CRPF: क्या जल्दबाजी में पुलवामा शिफ्ट हुआ श्रीनगर का ट्रेनिंग सेंटर? 'हुमामा' में दोबारा शुरू हुआ प्रशिक्षण
CRPF: बल के सूत्रों का कहना है कि डीजी डॉ. सुजॉय लाल थाउसेन, जवानों की ट्रेनिंग को लेकर बहुत गंभीर हैं। उन्होंने बल के अनेक ट्रेनिंग सेंटरों का दौरा किया है। 'हुमामा' सेंटर पर पहले भी ट्रेनिंग ही होती रही है। वहां पर्याप्त सुविधाएं भी थीं। इसके बावजूद उसे शिफ्ट करने का निर्णय ले लिया गया...
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श्रीनगर में 'हुमामा' स्थित सीआरपीएफ के ट्रेनिंग सेंटर को गत वर्ष जब लेथपोरा 'पुलवामा' में शिफ्ट किया जा रहा था, तो उस पर कई सवाल उठे थे। सीआरपीएफ के मौजूदा एवं पूर्व अधिकारियों ने उस बदलाव को नियमों का उल्लंघन बताया था। ऐसा पहली बार हुआ था कि सीआरपीएफ के 117 लोगों ने ट्रेनिंग सेंटर को शिफ्ट करने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की शरण ली थी। हालांकि उन्हें सर्वोच्च अदालत से राहत नहीं मिल सकी और ट्रेनिंग सेंटर को पूरी तरह लेथपोरा शिफ्ट कर दिया गया। उस वक्त बल के शीर्ष नेतृत्व की ओर से कई तरह की दलीलें दी गई थीं। जैसे यह ट्रेनिंग सेंटर काफी पुराना है। यहां पर्याप्त स्पेस नहीं है। सुविधाओं का अभाव है। अब सीआरपीएफ के मौजूदा डीजी डॉ. सुजॉय लाल थाउसेन ने 'हुमामा' में हवलदार पदोन्नति कोर्स 'एचसीपीसी' कराए जाने को मंजूरी दी है। सूत्रों का कहना है कि बल प्रमुख ने तार्किक आधार पर यहां एचसीपीसी कोर्स कराए जाने का निर्णय लिया है। यह कोर्स 27 मार्च से शुरू होगा।
बदलाव से प्रभावित हुए बल के हजारों परिवार
बल के सूत्रों का कहना है कि डीजी डॉ. सुजॉय लाल थाउसेन, जवानों की ट्रेनिंग को लेकर बहुत गंभीर हैं। उन्होंने बल के अनेक ट्रेनिंग सेंटरों का दौरा किया है। 'हुमामा' सेंटर पर पहले भी ट्रेनिंग ही होती रही है। वहां पर्याप्त सुविधाएं भी थीं। इसके बावजूद उसे शिफ्ट करने का निर्णय ले लिया गया। अब सवाल यह उठता है कि पहले उस सेंटर को लेथपोरा क्यों शिफ्ट किया गया था। ऐसी क्या जल्दबाजी थी कि उसे एकाएक लेथपोरा ले जाने के आदेश जारी कर दिए गए। लेथपोरा में अभी प्री इंडक्शन ट्रेनिंग होती है। यानी जो कोई जवान या अधिकारी, पहली बार कश्मीर में पोस्टिंग पर आता है, तो उसे कुछ माह की 'पीआई' ट्रेनिंग दी जाती है। उस बदलाव से सीआरपीएफ के हजारों परिवार प्रभावित हुए थे।
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ट्रेनिंग सेंटर को शिफ्ट करने से नाराज कार्मिक, अदालत में चले गए थे। अब उसी सेंटर पर एक हजार जवानों का हवलदार पदोन्नति कोर्स कराया जाएगा। बल मुख्यालय के आदेशों में कहा गया है कि इसके लिए वहां पर प्रशिक्षक स्टाफ, सहायकों एवं दूसरी सुविधाएं मुहैया कराई जाएं। कोर्स का संचालन, संस्थान में तैनात कार्मिकों/प्रशिक्षक स्टाफ से कराना सुनिश्चित करें। इसके लिए हुमामा में अलग से स्टाफ प्रदान नहीं किया जाएगा।
