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Mangolpuri Assembly: मंगोलपुरी से चार बार कांग्रेस तो तीन बार आप को मिली जीत, ऐसा है यहां का चुनावी इतिहास
Fri, 24 Jan 2025 06:10 AM IST
संध्या कुमारी
इलेक्शन डेस्क, अमर उजाला
इलेक्शन डेस्क, अमर उजाला
Published by: संध्या कुमारी
Updated Fri, 24 Jan 2025 06:10 AM IST
सार
Mangolpuri seat: मंगोलपुरी से सीट दिल्ली की ऐसी विधानसभा सीटों में शामिल है जहां अब तक भाजपा जीत दर्ज नहीं कर पाई है। इस सीट पर चार बार कांग्रेस और तीन बार आप ने जीत दर्ज की है।
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दिल्ली चुनाव 2025
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
दिल्ली में विधानसभा चुनावों की तारीखों की घोषणा हो चुकी है। 5 फरवरी को चुनाव होने है और 8 फरवरी को नतीजे आएंगे। सभी पार्टियों में चुनाव को लेकर अब हलचल और ज्यादा तेज हो चुकी है। आज आपको मंगोलपुरी विधानसभा सीट के चुनावी इतिहास के बारे में बताने जा रहा हैं।
दिल्ली विधानसभा चुनाव के इतिहास में मंगोलपुरी में कब कौन जीता? कब कितने वोट पड़े? पिछले चुनाव में कैसे नतीजे रहे थे? इस बार कैसा मुकाबला है? आइये जानते हैं…
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दिल्ली विधानसभा चुनाव के इतिहास में मंगोलपुरी में कब कौन जीता? कब कितने वोट पड़े? पिछले चुनाव में कैसे नतीजे रहे थे? इस बार कैसा मुकाबला है? आइये जानते हैं…
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दिल्ली को विधानसभा मिलने की ऐसी है कहानी
दिल्ली को विधानसभा कैसे मिली, इसकी कहानी 1952 से शुरू हुई। 1952 पार्ट-सी राज्य के रूप में दिल्ली को एक विधानसभा दी गई। 1956 में उस विधानसभा को भंग कर दिया गया। 1966 में दिल्ली को एक महानगर परिषद दी गई।
दिल्ली राज्य विधानसभा 17 मार्च 1952 को पार्ट-सी राज्य सरकार अधिनियम, 1951 के तहत अस्तित्व में आई। 1952 की विधानसभा में 48 सदस्य थे। मुख्य आयुक्त को उनके कार्यों के निष्पादन में सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद का प्रावधान था, जिसके संबंध में राज्य विधानसभा को कानून बनाने की शक्ति दी गई थी।
राज्य पुनर्गठन आयोग (1955) की सिफारिशों के बाद दिल्ली 1 नवंबर 1956 से भाग-सी राज्य नहीं रही। दिल्ली विधानसभा और मंत्रिपरिषद को समाप्त कर दिया गया और दिल्ली राष्ट्रपति के प्रत्यक्ष प्रशासन के तहत केंद्र शासित प्रदेश बन गया। दिल्ली में एक लोकतांत्रिक व्यवस्था और उत्तरदायी प्रशासन की मांग उठने लगी। इसके बाद दिल्ली प्रशासन अधिनियम, 1966 के तहत महानगर परिषद बनाई गई। यह एक सदनीय लोकतांत्रिक निकाय था जिसमें 56 निर्वाचित सदस्य और 5 राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत सदस्य होते थे।
