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कोरोना: देश में संक्रमण रोकने में नई चुनौती बन रहे 'फॉल्स निगेटिव', यह है वजह

Tue, 14 Apr 2020 03:14 AM IST
योगेश साहू अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली। Published by: योगेश साहू Updated Tue, 14 Apr 2020 03:14 AM IST
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Coronavirus Case News In Hindi : false negative patient are becoming a new challenge to prevent infection
लापरवाही: दिल्ली में अशोक रोड पर फेंका गया मास्क। - फोटो : PTI

मुंबई में एक डॉक्टर को खांसी हुई, फिर बुखार आया। कोरोना वायरस संक्रमण का संदेह हुआ, तो उन्होंने बीएमसी के कस्तूरबा अस्पताल की प्रयोगशाला में जांच करवाई। इसकी रिपोर्ट निगेटिव आई, यानी उन्हें संक्रमण नहीं था। उन्होंने राहत की सांस ली लेकिन लक्षण बने रहे, इसलिए दो दिन बाद ही फिर जांच करवाई। इस बार रिपोर्ट पॉजिटिव आई, यानी वे संक्रमित हो चुके थे। ऐसे कई मामले देश के पुणे, नोएडा, जैसे शहरों में सामने आ रहे हैं।

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इनकी वजह से कोविड-19 के मरीजों को लेकर चिकित्सकों में चिंताएं बढ़ गई हैं। अधिकतर एकमत हैं कि कोरोना वायरस के पहले टेस्ट में ही शरीर में मौजूद रहते हुए भी पकड़ में न आ पाने की वजह से ऐसा हो रहा है। यह मामले चिकित्सा विज्ञान में ‘फॉल्स निगेटिव’ कहलाते हैं। किसी भी व्यक्ति को पूरी तरह निगेटिव या पॉजिटिव घोषित करने के लिए 24 घंटे के अंतराल पर हुई दो-जांच में एक जैसे परिणामों को पुख्ता माना जा रहा है। 
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हाईरिस्क ग्रुप की जांच में खास सावधानी बरतें
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि केवल निगेटिव टेस्ट रिपोर्ट के मायने यह नहीं निकालें कि व्यक्ति में संक्रमण नहीं है। व्यक्ति में अगर लक्षण मिल रहे हैं तो पुख्ता जांच जरूरी हो जाती है। खासतौर से ऐसे लोग जिन्हें हाईरिस्क श्रेणी में रखा गया है, वे अधिक उम्र के हैं, डायबिटीज, हाइपर टेंशन, किडनी या हृदय रोग से ग्रस्त हैं तो उनके मामले में विशेष सावधानी बरतनी होगी।

वजह : सभी टेस्ट 100 प्रतिशत सटीक नहीं

सभी टेस्ट 100 प्रतिशत पुख्ता तौर पर नहीं कह सकते कि व्यक्ति में वायरस नहीं है। इसकी वजह है कि यह बेहद संवेदनशील अनुवांशिक तत्वों की मौजूदगी के आधार पर वायरस होने या न होने की रिपोर्ट देते हैं। येल विश्वविद्यालय में मेडिसिन के प्रोफेसर डॉ. हरलन एम क्रमहोल्ज के अनुसार संक्रमण के शुरुआती समय में बहुत संभव है कि सैंपल के समय इतने अनुवांशिक तत्व ही न मिल पाएं जो जांच के सही परिणाम दे सकें।

फेफड़ों में संक्रमण तो नाक के स्वैब से नतीजा गलत

महाराष्ट्र में संक्रमण रोकने के लिए बनी समिति के अध्यक्ष डॉ. सुभाष सालुंखे दावा करते हैं कि अभी तो केवल वायरस की जांच के जरिए नए सबक ही मिल रहे हैं। सीमित डाटा की वजह से जितने मामले निगेटिव आ रहे हैं, उनकी बहुत पुख्ता रिपोर्ट हमारे पास होनी चाहिए।

कई बार सैंपल ठीक से प्रोसेस न करने पर परिणाम निगेटिव मिल सकते हैं। कभी ऐसा भी होता है कि संक्रमित व्यक्ति से स्वैब सैंपल लेने में चूक हो जाती है। वहीं अगर वायरस फेफड़ों में हो तो नाक से लिए गए सैंपल में वह बहुत संभव है कि न मिले।

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