अफसरों के बीच नहीं बन सकी थी सहमति
इस मामले को लेकर बल में काफी बड़ा विवाद हुआ था। श्रीनगर के इस ट्रेनिंग सेंटर को पुलवामा शिफ्ट करने को लेकर अफसरों के बीच सहमति नहीं बन सकी थी। अधिकांश कैडर अफसर चाहते थे कि यह ट्रेनिंग सेंटर बना रहे, जबकि शीर्ष अधिकारियों की राय जुदा थी। उस वक्त सूत्रों ने बताया था कि ट्रेनिंग सेंटर को शिफ्ट करने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय से केएलपी यानी 'की लोकेशन प्लान' को स्वीकृत कराना होता है। शिफ्ट होने के कार्य पर करीब छह सौ करोड़ रुपये खर्च होने थे। शीर्ष अफसरों को मालूम था कि इस खर्चीले बदलाव के लिए गृह मंत्रालय मंजूरी नहीं देगा। उन्होंने एक सुरक्षित रास्ता निकाल लिया। श्रीनगर आरटीसी को लेथपोरा ले जाने वाली फाइल में बड़ी चालाकी से 'अस्थायी' शब्द जोड़ दिया गया। इसके बाद सेंटर को शिफ्ट करने की सारी बाधाएं दूर हो गईं। मई 2021 में बल मुख्यालय में हुई एक बैठक में जो कुछ तय हुआ था, उसे किनारे रख दिया गया। यानी उस बैठक में सेंटर को शिफ्ट करने बाबत सहमति नहीं बनी थी। तत्कालीन एडीजी मुख्यालय ने बैठक में कहा था, श्रीनगर आरटीसी के पास पर्याप्त स्पेस नहीं है। उसके जरिए श्रीनगर सेक्टर और ट्रांजिट पर्सनल की जरुरतें पूरी हो नहीं सकतीं, इसलिए रिक्रूट ट्रेनिंग सेंटर को किसी दूसरी जगह पर शिफ्ट किया जाना चाहिए। इस संबंध में जो कुछ भी किया जाए, वह कम से कम खर्च में पूरा हो।
सीआरपीएफ के आईजी (वर्क्स) ने दिया ये सुझाव
इसे सेंटर को शिफ्ट करने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय से केएलपी यानी 'की लोकेशन प्लान' स्वीकृत कराना होगा। नए सेंटर पर निर्माण के लिए 400 से 600 करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी। श्रीनगर आरटीसी के लिए 104 करोड़ रुपये मंजूर हुए थे। बजट का एक बड़ा हिस्सा खर्च हो चुका है। नए ट्रेनिंग सेंटर के लिए 160 से 170 एकड़ जमीन चाहिए। जो मौजूदा लोकेशन देखी जा रही हैं, उनमें नगरोटा में 35 एकड़ और सूरतगढ़ में 62 एकड़ जमीन है। इन दोनों जगह की जमीन, ट्रेनिंग सेंटर के लिए अपर्याप्त है। विभाग को चाहिए कि वह श्रीनगर के आसपास तीन-चार जगह पर ट्रेनिंग सेंटर के लिए जमीन की खोज करे।
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कहीं पर अधिक खर्च तो कहीं पर्याप्त ज़मीन नहीं