इसके बाद भी विधानसभा की मांग उठती रही। 24 दिसंबर 1987 को भारत सरकार ने सरकारिया समिति (जिसे बाद में बालकृष्णन समिति कहा गया) नियुक्त की। समिति ने 14 दिसंबर 1989 को अपनी रिपोर्ट पेश की और सिफारिश की कि दिल्ली को केंद्र शासित प्रदेश बना रहना चाहिए, लेकिन आम आदमी से जुड़े मामलों से निपटने के लिए अच्छी शक्तियों के साथ एक विधानसभा दी जानी चाहिए। बालाकृष्णन समिति की सिफारिश के अनुसार, संसद ने संविधान (69वां संशोधन) अधिनियम, 1991 पारित किया, जिसने संविधान में नए अनुच्छेद 239AA और 239AB डाले, जो अन्य बातों के साथ-साथ दिल्ली के लिए एक विधानसभा की व्यवस्था करते हैं। लोक व्यवस्था, पुलिस और भूमि के मुद्दों पर विधानसभा को कानून बनाने का अधिकार नहीं था। 1992 में परिसीमन के बाद 1993 में दिल्ली में विधानसभा के चुनाव बाद दिल्ली को एक निर्वाचित विधानसभा और मुख्यमंत्री मिला।
दिल्ली को विधानसभा कैसे मिली, इसकी कहानी 1952 से शुरू हुई। 1952 पार्ट-सी राज्य के रूप में दिल्ली को एक विधानसभा दी गई। 1956 में उस विधानसभा को भंग कर दिया गया। 1966 में दिल्ली को एक महानगर परिषद दी गई।
दिल्ली राज्य विधानसभा 17 मार्च 1952 को पार्ट-सी राज्य सरकार अधिनियम, 1951 के तहत अस्तित्व में आई। 1952 की विधानसभा में 48 सदस्य थे। मुख्य आयुक्त को उनके कार्यों के निष्पादन में सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद का प्रावधान था, जिसके संबंध में राज्य विधानसभा को कानून बनाने की शक्ति दी गई थी।
राज्य पुनर्गठन आयोग (1955) की सिफारिशों के बाद दिल्ली 1 नवंबर 1956 से भाग-सी राज्य नहीं रही। दिल्ली विधानसभा और मंत्रिपरिषद को समाप्त कर दिया गया और दिल्ली राष्ट्रपति के प्रत्यक्ष प्रशासन के तहत केंद्र शासित प्रदेश बन गया। दिल्ली में एक लोकतांत्रिक व्यवस्था और उत्तरदायी प्रशासन की मांग उठने लगी। इसके बाद दिल्ली प्रशासन अधिनियम, 1966 के तहत महानगर परिषद बनाई गई। यह एक सदनीय लोकतांत्रिक निकाय था जिसमें 56 निर्वाचित सदस्य और 5 राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत सदस्य होते थे।
इसके बाद भी विधानसभा की मांग उठती रही। 24 दिसंबर 1987 को भारत सरकार ने सरकारिया समिति (जिसे बाद में बालकृष्णन समिति कहा गया) नियुक्त की। समिति ने 14 दिसंबर 1989 को अपनी रिपोर्ट पेश की और सिफारिश की कि दिल्ली को केंद्र शासित प्रदेश बना रहना चाहिए, लेकिन आम आदमी से जुड़े मामलों से निपटने के लिए अच्छी शक्तियों के साथ एक विधानसभा दी जानी चाहिए। बालाकृष्णन समिति की सिफारिश के अनुसार, संसद ने संविधान (69वां संशोधन) अधिनियम, 1991 पारित किया, जिसने संविधान में नए अनुच्छेद 239AA और 239AB डाले, जो अन्य बातों के साथ-साथ दिल्ली के लिए एक विधानसभा की व्यवस्था करते हैं। लोक व्यवस्था, पुलिस और भूमि के मुद्दों पर विधानसभा को कानून बनाने का अधिकार नहीं था। 1992 में परिसीमन के बाद 1993 में दिल्ली में विधानसभा के चुनाव बाद दिल्ली को एक निर्वाचित विधानसभा और मुख्यमंत्री मिला।
1993: कांग्रेस के राजकुमार चौहान को मिली जीत
दिल्ली के विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद 1993 में विधानसभा के चुनाव हुए। 1993 में यहां भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधे तौर पर टक्कर थी। कांग्रेस के राजकुमार चौहान ने भाजपा के सोरन सिंह निराला को 7663 वोटों से हरा दिया था।
दिल्ली के विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद 1993 में विधानसभा के चुनाव हुए। 1993 में यहां भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधे तौर पर टक्कर थी। कांग्रेस के राजकुमार चौहान ने भाजपा के सोरन सिंह निराला को 7663 वोटों से हरा दिया था।
