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एक्सप्लेनर: क्या है फॉर्म-6, जिस पर सियासी गलियारों से लेकर अदालत तक मचा बवाल; चुनाव आयोग पर क्यों उठे सवाल?

Tue, 06 Oct 2026 05:26 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Tue, 06 Oct 2026 05:26 PM IST
सार

वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने वाले फॉर्म-6 में बदलाव को लेकर चुनाव आयोग विवादों में है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, विपक्ष के आरोप और ईसीआई की सफाई का पूरा सच जानिए।

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Election Commission Form 6 controversy Supreme Court SIR explainer in hindi
फॉर्म-6 पर पैदा हुआ विवाद। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

निर्वाचन आयोग (ईसीआई) की तरफ से शुरू की गई विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया लगातार विवादों में है। आयोग पर आरोप है कि उसने एसआईआर के तहत अलग-अलग राज्यों में कई पात्र मतदाताओं को भी वोटिंग के अधिकार से वंचित कर दिया। इतना ही नहीं मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार पर भी अपने साथी चुनाव आयुक्तों की ओर से कुछ प्रक्रियाओं पर उठाई गई आपत्तियों को दरकिनार करने के आरोप लगे हैं। 
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अब ताजा विवाद वोटरों को जोड़ने के लिए तय प्रक्रिया में अवैध तरह से बदलाव करने को लेकर उठा है। देश की शीर्ष अदालत और विपक्षी दलों ने एसआईआर के बाद नए वोटरों को वोटिंग लिस्ट में शामिल करने के लिए तय फॉर्म-6 में बदलाव को लेकर सवाल उठाया है।
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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर यह फॉर्म-6 क्या है, जिसे लेकर चुनाव आयोग फिर से विवादों के केंद्र में है? इसे लेकर विवाद क्या है और चुनाव आयोग का इस पर ताजा पक्ष क्या है? सियासी दलों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक ने इस मामले में क्या कहा है? आइये जानते हैं...
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पहले जानें- क्या है फॉर्म-6, जिससे वोटर लिस्ट में जुड़ते हैं मतदाताओं के नाम?

फॉर्म-6 भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) द्वारा जारी किया गया एक आधिकारिक आवेदन पत्र है, जिसका इस्तेमाल नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए किया जाता है। इसे मतदाता अंग्रेजी या अपने राज्य की भाषा के हिसाब से भर सकते हैं। 

ये भी पढ़ें: भाजपा: विपक्ष के चुनाव आयोग के खिलाफ मार्च पर संबित पात्रा का पलटवार, कहा- संस्थाओं को बदनाम करने की कोशिश

Election Commission Form 6 controversy Supreme Court SIR explainer in hindi
फॉर्म-6। - फोटो : अमर उजाला
फॉर्म-6 भरने वाले नागरिकों के लिए एक घोषणापत्र पर भी हस्ताक्षर करना होता है, जिसके तहत अगर वे इस फॉर्म में गलत जानकारी देते हैं तो जनप्रतिनिधित्व कानून, 1950 की धारा 31 के तहत उन पर कार्रवाई हो सकती है। 


अब जानें- फॉर्म-6 को लेकर क्या विवाद उठा है? 

फॉर्म-6 को लेकर उठा ताजा विवाद मुख्य रूप से चुनाव आयोग की ओर से मतदाता पंजीकरण फॉर्म में किए गए बिना मंजूरी वाले बदलावों, कानूनी प्रक्रिया के उल्लंघन और सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी को लेकर किए गए दावों पर केंद्रित है।

फॉर्म-6 में जोड़ा गया नया घोषणा पत्र 
  • चुनाव आयोग की ओर से चलाए जा रहे एसआईआर के दौरान जुलाई में ऑनलाइन फॉर्म-6 में एक नई घोषणा जोड़ी गई। इसमें आवेदकों से यह बताने को कहा गया कि क्या उनका, उनके माता-पिता या दादा-दादी का नाम 2000 के दशक के पिछले एसआईआर की मतदाता सूची में शामिल था या नहीं।
  • इस घोषणा को अनिवार्य चिह्नित नहीं किया गया था, लेकिन कथित तौर पर इसे भरे बिना ऑनलाइन आवेदन सबमिट ही नहीं किया जा सकता था। अगर यूजर इस घोषणा में गलत जानकारी दे देता तो उस पर  जनप्रतिनिधित्व अधिनियम तहत दंडात्मक कार्रवाई भी हो सकती थी, क्योंकि यह फॉर्म-6 का हिस्सा था।

नियमों और कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन
  • जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 28 के तहत चुनावी फॉर्म में किसी भी तरह का संशोधन करने का काम सिर्फ केंद्र सरकार राजपत्र (गजट) अधिसूचना जारी करके कर सकती है। इसके लिए उसे संसद की स्वीकृति लेना जरूरी है। आरोप है कि चुनाव आयोग ने कथित तौर पर बिना किसी सरकारी अधिसूचना या नियम संशोधन के ही यह बदलाव कर दिया।
  • द इंडियन एक्सप्रेस की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने इस बदलाव पर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई थी। चुनाव आयुक्त संधू ने इसे अनाधिकृत और अवैध बताते हुए तुरंत हटाने की मांग की थी। हालांकि, इसे फॉर्म में लंबे समय तक बरकरार रखा गया।


फॉर्म-6 पर लेकर उठे इन विवादों पर विपक्ष क्यों भड़का?