कई अफ़सरों ने तर्क दिया कि किसी दूसरी जगह पर ट्रेनिंग सेंटर शिफ्ट करना, अभी ठीक नहीं है। इस पर भारी धनराशि खर्च होगी और सरकार से मंजूरी भी नहीं मिलेगी। आईजी (ट्रेनिंग) ने कहा था कि एटीसी सूरतगढ़ में केवल 62 एकड़ जमीन है। नए ट्रेनिंग सेंटर के लिए यह जमीन बहुत ही कम है। 1500 रिक्रूट के लिए तो लगभग 170 एकड़ जमीन लेनी होगी। एटीसी सूरतगढ़ में जो बिल्डिंग बनी है, वह उबड़ खाबड़ जमीन है। 1970 के आसपास वह बिल्डिंग बनी थी। उस बिल्डिंग को गिराकर जब नया ट्रेनिंग सेंटर बनेगा तो उस पर बहुत अधिक खर्च आएगा। नगरोटा में 35 एकड़ जगह है, मगर वह अपर्याप्त है। एक सुझाव यह भी आया कि मौजूदा आरटीसी में ही करीब एक हजार जवानों के लिए तीन-चार नई बैरक बना दी जाएं। हुमामा में करीब तीस एकड़ जमीन नॉन ट्रेनिंग कार्य के लिए है, उसका इस्तेमाल किया जा सकता है। जेएंडके जोन के आपरेशनल मकसद और रिक्रूट ट्रेनिंग के लिए आरटीसी बहुत जरूरी है।
सीआरपीएफ ट्रेनिंग महानिदेशालय ने मना किया
आरटीसी श्रीनगर बहुत पुराना है। नब्बे के दशक से लेकर अब तक यहां 104 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। अब नया सेंटर खड़ा करना, बहुत खर्चीला है। विभाग को सरकार से 600 करोड़ रुपये खर्च करने की मंजूरी मिलना आसान नहीं है। साल 2012 के बाद से बेसिक ट्रेनिंग के 19 बैच (प्रत्येक 44 सप्ताह), ट्रेड्समैन ट्रेनिंग के आठ बैच (प्रत्येक 44 सप्ताह), योगा कोर्स के छह बैच, घाटी में आने वाले जवानों की प्री इंडक्शन ट्रेनिंग एवं दूसरे कार्य, आरटीसी श्रीनगर में सफलता से पूरे किए गए है। 2012 से 2018 तक नियमित रिक्रूट बेसिक ट्रेनिंग हुए हैं। आरटीसी श्रीनगर ने खुद को साबित कर दिखाया है। यहीं पर तीन चार नई बैरक बना दी जाएं, ताकि वहां 700 से 1000 जवानों को एडजस्ट किया जा सके। सीआरपीएफ ट्रेनिंग महानिदेशालय का तर्क शीर्ष अफसरों को ठीक नहीं लगा। खास बात है कि इन प्वाइंट्स को डीजी कुलदीप सिंह, एडीजी ट्रेनिंग एसएस चतुर्वेदी व राकेश यादव की भी सहमति मिली थी। इन सब तर्कों के बावजूद आरटीसी श्रीनगर को लेथपोरा में शिफ्ट करने का काम शुरु कर दिया गया।
ट्रेनिंग सेंटर को बचाने के समर्थन में दिए गए ये तर्क
कुछ अफसरों का कहना था कि अभी तक ये ट्रेनिंग सेंटर एक महफूज इलाके में रहा है। वहां कोई आतंकी हमला भी नहीं हुआ, जबकि पुलवामा को आतंकियों का गढ़ माना जाता है। दूसरी यूनिटों से जिन अधिकारियों या जवानों ने यह सोचकर श्रीनगर के इस सेंटर पर तबादला कराया था कि वहां तीन-चार साल बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल जाएगी, अब उन्हें यह डर सता रहा है कि वे पुलवामा में कहां पर बच्चों को पढ़ाएंगे। लेथपोरा में न तो कोई बेहतर स्कूल हैं और न ही कोई मेडिकल सेंटर। लेथपोरा सेंटर, इन मापदंडों पर खरा नहीं उतरता। वहां बल का कैंपस भी मुख्य सड़क से करीब तीन-चार किलोमीटर अंदर है। इसके लिए वहां हर समय आरओपी 'रोड ओपनिंग पार्टी' लगानी होगी। वह इलाका आतंकियों के प्रभाव वाला माना जाता है। वहां पर नए रिक्रूट को ट्रेनिंग देना जोखिम से भरा कदम होगा।