दिल्ली चुनाव 2025
- फोटो : अमर उजाला
1998: राजकुमार चौहान की दूसरी जीत
साल 1998 में भी मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच ही हुआ। कांग्रेस के राज कुमार चौहान को 32372 वोट मिले। कांग्रेस उम्मीदवार ने भाजपा के लक्ष्मी नारायण को 21,014 वोटों से हरा दिया था।
साल 1998 में भी मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच ही हुआ। कांग्रेस के राज कुमार चौहान को 32372 वोट मिले। कांग्रेस उम्मीदवार ने भाजपा के लक्ष्मी नारायण को 21,014 वोटों से हरा दिया था।
2003: कांग्रेस की हैट्रिक
2003 में मंगोलपुरी सीट पर राज कुमार चौहान को लगातार तीसरी बार जीत मिली। कांग्रेस के राज कुमार चौहान ने बीएसपी के मेघ सिंह को 30,315 वोट से हरा दिया। 2003 के विधानसभा चुनाव में मंगोलपुरी सीट पर भाजपा तीसरे स्थान पर खिसक गई। भाजपा के राजू बाल्मिकी को 8,670 वोट से संतोष करना पड़ा।
2003 में मंगोलपुरी सीट पर राज कुमार चौहान को लगातार तीसरी बार जीत मिली। कांग्रेस के राज कुमार चौहान ने बीएसपी के मेघ सिंह को 30,315 वोट से हरा दिया। 2003 के विधानसभा चुनाव में मंगोलपुरी सीट पर भाजपा तीसरे स्थान पर खिसक गई। भाजपा के राजू बाल्मिकी को 8,670 वोट से संतोष करना पड़ा।
2008: राजकुमार चौहान को मिली चौथी जीत
2008 में मंगोलपुरी सीट पर चुनावों के नतीजों में कोई बदलाव नहीं हुआ। एक बार फिर यहां पर कांग्रेस ने ही विजय पताका फहराई। चौथी बार राज कुमार चौहान यहां से विधायक बनकर विधानसभा पहुंचे। कांग्रेस उम्मीदवार ने भाजपा के योगेश आत्रेय को 29,863 वोटों से हरा दिया।
2008 में मंगोलपुरी सीट पर चुनावों के नतीजों में कोई बदलाव नहीं हुआ। एक बार फिर यहां पर कांग्रेस ने ही विजय पताका फहराई। चौथी बार राज कुमार चौहान यहां से विधायक बनकर विधानसभा पहुंचे। कांग्रेस उम्मीदवार ने भाजपा के योगेश आत्रेय को 29,863 वोटों से हरा दिया।
दिल्ली चुनाव 2025
- फोटो : अमर उजाला
2013: आप ने दर्ज की पहली जीत
दिल्ली की राजनीति के लिए साल 2013 एक अहम कड़ी साबित हुआ। इस चुनाव में मुकाबले में कांग्रेस-भाजपा के अलावा इस बार भ्रष्टाचार आंदोलन से निकली आम आदमी पार्टी भी थी। मंगोलपुरी विधानसभा सीट पर मुकाबला काफी दिलचस्प रहा। कांग्रेस ने अपनी मौजूदा विधायक और मंत्री को चेहरा बनाया था। उनके सामने आप के टिकट पर राखी बिड़ला चुनाव लड़ रही थीं।
राखी ने लगातार चार बार मंगोलपुरी से जीत दर्ज कर चुके कांग्रेस के राज कुमार चौहान को हरा दिया। आप की राखी बिड़ला को 10,585 वोट से जीत मिली। इसके बाद से कांग्रेस कभी इस सीट पर वापसी नहीं कर पाई।
दिल्ली की राजनीति के लिए साल 2013 एक अहम कड़ी साबित हुआ। इस चुनाव में मुकाबले में कांग्रेस-भाजपा के अलावा इस बार भ्रष्टाचार आंदोलन से निकली आम आदमी पार्टी भी थी। मंगोलपुरी विधानसभा सीट पर मुकाबला काफी दिलचस्प रहा। कांग्रेस ने अपनी मौजूदा विधायक और मंत्री को चेहरा बनाया था। उनके सामने आप के टिकट पर राखी बिड़ला चुनाव लड़ रही थीं।
राखी ने लगातार चार बार मंगोलपुरी से जीत दर्ज कर चुके कांग्रेस के राज कुमार चौहान को हरा दिया। आप की राखी बिड़ला को 10,585 वोट से जीत मिली। इसके बाद से कांग्रेस कभी इस सीट पर वापसी नहीं कर पाई।
