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पांच माह से कोविड वार्ड में जुटे हैं नंद... पीपीई किट में पसीने से तर बेटे को देख मां के छलक पड़े आंसू
Wed, 22 Jul 2020 06:26 AM IST
योगेश साहू
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।
Published by: योगेश साहू
Updated Wed, 22 Jul 2020 06:26 AM IST
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नर्सिंग ऑफिसर नंद भंवर
- फोटो : Amar Ujala
फेसबुक के साथ अमर उजाला ने कोरोना सेनानियों के जज्बे और जुनून पर यह श्रृंखला शुरू की है। इसके तहत आपको साहसी कोरोना सेनानियों की कथाएं नियमित रूप से पढ़ने को मिलेंगी।
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देश के सबसे बड़े अस्पतालों में से एक अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के झज्जर कैंपस में पांच महीने से कोरोना संक्रमित मरीजों को उनके बिस्तर पर ही डायलिसिस की सेवा दे रहे नर्सिंग ऑफिसर नंद भंवर ऐसे कोरोना वॉरियर हैं, जिन पर पूरे संस्थान को गर्व है।
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पीपीई किट में पसीने से तर-बतर बेटे नंद भंवर को देख उनकी मां के आंसू उस वक्त छलक उठे, जब वे करीब बेहोशी जैसी स्थिति में थे और मां से वीडियो कॉल पर बात कर रहे थे। उस दिन मां काफी घबरा गईं। कुछ देर बाद जब नंद ने होश संभाला और फिर मां से बात की, तब उन्हें संतोष हुआ।
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बेटे के काम से गदगद मां ने पहली बार कहा, बेटा तू वाकई भगवान है। तेरे जैसा लाल भगवान हर मां को दे। आज तुझे देख मेरा जीवन धन्य हो गया। तू चिंता मत कर, बस लोगों की सेवा कर।
नंद बताते हैं, तीन से चार घंटे तक अगर कोई व्यक्ति पीपीई किट पहनता है तो उसे ज्यादा तकलीफ नहीं होती, लेकिन अगर किट को 9 से 12 घंटे तक पहना जाए तो पसीना, डिहाइड्रेशन, घबराहट जैसी तकलीफ होने लगती है।
उन्होंने वह दिन भी देखा, जब 9 घंटे बाद उन्होंने पीपीई किट उतारी तो नीचे (जूते की ओर) पसीना पानी की तरह भर चुका था। राजस्थान के भीलवाड़ा निवासी नंद भंवर ने बताया कि इसी साल जनवरी में उनकी शादी हुई है।
लेकिन तीन दिन बाद ही उन्हें ड्यूटी पर वापस बुला लिया गया। झज्जर एम्स के राष्ट्रीय कैंसर संस्थान में पहले डायलिसिस की सुविधा नहीं थी, लेकिन कोविड वार्ड बनने के बाद यह सेवा शुरू हुई।
तकनीकी और चिकित्सकीय दो तरह से डायलिसिस पर काम किया जाता है। चूंकि उनके संस्थान में अभी कोई तकनीशियन नहीं है, इसलिए वे दोनों तरह का काम करते हुए कोरोना मरीज को बेखौफ डायलिसिस की सुविधा उनके बिस्तर पर जाकर दे रहे हैं।
(फेसबुक ने इस श्रृंखला के लिए हमारे साथ भागीदारी की है, लेकिन इस कड़ी में प्रकाशित होने वाले समाचारों पर कोई संपादकीय नियंत्रण नहीं लगाया है।)