लाल पोटली से बजट पैकेज तक और पेट्रोल-डीजल कीमतों से अर्थव्यवस्था तक, निर्मला सीतारमण से विशेष बातचीत
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ब्रिटिश हैंगओवर से निजात पाकर किसी सूटकेस या ब्रीफकेस के बदले लाल कपड़े की पोटली में बजट के कागजात संसद ले जाने का फैसला केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने एक झटके में नहीं लिया। इसके लिए उन्होंने बाकायदा अपने परिवार के सदस्यों के साथ विचार-विमर्श किया। इस काम में मदद की उनके मामा और मामी ने। उन्होंने ही लाल कपड़े में बजट कागजात लपेटने का सुझाव दिया और उन्होंने ही लाल कपड़े को लिफाफे की तरह मोड़ कर सिल दिया ताकि बजट कागजात बाहर नहीं गिरे। देश की पहली पूर्णकालिक महिला वित्त मंत्री के रूप में बजट पेश करने के बाद अमर उजाला ने निर्मला सीतारमण से इस बारे में विस्तृत बातचीत की। पेश है इस बातचीत के संपादित अंश :-
प्रश्न: आपने ब्रिटिश जमाने से चले आ रहे ब्रीफकेस में बजट कागजात संसद ले जाने के चलन को छोड़ कर देशी अंदाज अपनाया। यह विचार आपके मन में कैसे आया?
उत्तर: सूटकेस कहें या ब्रीफकेस, मुझे यह पहले से ही पसंद नहीं है। (मुस्कुराते हुए) आपको तो पता है कि भारतीय राजनीतिक तंत्र में सूटकेस किसलिए विख्यात रहा है। मुझे यह भी लगता है कि ब्रीफकेस में बजट के कागजात ले जाना हमारा सिस्टम नहीं है। यह तो फिरंगी सिस्टम है। मैंने सोचा, ब्रीफकेस इसलिए रखा जाता है कि बजट के कागजात उससे गिरे नहीं। फिर सोचा कि इसे कपड़े में लपेटा जाए तो भी यह नहीं गिरेगा।
ठीक उसी तरह, जैसे हमारे कारोबारी कपड़े में लपेट कर अपना बही-खाता रखते हैं। भारत के किसी भी हिस्से में चले जाइए, वहां लाल कपड़े में ही अपनी बही-खाता रखने की परंपरा है। दक्षिण भारत की बात करें या पश्चिमी भारत या उत्तरी या पूर्वी भारत की, हर इलाके में किसी न किसी शुभ अवसर पर लाल कपड़े में हिसाब किताब लपेट कर भगवान के पास रखा जाता है। उसकी पूजा अर्चना की जाती है। उस पर हल्दी, पान, फूल आदि चढ़ाया जाता है।
प्रश्न : फिर यह लाल पोटली के रूप में कैसे तैयार हुआ?
उत्तर : मेरे मन में ऐसा विचार आया तो इसकी चर्चा मैंने अपने घर पर की। हमारे साथ मेरे मामा और मामी भी रहते हैं। मेरी मामी ने तुरंत सुझाव दिया कि लाल कपड़े को लिफाफे की तरह मोड़ कर उसे सिल दिया जाए तो उससे कागजात नहीं गिरेंगे। फिर उन्होंने लाल कपड़े को एक लेजर की तरह फोल्डर में कागजात रखकर दिखाया कि यह सही है या नहीं। उसके ऊपर फिर लाल कपड़े का बस्ता सा सिल दिया। यह मुझे पसंद आया।
इसी बीच इस पर भी चर्चा हुई कि यह मेरा पहला बजट है। बजट पेश करते समय पूरे देश की नजरें मेरे ऊपर होंगी। इसलिए सभी गौर करेंगे कि मैं पहली महिला पूर्णकालिक वित्त मंत्री हूं। मेरे मामा मामी काफी दिन मुंबई में रहे हैं, इसलिए सिद्धि विनायक और महालक्ष्मी मंदिर से गहरा जुड़ाव है। उन्होंने लेजर और ऊपर की पोटली को मुंबई में सिद्धिविनायक और महालक्ष्मी मंदिर के दर्शन करवाए। वहां से यह वापस आया तो इस पर मैंने सत्यमेव जयते और भारत का राज चिह्न चिपकवा दिया ताकि यह ऑफिशियल लगे।
प्रश्न : आपने ब्रीफकेस की परंपरा तोड़ी है। बजट भाषण में भी आपने कुछ परंपराएं तोड़ी हैं। कुछ महत्वपूर्ण आंकड़ों को बजट भाषण में क्यों नहीं शामिल किया?