2015: राखी बिड़ला को फिर से जीत
2015 में फिर से दिल्ली में विधानसभा चुनाव करवाने पड़े। 2014 में मात्र 49 दिन सरकार चलाने के बाद केजरीवाल ने इस्तीफा दे दिया था। फरवरी 2014 में जब लोकपाल विधेयक पारित नहीं हो पाया तो अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। 2015 में फिर से चुनाव कराए गए और केजरीवाल ने 70 में से 67 सीटें जीतकर सत्ता में वापसी की।
इस चुनाव में मंगोलपुरी सीट पर राखी बिड़ला के सामने कांग्रेस के राज कुमार चौहान ही थे। आप ने कांग्रेस को 22,699 वोटों से हरा दिया। राखी बिड़ला को 60,534 वोट मिले तो वहीं कांग्रेस को 37,835 वोटों के साथ संतोष करना पड़ा।
2015 में फिर से दिल्ली में विधानसभा चुनाव करवाने पड़े। 2014 में मात्र 49 दिन सरकार चलाने के बाद केजरीवाल ने इस्तीफा दे दिया था। फरवरी 2014 में जब लोकपाल विधेयक पारित नहीं हो पाया तो अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। 2015 में फिर से चुनाव कराए गए और केजरीवाल ने 70 में से 67 सीटें जीतकर सत्ता में वापसी की।
इस चुनाव में मंगोलपुरी सीट पर राखी बिड़ला के सामने कांग्रेस के राज कुमार चौहान ही थे। आप ने कांग्रेस को 22,699 वोटों से हरा दिया। राखी बिड़ला को 60,534 वोट मिले तो वहीं कांग्रेस को 37,835 वोटों के साथ संतोष करना पड़ा।
2020: आप ने लगाई जीत की हैट्रिक
2020 के विधानसभा चुनाव में आप आदमी पार्टी ने फिर जबरदस्त जनादेश हासिल किया। आप को 70 में से कुल 62 सीटों पर जीत मिली। मंगोलपुरी के नतीजों की बात करें तो यहां से आप की तरफ से राखी बिड़ला को फिर से जीत मिली। आप उम्मीदवार ने भाजपा के करम सिंह कर्मा को 30,116 वोट से हरा दिया। राखी बिड़ला को 74,154 और भाजपा को 44,038 वोटों से साथ संतोष करना पड़ा।
2020 के विधानसभा चुनाव में आप आदमी पार्टी ने फिर जबरदस्त जनादेश हासिल किया। आप को 70 में से कुल 62 सीटों पर जीत मिली। मंगोलपुरी के नतीजों की बात करें तो यहां से आप की तरफ से राखी बिड़ला को फिर से जीत मिली। आप उम्मीदवार ने भाजपा के करम सिंह कर्मा को 30,116 वोट से हरा दिया। राखी बिड़ला को 74,154 और भाजपा को 44,038 वोटों से साथ संतोष करना पड़ा।
अबकी बार कैसे हैं समीकरण?
2025 के चुनावों में आप ने इस बार यहां से आप ने राखी बिड़ला की सीट बदल कर राजेश जाटव धर्मरक्षक को मंगोलपुरी से टिकट दिया है। राजेश जाटव वार्ड 49A मंगोलपुरी ने निगम पार्षद हैं। भाजपा में हाल ही में कांग्रेस से भाजपा में आए राजकुमार चौहान को टिकट दिया है। राज कुमार चौहान लगातार चार बार यहां से कांग्रेस के टिकट पर विधायक रह चुके हैं। वहीं, कांग्रेस ने हनुमान चौहान को टिकट दिया है।
2025 के चुनावों में आप ने इस बार यहां से आप ने राखी बिड़ला की सीट बदल कर राजेश जाटव धर्मरक्षक को मंगोलपुरी से टिकट दिया है। राजेश जाटव वार्ड 49A मंगोलपुरी ने निगम पार्षद हैं। भाजपा में हाल ही में कांग्रेस से भाजपा में आए राजकुमार चौहान को टिकट दिया है। राज कुमार चौहान लगातार चार बार यहां से कांग्रेस के टिकट पर विधायक रह चुके हैं। वहीं, कांग्रेस ने हनुमान चौहान को टिकट दिया है।