Delhi Blast: क्या दिल्ली में बिगड़ी 'व्हाइट कॉलर' टेरर की टाईमिंग, 'अफगानिस्तान' ब्लास्ट तकनीक में 'चूक' कहां?
लाल किले के पास हुए धमाके के बाद कई सवाल खड़े हो रहे हैं। क्या दिल्ली में 'व्हाइट कॉलर' टेरर की टाईमिंग बिगड़ी या वह एक फिदायीन अटैक था। अगर वह फिदायीन अटैक नहीं था तो 'अफगानिस्तान' की ब्लास्ट तकनीक में आतंकियों से कहां पर 'चूक' हो गई। पढ़िए ये रिपोर्ट
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दिल्ली में लालकिले के निकट एक कार में हुए धमाके की जांच अब एनआईए को सौंप दी गई है। जांच एजेंसियां, कई एंगल से इस हमले को देख रही हैं। दिल्ली एनसीआर के क्षेत्र फरीदाबाद में अल-फलाह अस्पताल में काम करने वाले डॉ. मुजम्मिल शकील को जम्मू-कश्मीर पुलिस ने रविवार को गिरफ्तार किया था। पुलिस ने उनके किराए के घर से 2,900 किलोग्राम विस्फोटक सामग्री बरामद की। अमोनियम नाइट्रेट के अलावा असॉल्ट राइफल, टाइमर, डेटोनेटर, बैटरी और गोला-बारूद बरामद हुआ। इस सामग्री के जरिए चार पांच किलोमीटर तक तबाही मचाई जा सकती है। क्या दिल्ली में 'व्हाइट कॉलर' टेरर की टाईमिंग बिगड़ी या वह एक फिदायीन अटैक था। अगर वह फिदायीन अटैक नहीं था तो 'अफगानिस्तान' की ब्लास्ट तकनीक में आतंकियों से कहां पर 'चूक' हो गई।
देश में छह सौ से अधिक ब्लास्ट मामलों की जांच कर चुके एक अनुभवी बैलिस्टिक एक्सपर्ट कहते हैं, इतनी भारी मात्रा में मिली विस्फोटक सामग्री का मतलब है कि आतंकी, बहुत बड़े क्षेत्र में तबाही मचाने की तैयारी कर रहे थे। इस विस्फोटक सामग्री के जरिए सैंकड़ों 'आईईडी' तैयार हो सकती हैं। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में तो बहुत कम आयु के लोगों से ऐसे विस्फोट कराए जाते रहे हैं। ऐसे हमलों में कई बार 'कंबिनेशन/आरडीएक्स' भी देखने को मिलता है, लेकिन आरडीएक्स को आसानी से हासिल करना मुश्किल होता है। दूसरी तरफ, अमोनियम नाइट्रेट बिना किसी दिक्कत के उपलब्ध हो जाता है।
बैलिस्टिक एक्सपर्ट, जो कुछ वर्ष पहले तक सरकार के साथ अटैच रहे हैं, ने बताया, विस्फोट करना आसान काम नहीं है।
इसमें टाईमिंग बहुत अहम प्वाइंट होता है। अगर विस्फोट तैयार करने वाले व्यक्ति एक्सपर्ट हैं तो ही वह सुरक्षित तरीके से ब्लास्ट कर सकता है। अन्यथा, उसके खुद इसकी चपेट में आने के आसार बने रहते हैं। अस्सी और नब्बे के दशक में आतंकवादी, पाकिस्तान या अफगानिस्तान से विस्फोटक तैयार करने की ट्रेनिंग लेकर आते थे। जम्मू कश्मीर और पंजाब में पाकिस्तान से ट्रेनिंग लेकर आए आतंकी अब भी मौजूद हैं।
