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सीआरपीएफ: इंस्पेक्टरों के वेतन निर्धारण केस में फैसले की अवमानना पर दिल्ली हाईकोर्ट सख्त, अब तलब होंगे आईजी
Sat, 07 Nov 2026 06:51 PM IST
पवन पांडेय
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: पवन पांडेय
Updated Sat, 07 Nov 2026 06:51 PM IST
सार
दिल्ली हाईकोर्ट ने सीआरपीएफ के इंस्पेक्टरों को वेतन निर्धारण में 5,400 रुपये ग्रेड पे देने के अपने फैसले को चार सप्ताह के भीतर लागू करने का आदेश केंद्र सरकार को दिया है। वित्त मंत्रालय के 2008 के नियम के अनुसार, 4,800 रुपये ग्रेड पे पर चार साल की सेवा पूरी करने वाले कर्मचारियों को 5,400 रुपये ग्रेड पे मिलना चाहिए। अदालत के फैसले के बावजूद सरकार ने अब तक इसे लागू नहीं किया है। इस मामले में अवमानना याचिका भी दायर की गई है।
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CRPF
- फोटो : Amar Ujala
विस्तार
देश के सबसे बड़े केंद्रीय अर्धसैनिक बल 'सीआरपीएफ' में इंस्पेक्टरों को वेतन निर्धारण के मामले में भले ही दिल्ली हाईकोर्ट से जीत हासिल हुई, लेकिन उन्हें इसका फायदा नहीं मिल सका। वजह, सरकार ने वह फैसला अभी तक लागू ही नहीं किया। इंस्पेक्टरों ने अवमानना का केस भी कर दिया। उसके बावजूद सरकार ने उन इंस्पेक्टरों को 54 सौ रुपये का 'ग्रेड पे' नहीं दिया, जो 48 सौ रुपये के 'ग्रेड पे' में चार साल की सेवा पूरी कर चुके हैं। तीन नवंबर को दिल्ली हाईकोर्ट ने सख्त लहजे में यह आदेश जारी किया है कि सीआरपीएफ निरीक्षकों के वेतन निर्धारण का जो फैसला दिया गया था, केंद्र सरकार उसे चार सप्ताह में लागू करे। अगर ऐसा नहीं होता है तो सीआरपीएफ के आईजी (पर्स) आगामी सुनवाई पर अदालत में मौजूद रहेंगे।
अर्धसैनिक बलों में स्वत: लागू नहीं होता ये नियम
बता दें कि वित्त मंत्रालय का 2008 में जारी हुआ एक कार्यालय ज्ञापन (ओएम), केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में स्वत: ही लागू नहीं होता। केंद्र सरकार के बाकी विभागों में वह ओएम लागू हो रहा है। उस ओएम में कहा गया है कि जिन कर्मियों का 48 सौ रुपये का 'ग्रेड पे' है और वे उसमें चार साल की सेवा कर चुके हैं तो उनका 'ग्रेड पे' 54 सौ रुपये हो जाएगा। केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में इस नियम को लागू कराने के लिए सीएपीएफ निरीक्षकों को अदालतों की शरण लेनी पड़ रही है। अदालत के आदेशों का समयबद्ध अनुपालन सुनिश्चित हो, इस बाबत दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक बार फिर प्रशासनिक अधिकारियों को कड़ा संदेश दिया है। उच्च न्यायालय ने उक्त केस में पूर्व में पारित निर्णय और उसके बाद जारी स्पष्ट निर्देशों का लंबे समय तक अनुपालन नहीं किए जाने पर गंभीर नाराजगी व्यक्त की है।
चार सप्ताह के भीतर हो आदेश का पालन
दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रतिवादियों को चार सप्ताह के भीतर उक्त आदेश का पालन करने के लिए कहा है। न्यायालय ने प्रथम दृष्टया माना है कि संबंधित प्रतिवादी, न्यायालय के निर्णय और उसके निर्देशों की अवमानना कर रहे हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट किया है कि निर्धारित अवधि में अनुपालन नहीं होने की स्थिति में प्रतिवादी संख्या तीन यानी आईजी 'पर्स' को अगली निर्धारित सुनवाई पर व्यक्तिगत रूप से न्यायालय में उपस्थित होना होगा। दिल्ली उच्च न्यायालय की जज न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने यह महत्वपूर्ण आदेश 3 नवंबर को 'कंटेम्प्ट केस (सिविल) संख्या 194/2026, सीताराम बर्नवाल एवं अन्य बनाम गोविंद मोहन (गृह सचिव) एवं अन्य में पारित किया है। यह मामला पूर्व में पारित न्यायिक निर्णय '16 अक्तूबर 2025' के अनुपालन में कथित विफलता से संबंधित है।
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उचित निर्देश जारी करने की मांग
