छत का गेट बंद न होता तो बच जाती कई जानें, इस वजह से तीसरी मंजिल पर हुई सबसे ज्यादा मौत
- छत पर पहुंचकर दूसरी इमारतों में जाकर बचा सकते थे अपनी जान
- सुरक्षा कारणों से रात के समय बंद रहता था छत का दरवाजा
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फिल्मिस्तान की जिस इमारत में 43 लोगों की जान गई, अगर उस इमारत की छत का गेट बंद न होता तो शायद इतने लोगों की जान न जाती। लोग छत पर पहुंचकर पास की दूसरी इमारतों पर कूदकर अपनी जान बचा सकते थे। मगर इमारत की छत का गेट सुरक्षा कारणों से रात के समय बंद कर दिया जाता था।
यही कारण है कि मजदूर अपनी जान बचाने के लिए भाग भी नहीं पाए और तड़प-तड़प कर उनकी मौत हो गई। घटनास्थाल के एक करीबी परिवार ने अमर उजाला को बताया कि इस इलाके में छोटी-मोटी चोरियां बहुत होती हैं। इससे बचने के लिए लोग अपनी छतों के गेट बंद रखते हैं। लोग अपनी खिड़कियों में भी ग्रिल लगवाते हैं। किसी दुर्घटना के समय कांच या सीमेंट की जाली तो टूट जाती है, लेकिन लोहे की रॉड से बनी ग्रिल नहीं टूटती। इस मामले में भी यही हुआ जो दुर्घटना के समय जानलेवा साबित हुआ।
सुरक्षाकर्मियों को आशंका है कि दूसरी मंजिल पर आग लगने के बाद मजदूर भागकर तीसरी और चौथी मंजिल पर चले गए। मगर चौथी मंजिल पर छत का गेट खुला न होने के कारण एक तरफ तो वे भाग नहीं पाए। दूसरी ओर नीचे से लगातार ऊपर आ रहा धुंआ उनका दम घोट रहा था। धुंआ निकलने के लिए कोई जगह नहीं थी।
धुआं चौथी मंजिल पर लगातार भरता गया, जिससे बचने के लिए मजदूर नीचे तीसरी मंजिल पर आए होंगे। इससे नीचे जाने का कोई मौका उनके पास नहीं था क्योंकि दूसरी मंजिल पर आग लगी हुई थी जो लगातार विकराल होती जा रही थी। फैक्ट्री के लिए रखे कच्चे माल में चमड़े, कागज और पेंट इत्यादि चीजें थीं। ये पदार्थ तेजी से आग पकड़ते हैं। आग भड़कने के कारण मजदूर नीचे नहीं आ पाए। यही कारण है कि तीसरी मंजिल पर ही सबसे ज्यादा लोगों की मौत हुई।
एक—दूसरे से सटी हुई इमारतें
इस इलाके के सभी मकान एक दूसरे से सटे हुए हैं। दो मकानों के बीच गली के लिए जगह भी बहुत कम ही मामलों में छोड़ी गई है। यही कारण है कि एक छत से कूदकर दूसरी छत पर आसानी से पहुंचा जा सकता है। अगर मजदूरों के पास छत के गेट की चाबी होती तो वे छत पर पहुंचकर और दूसरी छतों पर कूदकर अपनी जान बचा सकते थे।
बिल्कुल साथ-साथ घर बनाने से मकान के दो तरफ खिड़कियों को बनाने की कोई गुंजाइश नहीं होती। इस इमारत में भी यही हुआ है। इसके आलावा पीछे की दीवार के साथ भी अन्य इमारत बनाई गई है जो पीछे की गली में खुलती है। यानी इस गली की जितनी भी इमारतें हैं, सबमें खिड़की बनाए जाने की संभावना केवल सामने की तरफ है। इस इमारत में भी सामने की तरफ खिड़की बनी हुई है।
एसी से खिड़कियां बंद
आजकल शहरों की ज्यादा गर्मी में एयर कंडीशनर के बिना काम करना मुश्किल लगता है। इस इमारत की हर मंजिल पर एसी लगी हुआ है यानी एकमात्र खिड़की जो साफ हवा आने या धुंआ बाहर निकलने के लिए उपयोग हो सकती थी, उन सबमें एसी लगा हुआ था। इसलिए इन खिड़कियों से भी धुंआ बाहर नहीं निकल पाया, जबकि धुआं नीचे से लगातार भरता रहा जो अंततः जानलेवा साबित हुआ।
मकान के सामने ग्राउंड फ्लोर पर हरे रंग की एक बड़ा शटर लगा हुआ है, जो इमारत के लिए प्रवेश द्वार की तरह काम करता है। इस गेट के बगल से ही ऊपर की तरफ जाने के लिए सीढ़ियां बनी हुई हैं। सीढ़ियों पर रोशनी के लिए हर फ्लोर पर ग्रिल लगाई गई है यानी फैक्टरियों के लिए मकान के पीछे वाले हिस्से की जगह मिली जहां हवा-धुआं निकलने के लिए कोई जगह नहीं निकाली जा सकती है। इस तरह धुएं को बाहर निकलने के लिए किसी तरफ से कोई जगह नहीं मिली और यह घर के अंदर ही भरती रही।