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CRPF: 300 ग्राउंड कमांडरों के चेहरे खिले; पदोन्नति का वनवास खत्म, 15वें साल बाद बनेंगे डिप्टी कमांडेंट
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सुरक्षाबल
- फोटो : एजेंसी
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देश के सबसे बड़े केंद्रीय अर्धसैनिक बल 'सीआरपीएफ' में ग्राउंड कमांडर यानी 'सहायक कमांडेंट', जिन्हें 15वें साल में पहली पदोन्नति नहीं मिल सकी थी, अब उनके चेहरे खिल उठे हैं। सीआरपीएफ के लगभग 300 ग्राउंड कमांडरों का पदोन्नति का वनवास खत्म होने जा रहा है। सर्वोच्च अदालत ने विभागीय पदोन्नति कमेटी 'डीपीसी' पर स्टे लगा रखा था। अब वह स्टे हट गया है। सीआरपीएफ मुख्यालय भी स्टे हटते ही तुरंत हरकत में आ गया। शुक्रवार को बल की सभी इकाइयों से कहा गया है कि उन सभी सहायक कमांडेंट की मेडिकल रिपोर्ट तुरंत प्रभाव से मुख्यालय को प्रेषित की जाए, जिन्हें डिप्टी कमांडेंट के पद पर पदोन्नति दी जानी है। बल मुख्यालय के अफसरों का कहना है कि अगले सप्ताह पदोन्नति आदेश जारी कर दिए जाएंगे।
अविलंब काउंटर साइन कराकर मेडिकल रिपोर्ट भेजें
सीआरपीएफ मुख्यालय ने 17 अप्रैल को सभी जोन, ग्रुप सेंटर, यूनिटों एवं दूसरी इकाइयों को आदेश दिया है कि वे उन सहायक कमांडेंट (जीडी) की मेडिकल रिपोर्ट, अति आवश्यक आधार पर भेजें, जिन्हें डिप्टी कमांडेंट (जीडी) की पदोन्नति मिलने जा रही है। लंबे समय से यह केस सर्वोच्च अदालत में लंबित था। सर्वोच्च अदालत ने विभागीय पदोन्नति कमेटी 'डीपीसी' पर स्टे लगा दिया था। इसके चलते लगभग तीन सौ सहायक कमांडेंट की पदोन्नति पर ब्रेक लग गया। अब सुप्रीम कोर्ट ने ही वह स्टे हटा दिया है। अब उन सभी सहायक कमांडेंट की एएमई/आरएमई रिपोर्ट को काउंटर साइन कराकर तुरंत संबंधित कार्यालय में जमा कराई जाए। अगर प्राधिकृत अथॉरिटी ड्यूटी या छुट्टी के चलते अपने स्टेशन से बाहर है तो लिंक्ड अफसर, मेडिकल रिपोर्ट पर काउंटर साइन कर उसे अविलंब भेजें।
दिल्ली हाईकोर्ट ही तय करेगा वरिष्ठता
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि डीपीसी से स्टे हटाने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ही संबंधित ग्राउंड कमांडरों की वरिष्ठता तय करेगा। सर्वोच्च अदालत में सहायक कमांडेंट की 'डेट ऑफ ज्वाइनिंग' को लेकर गलती सुधार हो गया है। पिछले कई वर्षों से यह मामला अदालत में लंबित था। इसके चलते वैकेंसी होते हुए भी सहायक कमांडेंट को पदोन्नति नहीं मिल पाई। 43 बैच 'डीएजीओ' के सभी अधिकारी और 44 बैच के कुछ अधिकारियों को डिप्टी कमांडेंट का पद मिलेगा। इनमें करीब 40 ऐसे ग्राउंड कमांडर भी हैं, जो फिलहाल प्रतिनियुक्ति पर हैं। कुल मिलाकर तीन सौ सहायक कमांडेंट, अब डिप्टी कमांडेंट बन जाएंगे।
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गत वर्षों में बल मुख्यालय द्वारा कोर्ट केस का हवाला देकर ग्राउंड कमांडरों को शांत कर दिया जाता था। इस मामले में ऐसे आरोप भी लगते रहे हैं कि बल मुख्यालय ने कोई ठोस विधिक उपाय नहीं किए।