याचिकाकर्ताओं ने दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष रिट याचिका संख्या डब्लू. पी (सी) 16003/2025 में 16 अक्तूबर 2025 को पारित निर्णय के अनुपालन की मांग की थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से न्यायालय में यह मुद्दा उठाया गया कि संबंधित अधिकारियों द्वारा न्यायालय के निर्णय का अनुपालन नहीं किया जा रहा है। इसी क्रम में न्यायालय के समक्ष अवमानना याचिका भी प्रस्तुत की गई। मामले की सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि न्यायालय द्वारा पूर्व में दिए गए निर्देशों के बावजूद संबंधित पक्षों की ओर से अपेक्षित कार्रवाई नहीं की गई। याचिकाकर्ताओं ने इस स्थिति को न्यायालय के आदेशों की अवहेलना बताते हुए उचित निर्देश जारी करने की मांग की।
सुप्रीम कोर्ट और डिवीजन बेंच में नहीं मिली राहत
3 नवंबर को हुई सुनवाई के दौरान प्रतिवादी पक्ष के अधिवक्ता ने न्यायालय को बताया कि संबंधित निर्णय के विरुद्ध विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दाखिल की गई थी, जिसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद निर्णय की समीक्षा के लिए डिवीजन बेंच के समक्ष रिव्यू याचिका भी प्रस्तुत की गई, लेकिन वह भी लगभग एक माह पूर्व खारिज हो चुकी थी। प्रतिवादी पक्ष की ओर से इन न्यायिक प्रक्रियाओं का उल्लेख करते हुए निर्णय के अनुपालन के लिए कुछ अतिरिक्त समय प्रदान करने का अनुरोध किया गया। हालांकि, सुनवाई के दौरान न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य पर स्पष्टीकरण मांगा। न्यायालय की विशिष्ट पूछताछ पर प्रतिवादी पक्ष ने स्वीकार किया कि संबंधित निर्णय पर किसी भी न्यायालय द्वारा किसी भी स्तर पर स्थगन आदेश पारित नहीं किया गया था।
आठ सप्ताह की पूर्व निर्धारित समय-सीमा खत्म
यह तथ्य इस मामले में विशेष महत्व रखता है, क्योंकि किसी न्यायिक निर्णय के विरुद्ध अपील, विशेष अनुमति याचिका अथवा समीक्षा याचिका दाखिल किए जाने मात्र से उस निर्णय के क्रियान्वयन पर स्वतः रोक नहीं लग जाती। न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि अवमानना याचिका पर 2 फरवरी 2026 को पहली बार सुनवाई के दौरान ही संबंधित प्रतिवादियों को न्यायालय के निर्णय का अनुपालन करने के लिए आठ सप्ताह का समय दिया गया था। इसके बावजूद निर्धारित अवधि बीत जाने के बाद भी न्यायालय के आदेश का अनुपालन नहीं किया गया। इस प्रकार 16 अक्तूबर 2025 के मूल निर्णय और 2 फरवरी 2026 को अवमानना मामले में दिए गए स्पष्ट निर्देशों के बावजूद अनुपालन नहीं होना न्यायालय के समक्ष गंभीर प्रश्न बनकर उभरा।
आदेश के बावजूद पूर्णतः अनुपालन का अभाव
न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने इस स्थिति पर स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि न्यायालय के निर्णय और 2 फरवरी 2026 के आदेश के बावजूद पूर्णतः अनुपालन का अभाव है। मामले की परिस्थितियों और उपलब्ध तथ्यों पर विचार करने के बाद न्यायालय ने अपने आदेश के अनुच्छेद सात में महत्वपूर्ण टिप्पणी की। न्यायालय ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह प्रदर्शित होता है कि प्रतिवादी न्यायालय के निर्णय तथा इस न्यायालय द्वारा जारी निर्देशों की अवमानना कर रहे हैं। न्यायालय की यह टिप्पणी प्रशासनिक एवं सरकारी अधिकारियों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश मानी जा रही है कि न्यायिक आदेशों का अनुपालन केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि विधिक दायित्व है। न्यायालय द्वारा पारित निर्णयों को तब तक प्रभावी रूप से लागू किया जाना अपेक्षित है, जब तक किसी सक्षम न्यायालय द्वारा उन पर स्थगन अथवा अन्य कोई प्रभावी आदेश पारित न किया गया हो।
अनुपालन के लिए चार सप्ताह का अतिरिक्त समय