उत्तर: मैं समझ रही हूं कि आप किन आंकड़ों का जिक्र कर रहे हैं। आप देखिए, मुझे दो घंटे में बजट भाषण पूरा करना था। वित्त मंत्री पूरे देश का बजट पेश करता है, उसमें ढेर सारे आंकड़े होते हैं। सभी तरह के आंकड़ों को बजट में शामिल नहीं कर सकते। ऐसा करें तो वित्त मंत्री को भाषण पढ़ने के लिए कई घंटे चाहिए। इतना समय संसद में होता नहीं है। इसलिए मैंने उन्हीं बातों को इसमें शामिल किया, जो हो सकता था। बाकी बातेें मैंने बजट दस्तावेज में शामिल कीं। वह बजट का हिस्सा है, भले ही भाषण का हिस्सा नहीं हो।
पेट्रोल और डीजल कीमत वृद्धि और अर्थव्यवस्था पर बोलीं वित्त मंत्री
प्रश्न : आपने पेट्रोल और डीजल पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क और इंफ्रास्ट्रक्चर सेस लगा दिया है। इससे दोनों ईंधन ढाई रुपये तक महंगे हो गए हैं। इससे महंगाई भड़कने का खतरा नहीं होगा?
उत्तर : ऐसा कुछ नहीं होगा जैसा आप सोच रहे हैं। पिछले पांच साल से नरेंद्र मोदी की सरकार है और उस दौरान किसी भी साल को देख लीजिए महंगाई काबू में रही है। वर्ष 2014 में जब हमारी सरकार आई थी तो अरहर दाल 250 रुपये किलो बिक रही थी। इसी तरह मसूर, उड़द और चना के दाल भी महंगे थे। ऐसा नहीं था, उस दौरान किसानों को खूब दाम मिला हो। किसानों को भी कम दाम मिल रहे थे और बाजार में भी महंगाई थी।
इसके बाद कभी सब्जियों के दाम आसमान में तो कभी प्याज के दाम आसमान में। हमने इसका विस्तृत अध्ययन किया और इसका निदान निकाला। आज सब कुछ ठीक है। आप कहते हैं कि पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने से महंगाई भड़केगी तो मैं कहना चाहूंगी कि थोड़ी बहुत महंगाई भी ठीक है। आप अर्थशास्त्र पढ़िए, उसमें स्पष्ट उल्लेख है कि मुद्रास्फीति की दर सालों तक नीचे रहे तो अर्थव्यवस्था में विकास का अवसर कम रहता है। यह ठीक है कि मुद्रास्फीति की दर ज्यादा नहीं हो लेकिन यह भी जरूरी है कि कम भी नहीं हो। इन दोनों स्थितियों में आम आदमी को दिक्कत होती है।
इसलिए जब महंगाई के बारे में बात की जाती है तो आदर्श स्तर की बात होती है। यदि यह आदर्श स्तर पर नहीं होगा तो अवस्फीति की स्थिति बनेगी। वैसी स्थिति में मांग घटेगी, लोगों के रोजगार छिनेंगे और जिनकी नौकरी बरकरार रहेगी, उनका वेतन कम हो जाएगा। ऐसी स्थिति में आर्थिक विकास सीमित हो जाता है। जब मुद्रास्फीति में थोड़ी सी बढ़ोतरी होगी तो अर्थव्यवस्था के विकास की दर बढ़ेगी। मांग बढ़ेगी, उत्पादन बढ़ेगा। यह देश के हित में है।
देश में रोजगार की स्थिति और अवसर पर भी दिए जवाब
उत्तर : बजट का हर प्रावधान रोजगार के अवसर को बढ़ाने में सहायक होगा। अभी जो हमने अर्थव्यवस्था की स्थिति की चर्चा की, वह दरअसल अर्थशास्त्र का वर्चुअल साइकिल है। जब अर्थव्यवस्था में कर्मचारियों का वेतन बढ़ता है तो मांग में बढ़ोतरी होती है। जब मांग बढ़ेगी तो औद्योगिक उत्पादन बढ़ेगा। जब औद्योगिक उत्पादन बढ़ता है तो विकास दर बढ़ती है। यही वर्चुअल साइकिल कहलाता है। जब वर्चुअल साइकिल चलता है तो रोजगार के अवसर भी खूब बढ़ते हैं। बजट के हर प्रावधान का फोकस इसी पर है कि अर्थव्यवस्था की विकास दर में कैसे बढ़ोतरी हो।
प्रश्न : रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए उद्योग जगत का सहयोग मिलेगा?
उत्तर : उद्योग जगत का बिल्कुल सहयोग मिलेगा। हमने उनसे बात की थी। उन्होंने देश के श्रम कानूनों का हवाला दिया। उन्होंने बताया कि देश में अलग-अलग 44 श्रम कानून हैं जो कि उन्हें अधिक नौकरी देने से रोकते हैं। हमने उसे आसान करने का बीड़ा उठाया है। हम उन्हें चार खाने में डाल कर सिर्फ चार कानून बनाने पर काम कर रहे हैं।
हम यह जरूर ध्यान रखेंगे कि मजदूरों को सामाजिक सुरक्षा मिलती रहे, उनके वेतन में बढ़ोतरी होती रहे। साथ ही हम यह भी देखेंगे कि उनकी मोबिलिटी भी बनी रहे। वह एक जगह से छोड़ कर दूसरी जगह आसानी से नौकरी पकड़ सके। हमने इसे प्राथमिकता से करने का लक्ष्य तय किया है। चार में चार तो नहीं लेकिन तीन तो कुछ समय में आ ही जाएंगे।