केंद्रीय गृह मंत्रालय में उठा था ये मुद्दा
पिछले साल केंद्रीय गृह मंत्रालय में हुई एक उच्चस्तरीय बैठक में यह मुद्दा उठा था। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पदोन्नति के मुद्दे को गौर से सुना। उन्हें बताया गया कि ग्राउंड कमांडरों को वाकई पहली पदोन्नति मिलने में बहुत अधिक वक्त लग रहा है। बैठक में यह बात भी सामने आई कि पदोन्नति न होने के पीछे अदालत में चल रहा मामला है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, इस मामले में काफी संजीदा नजर आए। उन्होंने निर्देश दिए कि अदालत में इस केस की ठोस पैरवी कर पदोन्नति का रास्ता खोला जाए। उस बैठक में सीआरपीएफ के शीर्ष अधिकारी भी मौजूद थे। पदोन्नति के इस गतिरोध को खत्म कराने के लिए वरिष्ठ कानूनी विशेषज्ञों की राय ली गई।
करीब डेढ़ दशक से पदोन्नति का इंतजार
15 साल से पदोन्नति का इंतजार कर रहे सहायक कमांडेंट को डिप्टी कमांडेंट 'डीसी' के रिक्त पदों पर 'अगेंस्ट द वैकेंसी ऑफ डीसी' की पोस्टिंग भी नहीं मिल पा रही थी। समय पर पदोन्नति न मिलने से अफसरों के मनोबल पर विपरित असर पड़ता रहा। यही ग्राउंड कमांडर, बल में टेरेरिस्ट/नक्सली ऑपरेशन के अलावा चुनावी ड्यूटी और आपदा के दौरान कंपनी कमांड करते हैं। डेढ़ साल पहले सीआरपीएफ के तत्कालीन डीजी ने ग्राउंड कमांडरों के साथ एक संवाद किया था। तब अन्य बातों के अलावा कैडर अफसरों ने अपनी पदोन्नति का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया था। एक अधिकारी ने तो भावुक होकर स्वयं को अभिशापित अधिकारी बता दिया था। संवाद के दौरान कई दूसरे ग्राउंड कमांडर भी पदोन्नति को लेकर हतोत्साहित नजर आए थे। ग्राउंड कमांडरों से संवाद के बाद डीजी सीआरपीएफ ने उन्हें आश्वासन दिया था कि जल्द ही उनकी समस्या को हल किया जाएगा।
हमारा क्या कसूर है, कैडर अधिकारी बोले
ग्राउंड कमांडरों का कहना था कि इस मामले में हमारा क्या कसूर है। बल में ऐसी कौन सी ड्यूटी है, जिसमें उनकी भूमिका नहीं होती। अगर पहली पदोन्नति मिलने में ही 15 साल लग रहे हैं तो बाकी के सेवाकाल का अंदाजा लगाया जा सकता है। मतलब, आधी सर्विस में एक भी पदोन्नति नहीं मिल रही। अगर पदोन्नति, इसी रफ्तार से मिलती रही तो इन अधिकारियों को कब बटालियन कमांड करने का मौका मिलेगा। जब वे रिटायरमेंट के करीब होंगे, तब वे कमांडेंट बनेंगे। उनके लिए डीआईजी, आईजी या एडीजी के पदों तक पहुंचना तो एक सपना ही बना रहेगा। वे जब भी पदोन्नति का मुद्दा उठाते, उन्हें दो टूक जवाब मिलता था कि मामला तो अभी कोर्ट में है। डीपीसी पर स्टे है। अगर ऐसे ही डीपीसी पर स्टे लिया जाता रहा और विभाग, निष्क्रियता दिखाता रहा तो ये एक खतरनाक ट्रेंड बन जाएगा।
सब्जेक्ट टू कोर्ट जजमेंट के हिसाब से पदोन्नति