कांग्रेस सांसद जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि फॉर्म-6 में आवेदकों से उनके माता-पिता या दादा-दादी के 2000 के दशक की शुरुआत के पिछले एसआईआर रिकॉर्ड से लिंक की जानकारी मांगने से पहली बार मतदान करने वाले युवा मतदाताओं के लिए मतदाता सूची में नाम जुड़वाना बेहद कठिन बना दिया गया।

उधर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर पद का दुरुपयोग करने और सत्ताधारी दल- भाजपा की मदद के लिए एकतरफा और अवैध रूप से फॉर्म-6 बदलने का सीधा आरोप लगाया। विपक्ष का मानना है कि यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया और सांविधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर बड़ा हमला है।

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फॉर्म-6 पर नए विवाद पर विपक्ष। - फोटो : अमर उजाला

फॉर्म-6 को लेकर विवाद पर चुनाव आयोग ने क्या-क्या कहा है?

  • चुनाव आयोग ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर लगे एकतरफा कदम उठाने के आरोपों को खारिज करते हुए राहुल गांधी के बयानों को भ्रामक करार दिया है।
  • ईसी का कहना है कि बिहार में एसआईआर से जुड़ा 24 जून 2025 का आदेश पूरे आयोग की सर्वसम्मति से जारी किया गया था।
  • आयोग ने 26 सितंबर के प्रेस नोट (संख्या 120) का हवाला देते हुए कहा कि फॉर्म-6 के साथ जुड़े घोषणापत्र को सुप्रीम कोर्ट ने 27 मई 2026 के अपने फैसले में मान्य ठहराया था।
  • आयोग ने स्पष्ट किया कि यह अतिरिक्त घोषणापत्र केवल उन्हीं राज्यों में ऑनलाइन पोर्टल पर रखा गया था जहां एसआईआर प्रक्रिया जारी थी। 
  • ईसी के मुताबिक, जिन राज्यों में एसआईआर खत्म हो गया था, वहां से इसे हटा दिया गया। इसके अलावा, गैर-एसआईआर अवधि के लिए 1960 के नियमों के तहत मानक फॉर्म ही लागू रहते हैं।
  • चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेदों की रिपोर्ट पर आयोग का रुख यह रहा कि किसी भी निर्णय से पहले अलग-अलग राय होना आयोग के भीतर विचार-विमर्श की स्वाभाविक प्रक्रिया का हिस्सा है।

फॉर्म-6 को लेकर उठा विवाद सुप्रीम कोर्ट कैसे पहुंचा?

  • 5 अक्तूबर (सोमवार) को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और एसआईआर प्रक्रिया के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा था। इसी दौरान फॉर्म-6 का मुद्दा भी उठा। 
  • दरअसल, एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि चुनाव आयोग ने 26 सितंबर को एक प्रेस नोट जारी किया था। इसमें आयोग ने फॉर्म-6 में जोड़ी गई नई घोषणा को सुप्रीम कोर्ट की तरफ से मान्य ठहराए जाने की बात कही थी।
  • इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने सख्त रुख अपनाया और फॉर्म-6 को लेकर कई अहम बातें कहीं।

ये भी पढ़ें: फॉर्म-6 पर गरमाई सियासत: सीईसी के खिलाफ विपक्ष ने खोला मोर्चा, पूछा- जनता को बताएं आखिर बदलाव किसने किए?

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फॉर्म-6 पर चुनाव आयोग के दावों पर सुप्रीम कोर्ट। - फोटो : अमर उजाला

देश में कहां हो चुका और कहां चल रहा है एसआईआर?

चुनाव आयोग के चरण-3 के दस्तावेज के अनुसार, पहले दो चरणों में 13 राज्य/केंद्र शासित प्रदेशों में एसआईआर हो चुका है, जबकि तीसरे चरण में 16 राज्य और 3 केंद्रशासित प्रदेश यानी कुल 19 जगहों पर एसआईआर की प्रक्रिया है।

पहले दो चरणों में  बिहार, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, केरल, मध्य प्रदेश, पुडुचेरी, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और लक्षद्वीप में एसआईआर हो चुका है।

तीसरे चरण में ओडिशा, मिजोरम, सिक्किम, मणिपुर, दादरा एवं नगर हवेली और दमन एवं दीव, उत्तराखंड, आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, हरियाणा, चंडीगढ़, तेलंगाना, पंजाब, कर्नाटक, मेघालय, महाराष्ट्र, झारखंड, दिल्ली, नागालैंड और त्रिपुरा में एसआईआर की प्रक्रिया चल रही है। कई राज्यों में अंतिम मतदाता सूची जारी भी हो चुकी है और फॉर्म-6 के जरिए नामों को जोड़े जाने की प्रक्रिया भी जारी है। 


इसके बाद एसआईआर कहां होगा?

हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में एसआईआर बाद में कराया जाना है। इन तीनों के लिए कार्यक्रम अभी घोषित नहीं किया गया है। चुनाव आयोग ने इसके पीछे जनगणना के दूसरे चरण के पूरा होने और ऊंचाई वाले इलाकों में मौसम की स्थिति को ध्यान में रखने की बात कही है।

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