न्यायालय ने प्रतिवादी पक्ष को एक और अवसर प्रदान करते हुए आदेश के अनुपालन के लिए चार सप्ताह का अतिरिक्त समय निर्धारित किया है। साथ ही यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि इस अवधि में निर्णय और न्यायालय के निर्देशों का अनुपालन नहीं किया गया तो प्रतिवादी संख्या तीन को अगली निर्धारित तारीख पर व्यक्तिगत रूप से न्यायालय के समक्ष उपस्थित होना पड़ेगा। न्यायालय का यह निर्देश विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि अब मामले में केवल आश्वासन अथवा अतिरिक्त समय मांगने के बजाय वास्तविक अनुपालन अपेक्षित है। इस आदेश के माध्यम से न्यायालय ने एक बार फिर रेखांकित किया है कि न्यायिक प्रक्रिया में अपील और समीक्षा का अधिकार उपलब्ध होने के बावजूद न्यायालय के प्रभावी आदेशों की अवहेलना नहीं की जा सकती। जब तक किसी सक्षम न्यायालय से स्थगन आदेश प्राप्त नहीं होता, तब तक संबंधित पक्षों का दायित्व है कि वे प्रभावी न्यायिक आदेशों का पालन करें। न्यायालय के आदेशों का पालन संबंधित अधिकारियों की इच्छा अथवा सुविधानुसार नहीं, बल्कि विधि के अनुरूप होना चाहिए।
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अर्धसैनिक बलों में स्वत: लागू नहीं होता ये नियम
बता दें कि वित्त मंत्रालय का 2008 में जारी हुआ एक कार्यालय ज्ञापन (ओएम), केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में स्वत: ही लागू नहीं होता। केंद्र सरकार के बाकी विभागों में वह ओएम लागू हो रहा है। उस ओएम में कहा गया है कि जिन कर्मियों का 48 सौ रुपये का 'ग्रेड पे' है और वे उसमें चार साल की सेवा कर चुके हैं तो उनका 'ग्रेड पे' 54 सौ रुपये हो जाएगा। केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में इस नियम को लागू कराने के लिए सीएपीएफ निरीक्षकों को अदालतों की शरण लेनी पड़ रही है। अदालत के आदेशों का समयबद्ध अनुपालन सुनिश्चित हो, इस बाबत दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक बार फिर प्रशासनिक अधिकारियों को कड़ा संदेश दिया है। उच्च न्यायालय ने उक्त केस में पूर्व में पारित निर्णय और उसके बाद जारी स्पष्ट निर्देशों का लंबे समय तक अनुपालन नहीं किए जाने पर गंभीर नाराजगी व्यक्त की है।
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चार सप्ताह के भीतर हो आदेश का पालन
दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रतिवादियों को चार सप्ताह के भीतर उक्त आदेश का पालन करने के लिए कहा है। न्यायालय ने प्रथम दृष्टया माना है कि संबंधित प्रतिवादी, न्यायालय के निर्णय और उसके निर्देशों की अवमानना कर रहे हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट किया है कि निर्धारित अवधि में अनुपालन नहीं होने की स्थिति में प्रतिवादी संख्या तीन यानी आईजी 'पर्स' को अगली निर्धारित सुनवाई पर व्यक्तिगत रूप से न्यायालय में उपस्थित होना होगा। दिल्ली उच्च न्यायालय की जज न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने यह महत्वपूर्ण आदेश 3 नवंबर को 'कंटेम्प्ट केस (सिविल) संख्या 194/2026, सीताराम बर्नवाल एवं अन्य बनाम गोविंद मोहन (गृह सचिव) एवं अन्य में पारित किया है। यह मामला पूर्व में पारित न्यायिक निर्णय '16 अक्तूबर 2025' के अनुपालन में कथित विफलता से संबंधित है।
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उचित निर्देश जारी करने की मांग
याचिकाकर्ताओं ने दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष रिट याचिका संख्या डब्लू. पी (सी) 16003/2025 में 16 अक्तूबर 2025 को पारित निर्णय के अनुपालन की मांग की थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से न्यायालय में यह मुद्दा उठाया गया कि संबंधित अधिकारियों द्वारा न्यायालय के निर्णय का अनुपालन नहीं किया जा रहा है। इसी क्रम में न्यायालय के समक्ष अवमानना याचिका भी प्रस्तुत की गई। मामले की सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि न्यायालय द्वारा पूर्व में दिए गए निर्देशों के बावजूद संबंधित पक्षों की ओर से अपेक्षित कार्रवाई नहीं की गई। याचिकाकर्ताओं ने इस स्थिति को न्यायालय के आदेशों की अवहेलना बताते हुए उचित निर्देश जारी करने की मांग की।
सुप्रीम कोर्ट और डिवीजन बेंच में नहीं मिली राहत
