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सुप्रीम कोर्ट का फैसला: आपराधिक मामले का खुलासा नहीं करने पर शिक्षक की बर्खास्तगी बरकरार

Sat, 02 Apr 2022 04:01 PM IST
Amit Mandal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Amit Mandal Updated Sat, 02 Apr 2022 04:01 PM IST
सार

शिक्षत की बर्खास्तगी को बरकरार रखते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि सरकारी पद पर रहने के इच्छुक कर्मचारी को पूरी ईमानदारी और सच्चाई के साथ काम करना चाहिए।

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Employee desirous of holding civil post has to act with utmost good faith & truthfulness: SC
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने एक शिक्षक के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले का आधिकारिक प्रपत्रों में खुलासा नहीं करने पर बर्खास्तगी को बरकरार रखते हुए कहा कि सरकारी पद पर रहने के इच्छुक कर्मचारी को पूरी ईमानदारी और सच्चाई के साथ काम करना चाहिए। यह व्यक्ति 1999 में गणित के एक प्रशिक्षित स्नातक शिक्षक के रूप में शामिल हुआ था। 2008 में उसे तब सेवा से हटा दिया गया था, जब यह पाया गया कि उसने राजस्थान में दर्ज मामले की जानकारी छिपाई थी। न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता और न्यायमूर्ति वी रामसुब्रमण्यम की पीठ ने 31 मार्च को पारित अपने आदेश में कहा कि प्रतिवादी पर युवा छात्रों के करियर को आकार देने की जिम्मेदार थी। वह असत्य पर आधारित अपने आचरण से विद्यार्थियों को किस प्रकार का संदेश देंगे? 

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शीर्ष अदालत ने दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा पारित दिसंबर 2012 के आदेश के खिलाफ दिल्ली सरकार और अन्य द्वारा दायर अपील की अनुमति दी, जिसने मामले में केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) के आदेश को रद्द कर दिया था। कैट ने सेवा से हटाने के आदेश को चुनौती देने वाले व्यक्ति की अर्जी खारिज कर दी थी। शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए कैट द्वारा पारित आदेश को बहाल कर दिया। अदालत ने कहा कि सरकारी पद पर रहने के इच्छुक कर्मचारी को अत्यंत सद्भावना और सच्चाई के साथ कार्य करना होता है।  
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शीर्ष अदालत के समक्ष बहस के दौरान प्रतिवादी के वकील ने तर्क दिया था कि चूंकि उसकी हिंदी में शिक्षा थी, इसलिए वह सत्यापन के लिए दिए गए फॉर्म में अभियोजन शब्द का अर्थ नहीं समझ सका और इसे गलत तरीके से भर दिया। पीठ ने कहा कि हमें लगता है कि प्रशिक्षित स्नातक शिक्षक के पद पर नियुक्ति की मांग करने वाला प्रतिवादी कोई अनपढ़ या अशिक्षित व्यक्ति नहीं है जो अभियोजन शब्द के अर्थ से अनभिज्ञ होने का दावा कर सकता है। हमने पाया कि नवंबर 1999 में दिल्ली अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड द्वारा आयोजित परीक्षा के बाद उस व्यक्ति को गणित के प्रशिक्षित स्नातक शिक्षक के पद की पेशकश की गई थी और उसने दिसंबर 1999 में ज्वाइन किया था। 
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ज्वाइन करने के बाद सत्यापन के लिए एक प्रपत्र दिया गया था। इसमें पूछा गया था कि क्या आप पर कभी मुकदमा चलाया गया है। उन्होंने इस प्रश्न का उत्तर नहीं में दिया था। उन्होंने दिसंबर 2005 में फिर से प्रपत्र भरा और इस बात से इनकार किया कि उन पर मुकदमा चलाया गया था। हालांकि, सत्यापन के दौरान यह पाया गया कि उनके खिलाफ एक आपराधिक मामला दर्ज किया गया था और अप्रैल 1994 में राजस्थान की एक अदालत में आरोप पत्र दायर किया गया था। जून 2006 में उन्हें एक नोटिस दिया गया था जिसमें उन्हें यह बताने के लिए कहा गया था कि उन्होंने इस तथ्य को क्यों छुपाया। इसके जवाब में उन्होंने कहा था कि वह बरी होने के बाद घटना के बारे में भूल गए थे और कॉलम को जल्दबाजी में भर दिया गया था। उस व्यक्ति ने यह भी कहा था कि वह जुलाई 1996 से दिल्ली में रह रहा है और उसे 1996 के बाद मामले की स्थिति के बारे में कोई जानकारी नहीं है।
 

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