कैडर अफसरों का कहना था कि वरिष्ठता सहित हितों से संबंधित कई मुद्दे अदालत में चलते रहे हैं। ऐसा नहीं है कि इस प्रक्रिया के दौरान योग्य अधिकारियों को पदोन्नति नहीं मिलती। सब्जेक्ट टू कोर्ट जजमेंट के हिसाब से पदोन्नति दी जा सकती है। बतौर कैडर अफसर, कोर्ट केसों में विभाग का रवैया अभी तक लचर ही रहा है। अधिकारियों को समय पर नोटिस तक सर्व नहीं किया जाता। जब भी ग्राउंड कमांडर इस मुद्दे को बल मुख्यालय के शीर्ष अफसरों के समक्ष उठाते थे तो उन्हें यह दिलासा दिया जाता कि 'लॉ' इकाई, इस मामले में सक्रिय है। वरिष्ठता के मामले में सुप्रीम कोर्ट का स्टे चल रहा है, इसे जल्द खत्म कराने का प्रयास हो रहा है।
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अविलंब काउंटर साइन कराकर मेडिकल रिपोर्ट भेजें
सीआरपीएफ मुख्यालय ने 17 अप्रैल को सभी जोन, ग्रुप सेंटर, यूनिटों एवं दूसरी इकाइयों को आदेश दिया है कि वे उन सहायक कमांडेंट (जीडी) की मेडिकल रिपोर्ट, अति आवश्यक आधार पर भेजें, जिन्हें डिप्टी कमांडेंट (जीडी) की पदोन्नति मिलने जा रही है। लंबे समय से यह केस सर्वोच्च अदालत में लंबित था। सर्वोच्च अदालत ने विभागीय पदोन्नति कमेटी 'डीपीसी' पर स्टे लगा दिया था। इसके चलते लगभग तीन सौ सहायक कमांडेंट की पदोन्नति पर ब्रेक लग गया। अब सुप्रीम कोर्ट ने ही वह स्टे हटा दिया है। अब उन सभी सहायक कमांडेंट की एएमई/आरएमई रिपोर्ट को काउंटर साइन कराकर तुरंत संबंधित कार्यालय में जमा कराई जाए। अगर प्राधिकृत अथॉरिटी ड्यूटी या छुट्टी के चलते अपने स्टेशन से बाहर है तो लिंक्ड अफसर, मेडिकल रिपोर्ट पर काउंटर साइन कर उसे अविलंब भेजें।
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दिल्ली हाईकोर्ट ही तय करेगा वरिष्ठता
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि डीपीसी से स्टे हटाने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ही संबंधित ग्राउंड कमांडरों की वरिष्ठता तय करेगा। सर्वोच्च अदालत में सहायक कमांडेंट की 'डेट ऑफ ज्वाइनिंग' को लेकर गलती सुधार हो गया है। पिछले कई वर्षों से यह मामला अदालत में लंबित था। इसके चलते वैकेंसी होते हुए भी सहायक कमांडेंट को पदोन्नति नहीं मिल पाई। 43 बैच 'डीएजीओ' के सभी अधिकारी और 44 बैच के कुछ अधिकारियों को डिप्टी कमांडेंट का पद मिलेगा। इनमें करीब 40 ऐसे ग्राउंड कमांडर भी हैं, जो फिलहाल प्रतिनियुक्ति पर हैं। कुल मिलाकर तीन सौ सहायक कमांडेंट, अब डिप्टी कमांडेंट बन जाएंगे।
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गत वर्षों में बल मुख्यालय द्वारा कोर्ट केस का हवाला देकर ग्राउंड कमांडरों को शांत कर दिया जाता था। इस मामले में ऐसे आरोप भी लगते रहे हैं कि बल मुख्यालय ने कोई ठोस विधिक उपाय नहीं किए।
केंद्रीय गृह मंत्रालय में उठा था ये मुद्दा
पिछले साल केंद्रीय गृह मंत्रालय में हुई एक उच्चस्तरीय बैठक में यह मुद्दा उठा था। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पदोन्नति के मुद्दे को गौर से सुना। उन्हें बताया गया कि ग्राउंड कमांडरों को वाकई पहली पदोन्नति मिलने में बहुत अधिक वक्त लग रहा है। बैठक में यह बात भी सामने आई कि पदोन्नति न होने के पीछे अदालत में चल रहा मामला है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, इस मामले में काफी संजीदा नजर आए। उन्होंने निर्देश दिए कि अदालत में इस केस की ठोस पैरवी कर पदोन्नति का रास्ता खोला जाए। उस बैठक में सीआरपीएफ के शीर्ष अधिकारी भी मौजूद थे। पदोन्नति के इस गतिरोध को खत्म कराने के लिए वरिष्ठ कानूनी विशेषज्ञों की राय ली गई।
