{"_id":"6a2d87d7f1b7e2499d09a6e1","slug":"ex-cia-head-james-lawler-aka-mad-dog-enriched-uranium-seizure-how-us-helped-iran-irgc-pursuing-nuclear-weapon-2026-06-13","type":"story","status":"publish","title_hn":"परमाणु: 'यूरेनियम जब्त करना सुसाइड..'; पूर्व CIA अफसर ने चेतावनी के साथ बताई PAK के एक्यू खान पर नकेल की कहानी","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
परमाणु: 'यूरेनियम जब्त करना सुसाइड..'; पूर्व CIA अफसर ने चेतावनी के साथ बताई PAK के एक्यू खान पर नकेल की कहानी
Sat, 13 Jun 2026 10:10 PM IST
निर्मल कांत
एएनआई, नई दिल्ली।
एएनआई, नई दिल्ली।
Published by: निर्मल कांत
Updated Sat, 13 Jun 2026 10:10 PM IST
सार
अमेरिका के पूर्व सीआईए अधिकारी जेम्स लॉलर ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम और एक्यू खान नेटवर्क को लेकर बड़े खुलासे किए हैं। उन्होंने बताया कि कैसे एक गुप्त परमाणु नेटवर्क ने कई देशों तक तकनीक पहुंचाई। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि ईरान के परमाणु हथियार हासिल करने से पश्चिम एशिया में खतरनाक हथियारों की होड़ शुरू हो सकती है। पढ़िए रिपोर्ट-
विज्ञापन
जेम्स लॉलर, सीआईए के पूर्व अधिकारी
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक/एएनआई/वीडियो ग्रैब
विस्तार
अमेरिका के एक पूर्व खुफिया अधिकारी जेम्स लॉलर उर्फ मैड डॉग ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम और अब्दुल कादिर खान नेटवर्क को लेकर कई अहम खुलासे किए हैं। उन्होंने दावा किया कि अगर समय रहते कार्रवाई नहीं होती, तो दुनिया एक बड़े परमाणु संकट की ओर बढ़ सकती थी।
सीआईए में जेम्स लॉलर का सफर कैसे शुरू हुआ?
जेम्स लॉलर समाचार एजेंसी एएनआई को विस्तृत साक्षात्कार दिया। इसमें केंद्रीय खुफिया एजेंसी (सीआईए) के पूर्व अधिकारी ने बताया कि वह वर्ष 1980 में सीआईए में शामिल हुए और लंबे समय तक खुफिया अभियानों में काम किया। वर्ष 1994 में उन्हें परमाणु अप्रसार-निरोधक इकाई की जिम्मेदारी दी गई, जहां उनका मुख्य काम परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकना था। बाद में उन्हें ईरान के परमाणु हथियार कार्यक्रम के खिलाफ अभियान में लगाया गया।
शुरू में नहीं गया अब्दुल कादिर खान नेटवर्क पर ध्यान
उनके मुताबिक, अमेरिका और उसकी एजेंसियां लंबे समय से अब्दुल कादिर खान के नेटवर्क पर नजर रख रही थीं। लेकिन शुरुआती वर्षों में इस पर उतना ध्यान नहीं दिया गया, जितना देना चाहिए था। उन्होंने कहा कि खान को 'इस्लामी बम का जनक' कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं है, क्योंकि उसने पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम को मजबूत करने के साथ-साथ इसे अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क में बदल दिया।
विज्ञापन
लीबिया से ईरान तक एक ही परमाणु तकनीक
पूर्व अधिकारी ने लीबिया में हुई एक बड़ी कार्रवाई का जिक्र करते हुए बताया कि जब वहां परमाणु उपकरणों की रोकथाम की गई, तब यह साफ हुआ कि लीबिया को जो सेंट्रीफ्यूज तकनीक मिली थी, वही तकनीक ईरान तक भी पहुंची थी। उनके मुताबिक, ईरान के शुरुआती सेंट्रीफ्यूज मॉडल लगभग उन्हीं डिजाइनों पर आधारित थे, जो लीबिया को उपलब्ध कराए गए थे।
उन्होंने कहा कि यह पूरी व्यवस्था कॉपी पेस्ट तकनीक जैसी थी, जिससे ईरान को परमाणु कार्यक्रम शुरू करने में बड़ा फायदा मिला और उन्हें शुरुआत से नया डिजाइन विकसित नहीं करना पड़ा। उन्होंने यह भी बताया कि लीबिया को परमाणु संयंत्र के लिए जो सामग्री भेजी जा रही थी, उसमें हजारों पुर्जे शामिल थे। इसी दौरान एक बड़े अभियान में बीबीसी चाइना नामक जहाज को रोका गया और उसे इटली के बंदरगाह की ओर मोड़ा गया। इस जहाज में परमाणु कार्यक्रम से जुड़े कई जरूरी उपकरण थे। उन्होंने कहा कि यह कार्रवाई इतिहास की सबसे बड़ी परमाणु सामग्री रोकथाम कार्रवाइयों में से एक थी। इससे लीबिया का पूरा परमाणु कार्यक्रम प्रभावित हुआ।
ये भी पढ़ें: Explainer: होर्मुज में भारतीयों की मौत पर सरकार ने क्या किया, बड़े कूटनीतिक मामलों में कैसा रहा है हमारा रुख?
पश्चिम एशिया में शुरू हो सकती है परमाणु हथियारों की दौड़?
ईरान के बारे में बात करते हुए पूर्व अधिकारी ने कहा कि ईरानी वैज्ञानिक बेहद सक्षम हैं। उन्होंने समय के साथ अपनी तकनीक विकसित की है। लेकिन शुरुआती दौर में उन्हें बाहरी नेटवर्क से अहम मदद मिली थी। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर ईरान परमाणु हथियार हासिल कर लेता है, तो पश्चिम एशिया में 'परमाणु हथियारों की दौड़' शुरू हो सकती है। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र और तुर्किये जैसे देश भी परमाणु क्षमता की ओर बढ़ सकते हैं, जिससे पूरा क्षेत्र अस्थिर हो जाएगा।
सबसे बड़ा खतरा क्या है?
