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नए साल तक मिल पाएगी आर्थिक मंदी के खत्म होने की खबर, तब तक सरकार को ये सब करना होगा
Tue, 20 Aug 2019 06:32 PM IST
अमर शर्मा
जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली
Published by: अमर शर्मा
Updated Tue, 20 Aug 2019 06:32 PM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर
अर्थव्यवस्था में आई मंदी इतनी जल्दी खत्म होने वाली नहीं है। अभी दूसरी तिमाही चल रही है। दिसंबर के बाद यानी नववर्ष 2020 में ही इस आर्थिक मंदी के खत्म होने की खबर मिल सकती है। चीफ इकॉनोमिस्ट पीएचडी चैंबर, एसपी शर्मा का दावा है कि यह मंदी एक साइक्लिक स्लो डाउन है, लेकिन इसके परिणाम काफी गंभीर होंगे। नववर्ष तक अर्थव्यवस्था को उभारने के लिए केंद्र सरकार को एक-दो नहीं, बल्कि कई क्षेत्रों को आर्थिक पैकेज देना होगा। चूंकि अर्थव्यवस्था के विकास में सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्यम 'एमएसएमई' का 30-31 प्रतिशत योगदान रहता है, इसलिए सरकार को इस क्षेत्र की ओर ज्यादा से ज्यादा ध्यान देना चाहिए। 'एमएसएमई' क्षेत्र में सरकारी प्रोत्साहन मंदी की मार को कम करने में मददगार साबित हो सकता है।
बता दें कि उद्योग संघ एसोचैम ने भी इस मंदी का मुकाबला करने के लिए पहले ही प्रोत्साहन पैकेज जारी करने की मांग कर रखी है। पिछले दिनों पीएम की आर्थिक सलाहकार काउंसिल के अध्यक्ष बिबेक देबराय ने सरकार के सामने अर्थव्यवस्था को दोबारा पटरी पर लाने के लिए जो रोडमैप तैयार किया था, उसमें भारतीय उद्योगों के लिए कम से कम एक लाख करोड़ रुपये का पैकेज देने की आवश्यकता बताई गई है। एसोचैम के अध्यक्ष बीके गोयनका भी पिछले दिनों वित्त मंत्री से मिल कर एक लाख करोड़ के प्रोत्साहन पैकेज की मांग कर चुके हैं।
चीफ इकॉनोमिस्ट पीएचडी चैंबर एसपी शर्मा का कहना है कि देश की अर्थव्यवस्था को ऊपर उठाने वाले फैक्टर अभी मौजूद हैं, लेकिन उन्हें प्रोत्साहन पैकेज का धक्का चाहिए। बहुत से जानकार इस मंदी को ढांचागत मंदी यानी स्ट्रक्चर्ल स्लो डाउन का नाम दे रहे हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। इस तरह के स्लो डाउन आते रहते हैं। यह साइक्लिक स्लो डाउन है। इसमें कुछ समय के लिए खासतौर पर उपभोक्ता के इस्तेमाल वाली वस्तुओं के सेक्टर में स्लो डाउन आ जाता है। उदाहरण के लिए जैसे ऑटो सेक्टर, इलेक्ट्रॉनिक और हाउसिंग आदि में मंदी का ज्यादा असर देखा जा रहा है।
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केंद्र सरकार ने हाल ही में अर्थव्यवस्था के कई बड़े सेक्टरों को लेकर एक हाई प्रोफाइल बैठक की है। इसमें आर्थिक क्षेत्र को जो प्रोत्साहन पैकेज देने की योजना बनाई जा रही है, उसमें एमएसएमई का विशेष जिक्र किया गया है। इसकी वजह, अर्थव्यवस्था के विकास में एमएसएमई का 30 प्रतिशत हिस्सा होना है। सरकार का यह कदम स्लो डाउन से उभारने में काफी मदद कर सकता है। दूसरी ओर, अर्थशास्त्री बिबेक देबराय ने भी सरकार को कई अहम सुझाव दिए थे। उन्होंने जीएसटी की दरें कम करने की बात कही थी। जैसे इन दरों का तीन स्तरीय स्लैब तय कर दिया जाए। इसमें 6, 12 और 18 फीसदी के स्लैब की बात कही गई है।
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बता दें कि उद्योग संघ एसोचैम ने भी इस मंदी का मुकाबला करने के लिए पहले ही प्रोत्साहन पैकेज जारी करने की मांग कर रखी है। पिछले दिनों पीएम की आर्थिक सलाहकार काउंसिल के अध्यक्ष बिबेक देबराय ने सरकार के सामने अर्थव्यवस्था को दोबारा पटरी पर लाने के लिए जो रोडमैप तैयार किया था, उसमें भारतीय उद्योगों के लिए कम से कम एक लाख करोड़ रुपये का पैकेज देने की आवश्यकता बताई गई है। एसोचैम के अध्यक्ष बीके गोयनका भी पिछले दिनों वित्त मंत्री से मिल कर एक लाख करोड़ के प्रोत्साहन पैकेज की मांग कर चुके हैं।
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चीफ इकॉनोमिस्ट पीएचडी चैंबर एसपी शर्मा का कहना है कि देश की अर्थव्यवस्था को ऊपर उठाने वाले फैक्टर अभी मौजूद हैं, लेकिन उन्हें प्रोत्साहन पैकेज का धक्का चाहिए। बहुत से जानकार इस मंदी को ढांचागत मंदी यानी स्ट्रक्चर्ल स्लो डाउन का नाम दे रहे हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। इस तरह के स्लो डाउन आते रहते हैं। यह साइक्लिक स्लो डाउन है। इसमें कुछ समय के लिए खासतौर पर उपभोक्ता के इस्तेमाल वाली वस्तुओं के सेक्टर में स्लो डाउन आ जाता है। उदाहरण के लिए जैसे ऑटो सेक्टर, इलेक्ट्रॉनिक और हाउसिंग आदि में मंदी का ज्यादा असर देखा जा रहा है।
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केंद्र सरकार ने हाल ही में अर्थव्यवस्था के कई बड़े सेक्टरों को लेकर एक हाई प्रोफाइल बैठक की है। इसमें आर्थिक क्षेत्र को जो प्रोत्साहन पैकेज देने की योजना बनाई जा रही है, उसमें एमएसएमई का विशेष जिक्र किया गया है। इसकी वजह, अर्थव्यवस्था के विकास में एमएसएमई का 30 प्रतिशत हिस्सा होना है। सरकार का यह कदम स्लो डाउन से उभारने में काफी मदद कर सकता है। दूसरी ओर, अर्थशास्त्री बिबेक देबराय ने भी सरकार को कई अहम सुझाव दिए थे। उन्होंने जीएसटी की दरें कम करने की बात कही थी। जैसे इन दरों का तीन स्तरीय स्लैब तय कर दिया जाए। इसमें 6, 12 और 18 फीसदी के स्लैब की बात कही गई है।