के दौरान उनकी सांसें अटकी थीं। मोहना के मुताबिक उस रफ्तार में आपकी मानसिक मजबूती ही जिंदगी और मौत के बीच दीवार बन कर खड़ी रह सकती है।
शनिवार को मोहना सिंह के साथ भावना कंठ और अवनी चतुर्वेदी को हैदराबाद में रक्षा मंत्री मनोहर परिकर की मौजूदगी में कमीशन दी गई। देश और वायुसेना केइतिहास में इन तीनों फ्लाइंग कैडेट का नाम पहली महिला लड़ाकू पायलट के तौर पर दर्ज हो गया। इन तीनों ने उड़ान की अनिश्चितता और बेतरतीब खतरे को बखूबी झेल लिया है।
फ्लाइंड कैडेट भावना कंठ के मुताबिक जब वह पहली बार अकेले (सोलो शॉर्टी) स्पीन एंड रिकवरी मैनुवर पर निकली तो मन के कोने में शक पैदा हो गया। 20000 फीट की उंचाई पर कलाबाजी करते वक्त जहाज ने काम करना बंद कर दिया तो क्या होगा। लेकिन इससे उबरने के लिए मेरे पास सेकेंड के सौंवे भाग से ज्यादा का समय नहीं था। मैंने भीतर का पायलट को झटके से जगाया और अगले ही क्षण ऊंचे आसमान में कलाबाजी कर रही थी। कंठ के मुताबिक अगर पलक झपकते फैसले नहीं लिए गए तो कुछ भी हो सकता है।
फ्लाइंग कैडेट अवनी चतुर्वेदी को उस रोज बिजली की तेजी से फैसला लेना पड़ा कि उड़ान भरना खतरनाक साबित हो सकता है। जब वह रनवे पर विमान को चरम गति दे कर उड़ान के लिए पहिए को समेटने ही जा रही थी कि कैनोपी से खतरे के संकेत आने शुरू हो गए। चतुर्वेदी ने बताया कि उनकी पूरी एकाग्रता उड़ान भरने पर थी और संकेत सुन पर वह भ्रमित हो उठी। सब कुछ अपनी चरम पर था। अगर ढीले कैनोपी के साथ हवा में होती तो वह निश्चित जानलेवा साबित होता। लेकिन पलक झपकते लिए फैसले ने बचा लिया।
वायुसेना की लड़ाकु विमान उड़ाएंगी ये तीन महिलाएं
भावना कंठ : बिहार के दरभंगा की रहने वाली भावना ने कोटा के विद्या मंदिर से माध्यमिक शिक्षा पूरी करने के बाद बंगलूरू के बीएमएस इंजीनियरिंग कॉलेज से मेडिकल इलेक्ट्रॉनिक्स में बीटेक की हैं। पिता इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन में अधिकारी हैं।
मोहना सिंह : मूल रूप से राजस्थान के झुंझनू शहर की रहने वाली मोहना की स्कूली पढ़ाई दिल्ली के एयरफोर्स स्कूल में हुई है तथा उन्होंने जीआईएमईटी अमृतसर से इलेक्ट्रॉनिक्स में बीटेक किया है।
पिता वायुसेना में वारंट अफसर हैं जबकि उनकी मां अध्यापिका हैं। मोहना के दादा एविएशन रिसर्च सेंटर में फ्लाइट गनर थे।
भारतीय वायुसेना में महिला पायलट
1991 : महिलाओं को पायलटों के रूप में शामिल किया गया, लेकिन यह केवल हेलीकॉप्टर और परिवहन विमानों के लिए
24 अक्तूबर, 2015 : रक्षा मंत्रालय ने महिलाओं को लड़ाकू विमान में पायलट के रूप में शामिल करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी
भारतीय सेना में महिलाएं
आर्मी 1,436
एयरफोर्स 1,331 (94 पायलट के रूप में)
नेवी 413
(इन आंकड़ों में चिकित्साधिकारी शामिल नहीं हैं)
अन्य देश : महिलाओं को लड़ाकू विमान उड़ाने की इजाजत मिली
कनाडा (1989), नार्वे (1992), अमेरिका यूएसए (1993), यूके (1994), फ्रांस (1999), द. अफ्रीका (2000), इजराइल (2001), जर्मनी (2007), द. कोरिया (2008), चीन (2013), पाकिस्तान (2013), यूएई (2014), भारत (2016)
रूस और तुर्की में द्वितीय विश्व युद्घ के दौरान
कुछ खास :
1936 में पहली बार तुर्की की सबिहा गोकचेन ने लड़ाकू विमान उड़ाई। तब उनका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज किया गया। बाद में उन्होंने जेट भी उड़ाई। सैनिक इतिहास में सोवियत संघ (अब रूस) की ल्यादिया लितविक पहली महिला पालयट थीं जिन्होंने जर्मन जेयू-88 बांबर विमान को मार गिराने में सफलता पाई थी। 2013 में पाकिस्तान वायुसेना में आयशा फारुक पहली महिला लड़ाकू विमान पायलट बनीं।
Published By Rahul Sankrityayan