3 नवंबर को हुई सुनवाई के दौरान प्रतिवादी पक्ष के अधिवक्ता ने न्यायालय को बताया कि संबंधित निर्णय के विरुद्ध विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दाखिल की गई थी, जिसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद निर्णय की समीक्षा के लिए डिवीजन बेंच के समक्ष रिव्यू याचिका भी प्रस्तुत की गई, लेकिन वह भी लगभग एक माह पूर्व खारिज हो चुकी थी। प्रतिवादी पक्ष की ओर से इन न्यायिक प्रक्रियाओं का उल्लेख करते हुए निर्णय के अनुपालन के लिए कुछ अतिरिक्त समय प्रदान करने का अनुरोध किया गया। हालांकि, सुनवाई के दौरान न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य पर स्पष्टीकरण मांगा। न्यायालय की विशिष्ट पूछताछ पर प्रतिवादी पक्ष ने स्वीकार किया कि संबंधित निर्णय पर किसी भी न्यायालय द्वारा किसी भी स्तर पर स्थगन आदेश पारित नहीं किया गया था।
आठ सप्ताह की पूर्व निर्धारित समय-सीमा खत्म
यह तथ्य इस मामले में विशेष महत्व रखता है, क्योंकि किसी न्यायिक निर्णय के विरुद्ध अपील, विशेष अनुमति याचिका अथवा समीक्षा याचिका दाखिल किए जाने मात्र से उस निर्णय के क्रियान्वयन पर स्वतः रोक नहीं लग जाती। न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि अवमानना याचिका पर 2 फरवरी 2026 को पहली बार सुनवाई के दौरान ही संबंधित प्रतिवादियों को न्यायालय के निर्णय का अनुपालन करने के लिए आठ सप्ताह का समय दिया गया था। इसके बावजूद निर्धारित अवधि बीत जाने के बाद भी न्यायालय के आदेश का अनुपालन नहीं किया गया। इस प्रकार 16 अक्तूबर 2025 के मूल निर्णय और 2 फरवरी 2026 को अवमानना मामले में दिए गए स्पष्ट निर्देशों के बावजूद अनुपालन नहीं होना न्यायालय के समक्ष गंभीर प्रश्न बनकर उभरा।
आदेश के बावजूद पूर्णतः अनुपालन का अभाव
न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने इस स्थिति पर स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि न्यायालय के निर्णय और 2 फरवरी 2026 के आदेश के बावजूद पूर्णतः अनुपालन का अभाव है। मामले की परिस्थितियों और उपलब्ध तथ्यों पर विचार करने के बाद न्यायालय ने अपने आदेश के अनुच्छेद सात में महत्वपूर्ण टिप्पणी की। न्यायालय ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह प्रदर्शित होता है कि प्रतिवादी न्यायालय के निर्णय तथा इस न्यायालय द्वारा जारी निर्देशों की अवमानना कर रहे हैं। न्यायालय की यह टिप्पणी प्रशासनिक एवं सरकारी अधिकारियों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश मानी जा रही है कि न्यायिक आदेशों का अनुपालन केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि विधिक दायित्व है। न्यायालय द्वारा पारित निर्णयों को तब तक प्रभावी रूप से लागू किया जाना अपेक्षित है, जब तक किसी सक्षम न्यायालय द्वारा उन पर स्थगन अथवा अन्य कोई प्रभावी आदेश पारित न किया गया हो।
अनुपालन के लिए चार सप्ताह का अतिरिक्त समय
न्यायालय ने प्रतिवादी पक्ष को एक और अवसर प्रदान करते हुए आदेश के अनुपालन के लिए चार सप्ताह का अतिरिक्त समय निर्धारित किया है। साथ ही यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि इस अवधि में निर्णय और न्यायालय के निर्देशों का अनुपालन नहीं किया गया तो प्रतिवादी संख्या तीन को अगली निर्धारित तारीख पर व्यक्तिगत रूप से न्यायालय के समक्ष उपस्थित होना पड़ेगा। न्यायालय का यह निर्देश विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि अब मामले में केवल आश्वासन अथवा अतिरिक्त समय मांगने के बजाय वास्तविक अनुपालन अपेक्षित है। इस आदेश के माध्यम से न्यायालय ने एक बार फिर रेखांकित किया है कि न्यायिक प्रक्रिया में अपील और समीक्षा का अधिकार उपलब्ध होने के बावजूद न्यायालय के प्रभावी आदेशों की अवहेलना नहीं की जा सकती। जब तक किसी सक्षम न्यायालय से स्थगन आदेश प्राप्त नहीं होता, तब तक संबंधित पक्षों का दायित्व है कि वे प्रभावी न्यायिक आदेशों का पालन करें। न्यायालय के आदेशों का पालन संबंधित अधिकारियों की इच्छा अथवा सुविधानुसार नहीं, बल्कि विधि के अनुरूप होना चाहिए।