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Judiciary: 'आईटी कानून के 25 साल बाद भी इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य पेचीदा', जस्टिस भारती डांगरे की टिप्पणी

Thu, 25 Sep 2025 03:16 PM IST
निर्मल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पणजी।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पणजी। Published by: निर्मल कांत Updated Thu, 25 Sep 2025 03:16 PM IST
सार

Judiciary: जस्टिस भारती डांगरे ने कहा कि कानूनी क्षेत्र से जुड़े सभी लोगों को इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की कानूनी और व्यावहारिक पेचीदगियों को गंभीरता से समझने की जरूरत है। उन्होंने कहा, पच्चीस साल बाद भी यह बहुत पेचीदा है। हमें आज भी ठीक से नहीं पता कि इसे सही तरीके से कैसे स्वीकार करें। इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों पर बहुत सावधानी के साथ भरोसा करना होगा।

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Electronic evidence poses challenges even after 25 yrs of IT Act: Justice Bharati Dangre
इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : फ्रीपिक

विस्तार

बॉम्बे हाईकोर्ट की जस्टिस भारती डांगरे ने कहा कि 2000 में सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) कानून लागू होने के 25 साल बाद भी अदालतों और जांच एजेंसियों को इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को समझने और स्वीकार करने में अब भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, जबकि ये सबूत आपराधिक मामलों में बेहद अहम भूमिका निभाते हैं। जस्टिस डांगरे गोवा राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण और गोवा हाईकोर्ट बार संघ की ओर से पणजी में आयोजित एक कार्यशाला को संबोधित कर रही थीं। 
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उन्होंने कहा कि जब भारत के साक्ष्य अधिनियम के तहत प्राथमिक और द्वितीयक सबूतों की पारंपरिक समझ थोड़ी स्थिर हो रही थी, तभी आईटी कानून ने इसमें नई जटिलताएं जोड़ दीं। उन्होंने कहा, अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि हम इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को एक सबूत के रूप में कैसे स्वीकार करें। उन्होंने बताया कि वर्ष 2000 में आईटी कानून लागू होने के बाद भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और साक्ष्य अधिनियम में कई बदलाव किए गए। जस्टिस डांगरे ने कहा, इस कानून को लागू हुए करीब पच्चीससाल हो चुके हैं। लेकिन हम अब तक यह समझने के लिए संघर्ष कर रहे हैं कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को लंबे समय तक कैसे समझा और स्वीकार किया जाए। 
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उन्होंने कानूनी क्षेत्र से जुड़े सभी लोगों को इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की कानूनी और व्यावहारिक पेचीदगियों को गंभीरता से समझने की जरूरत है। उन्होंने कहा, पच्चीस साल बाद भी यह बहुत पेचीदा है। हमें आज भी ठीक से नहीं पता कि इसे सही तरीके से कैसे स्वीकार करें। इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों पर बहुत सावधानी के साथ भरोसा करना होगा। जस्टिस डांगरे ने कहा, कोई भी मुकदमा जितने ज्यादा सबूतों पर नहीं, बल्कि जितने बेहतर और गुणवत्ता वाले साक्ष्यों पर टिका होता है, उसी पर निर्भर करता है कि कैसे फैसला होगा। उन्होंने यह भी कहा कि एक बार जब कोई सबूत निचली अदालत में आ जाता है, तो वहीं सबूत आगे हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट तक भी चलता है। 

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