पूर्व अधिकारी ने यह भी कहा कि परमाणु सामग्री को हटाना या नष्ट करना बेहद जटिल और खतरनाक प्रक्रिया है, क्योंकि यह कई टन मलबे और रेडियोधर्मी गैस के नीचे दबा हो सकता है। उन्होंने इसे लगभग 'आत्मघाती मिशन' जैसा बताया। उन्होंने कहा कि सबसे बड़ा खतरा केवल ईरान का परमाणु हथियार नहीं है, बल्कि उसके बाद शुरू होने वाली क्षेत्रीय परमाणु प्रतिस्पर्धा है, जो दुनिया के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है।
विज्ञापन
सीआईए में जेम्स लॉलर का सफर कैसे शुरू हुआ?
जेम्स लॉलर समाचार एजेंसी एएनआई को विस्तृत साक्षात्कार दिया। इसमें केंद्रीय खुफिया एजेंसी (सीआईए) के पूर्व अधिकारी ने बताया कि वह वर्ष 1980 में सीआईए में शामिल हुए और लंबे समय तक खुफिया अभियानों में काम किया। वर्ष 1994 में उन्हें परमाणु अप्रसार-निरोधक इकाई की जिम्मेदारी दी गई, जहां उनका मुख्य काम परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकना था। बाद में उन्हें ईरान के परमाणु हथियार कार्यक्रम के खिलाफ अभियान में लगाया गया।
विज्ञापन
शुरू में नहीं गया अब्दुल कादिर खान नेटवर्क पर ध्यान
उनके मुताबिक, अमेरिका और उसकी एजेंसियां लंबे समय से अब्दुल कादिर खान के नेटवर्क पर नजर रख रही थीं। लेकिन शुरुआती वर्षों में इस पर उतना ध्यान नहीं दिया गया, जितना देना चाहिए था। उन्होंने कहा कि खान को 'इस्लामी बम का जनक' कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं है, क्योंकि उसने पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम को मजबूत करने के साथ-साथ इसे अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क में बदल दिया।
विज्ञापन
लीबिया से ईरान तक एक ही परमाणु तकनीक
पूर्व अधिकारी ने लीबिया में हुई एक बड़ी कार्रवाई का जिक्र करते हुए बताया कि जब वहां परमाणु उपकरणों की रोकथाम की गई, तब यह साफ हुआ कि लीबिया को जो सेंट्रीफ्यूज तकनीक मिली थी, वही तकनीक ईरान तक भी पहुंची थी। उनके मुताबिक, ईरान के शुरुआती सेंट्रीफ्यूज मॉडल लगभग उन्हीं डिजाइनों पर आधारित थे, जो लीबिया को उपलब्ध कराए गए थे।
उन्होंने कहा कि यह पूरी व्यवस्था कॉपी पेस्ट तकनीक जैसी थी, जिससे ईरान को परमाणु कार्यक्रम शुरू करने में बड़ा फायदा मिला और उन्हें शुरुआत से नया डिजाइन विकसित नहीं करना पड़ा। उन्होंने यह भी बताया कि लीबिया को परमाणु संयंत्र के लिए जो सामग्री भेजी जा रही थी, उसमें हजारों पुर्जे शामिल थे। इसी दौरान एक बड़े अभियान में बीबीसी चाइना नामक जहाज को रोका गया और उसे इटली के बंदरगाह की ओर मोड़ा गया। इस जहाज में परमाणु कार्यक्रम से जुड़े कई जरूरी उपकरण थे। उन्होंने कहा कि यह कार्रवाई इतिहास की सबसे बड़ी परमाणु सामग्री रोकथाम कार्रवाइयों में से एक थी। इससे लीबिया का पूरा परमाणु कार्यक्रम प्रभावित हुआ।
ये भी पढ़ें: Explainer: होर्मुज में भारतीयों की मौत पर सरकार ने क्या किया, बड़े कूटनीतिक मामलों में कैसा रहा है हमारा रुख?
पश्चिम एशिया में शुरू हो सकती है परमाणु हथियारों की दौड़?
ईरान के बारे में बात करते हुए पूर्व अधिकारी ने कहा कि ईरानी वैज्ञानिक बेहद सक्षम हैं। उन्होंने समय के साथ अपनी तकनीक विकसित की है। लेकिन शुरुआती दौर में उन्हें बाहरी नेटवर्क से अहम मदद मिली थी। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर ईरान परमाणु हथियार हासिल कर लेता है, तो पश्चिम एशिया में 'परमाणु हथियारों की दौड़' शुरू हो सकती है। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र और तुर्किये जैसे देश भी परमाणु क्षमता की ओर बढ़ सकते हैं, जिससे पूरा क्षेत्र अस्थिर हो जाएगा।
सबसे बड़ा खतरा क्या है?
पूर्व अधिकारी ने यह भी कहा कि परमाणु सामग्री को हटाना या नष्ट करना बेहद जटिल और खतरनाक प्रक्रिया है, क्योंकि यह कई टन मलबे और रेडियोधर्मी गैस के नीचे दबा हो सकता है। उन्होंने इसे लगभग 'आत्मघाती मिशन' जैसा बताया। उन्होंने कहा कि सबसे बड़ा खतरा केवल ईरान का परमाणु हथियार नहीं है, बल्कि उसके बाद शुरू होने वाली क्षेत्रीय परमाणु प्रतिस्पर्धा है, जो दुनिया के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है।