करीब डेढ़ दशक से पदोन्नति का इंतजार
15 साल से पदोन्नति का इंतजार कर रहे सहायक कमांडेंट को डिप्टी कमांडेंट 'डीसी' के रिक्त पदों पर 'अगेंस्ट द वैकेंसी ऑफ डीसी' की पोस्टिंग भी नहीं मिल पा रही थी। समय पर पदोन्नति न मिलने से अफसरों के मनोबल पर विपरित असर पड़ता रहा। यही ग्राउंड कमांडर, बल में टेरेरिस्ट/नक्सली ऑपरेशन के अलावा चुनावी ड्यूटी और आपदा के दौरान कंपनी कमांड करते हैं। डेढ़ साल पहले सीआरपीएफ के तत्कालीन डीजी ने ग्राउंड कमांडरों के साथ एक संवाद किया था। तब अन्य बातों के अलावा कैडर अफसरों ने अपनी पदोन्नति का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया था। एक अधिकारी ने तो भावुक होकर स्वयं को अभिशापित अधिकारी बता दिया था। संवाद के दौरान कई दूसरे ग्राउंड कमांडर भी पदोन्नति को लेकर हतोत्साहित नजर आए थे। ग्राउंड कमांडरों से संवाद के बाद डीजी सीआरपीएफ ने उन्हें आश्वासन दिया था कि जल्द ही उनकी समस्या को हल किया जाएगा।
हमारा क्या कसूर है, कैडर अधिकारी बोले
ग्राउंड कमांडरों का कहना था कि इस मामले में हमारा क्या कसूर है। बल में ऐसी कौन सी ड्यूटी है, जिसमें उनकी भूमिका नहीं होती। अगर पहली पदोन्नति मिलने में ही 15 साल लग रहे हैं तो बाकी के सेवाकाल का अंदाजा लगाया जा सकता है। मतलब, आधी सर्विस में एक भी पदोन्नति नहीं मिल रही। अगर पदोन्नति, इसी रफ्तार से मिलती रही तो इन अधिकारियों को कब बटालियन कमांड करने का मौका मिलेगा। जब वे रिटायरमेंट के करीब होंगे, तब वे कमांडेंट बनेंगे। उनके लिए डीआईजी, आईजी या एडीजी के पदों तक पहुंचना तो एक सपना ही बना रहेगा। वे जब भी पदोन्नति का मुद्दा उठाते, उन्हें दो टूक जवाब मिलता था कि मामला तो अभी कोर्ट में है। डीपीसी पर स्टे है। अगर ऐसे ही डीपीसी पर स्टे लिया जाता रहा और विभाग, निष्क्रियता दिखाता रहा तो ये एक खतरनाक ट्रेंड बन जाएगा।
सब्जेक्ट टू कोर्ट जजमेंट के हिसाब से पदोन्नति
कैडर अफसरों का कहना था कि वरिष्ठता सहित हितों से संबंधित कई मुद्दे अदालत में चलते रहे हैं। ऐसा नहीं है कि इस प्रक्रिया के दौरान योग्य अधिकारियों को पदोन्नति नहीं मिलती। सब्जेक्ट टू कोर्ट जजमेंट के हिसाब से पदोन्नति दी जा सकती है। बतौर कैडर अफसर, कोर्ट केसों में विभाग का रवैया अभी तक लचर ही रहा है। अधिकारियों को समय पर नोटिस तक सर्व नहीं किया जाता। जब भी ग्राउंड कमांडर इस मुद्दे को बल मुख्यालय के शीर्ष अफसरों के समक्ष उठाते थे तो उन्हें यह दिलासा दिया जाता कि 'लॉ' इकाई, इस मामले में सक्रिय है। वरिष्ठता के मामले में सुप्रीम कोर्ट का स्टे चल रहा है, इसे जल्द खत्म कराने का प्रयास हो रहा है।