दिल्ली ब्लास्ट में दो बातें अभी तक सामने आई हैं। पहला, क्या ये फिदायीन अटैक था। दूसरा, अगर ये फिदायीन अटैक नहीं था तो इसका मतलब, विस्फोट करने वाले से चूक हुई है। वह खुद विस्फोट की चपेट में आ गया। मतलब, विस्फोट करने के दौरान टाईमिंग बिगड़ी है। एक्सपर्ट के मुताबिक, हाई इक्स्प्लोसिव, आरडीएक्स/पीईटीएन आसानी से नहीं मिलते हैं। कम क्षमता वाले एक्पलोसिव जैसे पोटाशियम, चारकोल, आर्गेनिक सल्फाइड, अमोनियम नाइट्रेट व ब्लैक पाउडर आदि से आईईडी व दूसरे बम तैयार कर लिए जाते हैं।
पीडब्लूडी एवं माइनिंग जैसे विभाग तो जिलेटिन स्टिक का इस्तेमाल करते रहे हैं। इसकी मदद से इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस 'आईईडी' और दूसरे तरह के प्रेशर बमों को तैयार किया जा सकता है। आतंकी व नक्सली, यही तरीका प्रयोग में लाते रहे हैं। बतौर बैलिस्टिक एक्सपर्ट, इन विस्फोटकों को रिमोट या टाइमर से ब्लास्ट किया जा जाता है। मौजूदा समय में ऐसे ब्लास्ट तैयार करने के लिए आतंकियों के पास कंटेनर, केमिकल, डेटोनेटर, इनिशिएटर और वायर सब कुछ होता है। फरीदाबाद में जो विस्फोटक सामग्री बरामद हुई है, उसमें ये सभी उपकरण शामिल हैं। इन्हें इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति को ट्रेंड होना चाहिए।
ऐसे कई मामलों की जांच में सामने आता है कि आतंकी संगठन, डेटोनेटर को पावर देने के लिए ड्राई बैटरी सेल का इस्तेमाल कर रहे हैं। स्पेशल डेटोनेटर भी आने लगा है। स्पेशल डेटोनेटर में घड़ी का सेल लगाया जा रहा है। अगर ज्यादा वोल्टेज की जरुरत है तो आतंकी तीन चार सेल जोड़ देते हैं। आतंकियों को मार्केट में स्विच आसानी से उपलब्ध हो जाता है। यहां पर सेल का इस्तेमाल बहुत सावधानी से करना होता है। आतंकियों को टारगेट मिल रहा है, मगर ट्रेनिंग के अभाव में वे मार खा जाते हैं। ब्लास्ट के लिए मोबाइल/कोडलेस फोन का इस्तेमाल, ये बात भी सामने आई है।
बैलिस्टिक एक्सपर्ट के अनुसार, ब्लास्ट की घटना में टाइमिंग एक बड़ा फैक्टर होता है। अगर ये ठीक नहीं रहा तो विस्फोट करने वाला खुद भी मारा जाता है। आतंकी, 1.95 डेस्क टाइमर का इस्तेमाल कर रहे हैं। मगर इन सबके लिए ट्रेनिंग आवश्यक है। एबीसीडी स्विच की जगह पर दूसरी टर्म आ गई है। अगर एक्सपर्ट नहीं है तो टाइम आगे पीछे हो जाता है। नतीजा, समय पर ब्लास्ट नहीं हो पाता। दिल्ली ब्लास्ट में अमोनियम नाइट्रेट का इस्तेमाल होने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि अभी फोरेंसिक लैब की रिपोर्ट आना बाकी है।
आग के संपर्क में आते ही अमोनियम नाइट्रेट में तेज विस्फोट हो जाता है। आसपास की वस्तुओं को चंद सेकेंड में उड़ा सकता है। दिल्ली ब्लास्ट में कलर कोडिंग को देखा जा रहा है। इससे यह पता चलता है कि विस्फोट में कौन सा केमिकल है। कई बार नाइट्रेट के विस्फोट में काला रंग आता है। अमूमन बड़े ब्लास्ट में कलर कोडिंग से ही विस्फोटक सामग्री का आइडिया मिलता है। अगर आसपास की वस्तुओं या लोगों की बॉडी पर रंग नहीं है तो आरडीएक्स होने की संभावना बन सकती है। धुएं और वेपर से भी ब्लास्ट सामग्री का पता लग सकता है।