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सावधानी जरूरी: बेकाबू मधुमेह और प्रतिरक्षा दबाने से हो सकता है जानलेवा फंगल संक्रमण
Sat, 08 May 2021 06:40 AM IST
Kuldeep Singh
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Published by: Kuldeep Singh
Updated Sat, 08 May 2021 06:40 AM IST
सार
कोरोना संक्रमित मरीजों में जानलेवा फंगल संक्रमण भी हो रहा है जिसकी वजह से आंखों की रोशनी जा सकती है। अब तक दिल्ली के पांच बड़े अस्पतालों में एक दर्जन से ज्यादा ऐसे मामले सामने आए हैं
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fungal infection
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विस्तार
इसे लेकर नीति आयोग के सदस्य डॉ. वीके पॉल ने कहा कि अनियंत्रित मधुमेह, टोसिलिजुमैब और प्रतिरक्षा दबाने की वजह से यह म्यूकोरमाइकोसिस संक्रमण हो सकता है। इसलिए कोरोना के साथ-साथ दूसरे संक्रमण को लेकर भी लोगों को सतर्कता बरतनी होगी।
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नीति आयोग के सदस्य डॉ. वीके पॉल ने किया अलर्ट, सतर्कता से रोक सकते हैं संक्रमण
इसके लिए डॉ. पॉल ने सलाह दी है कि मधुमेह रोगियों को लगातार प्रयास करना है कि उनके शरीर में मधुमेह का स्तर नियंत्रित रहना चाहिए। कोरोना या किसी भी तरह के संक्रमण से अनियंत्रित मधुमेह रोगियों को खतरा बना रहेगा। इसके अलावा टोसिलिजुमैब दवा कोरोना के गंभीर रोगियों को दी जा रही है।
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हर दवा का कोई दुष्प्रभाव जरूर होता है। इसलिए टोसिलिजुमैब की वजह से भी फंगल संक्रमण हो सकता है। कोविड प्रोटोकॉल में भी इस दवा की डोज को कम किया है। इसीलिए सरकार लगातार अपील कर रही है कि इस दवा को बहुत अधिक जरूरत होने पर ही लिया जाए। डॉक्टरों को भी यह ध्यान देना होगा।
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दरअसल दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल, लेडी हार्डिग मेडिकल कॉलेज, सफदरजंग और एम्स सहित पांच अस्पतालों में अब तक एक दर्जन से अधिक मामले सामने आए हैं जिन्हें कोरोना होने के साथ साथ म्यूकोरमाइकोसिस नामक संक्रमण की पहचान भी हुई है। यह काफी तेज संक्रमण होता है जो सीधे तौर पर आंखों की रोशनी को प्रभावित करता है।
गंगाराम अस्पताल के वरिष्ठ डॉक्टर मनीष मुंजाल ने कहा कि हम कोविड-19 से होने वाले इस खतरनाक फंगल संक्रमण के मामलों में फिर से वृद्धि देख रहे हैं। बीते दो दिन में हमने म्यूकोरमाइसिस से पीड़ित छह रोगियों को भर्ती किया है। बीते साल इस घातक संक्रमण में मृत्यु दर काफी अधिक रही थी और इससे पीड़ित कई लोगों की आंखों की रोशनी चली गई थी तथा नाक और जबड़े की हड्डी गल गई थी।
डॉ. पॉल ने कहा कि कोरोना मरीजों में इस प्रकार के संक्रमण से इनकार नहीं किया जा सकता है लेकिन इस स्थिति से बचा जरूर जा सकता है। अगर डॉक्टर इस पर ध्यान रखें और मरीज व अन्य लोग भी सतर्कता बरतें तो इस से बचा जा सकता है। इसके अलावा अगर मरीज घर पर ऑक्सीजन ले रहा है तो सिलेंडर पर लगे फ्लो मीटर के पास जो गिलास होता है उससे पानी नहीं टपकना चाहिए।
ठीक इसी तरह कोरोना मरीज में जब संक्रमण बढ़ता है तो उसकी प्रतिरक्षा को बचाने के लिए दूसरी दवाएं जैसे रेमडेसिविर, टोसिलिजुमैब दी जाती हैं। स्टेरॉयड भी इसमें शामिल है। इसीलिए इन दवाओं का दुष्प्रभाव भी काफी होता है। डॉक्टरों को यह भी ध्यान रखना है कि स्टेरॉयड का फिजुल खर्च नहीं होना चाहिए। बेवजह इनकी खपत से काफी नुकसान होगा और जरूरतमंद मरीज के लिए भी दवा कम होगी।
बायोलॉजिकल ई अगस्त से शुरू करेगी उत्पादन
नई दिल्ली। भारतीय दवा कंपनी बायोलॉजिकल ई लि. जल्द ही अपने कोविड-19 टीके के तीसरे चरण के टीके का परीक्षण शुरू करेगा। इसके साथ ही उसकी अगस्त से आठ करोड़ खुराक प्रति महीने तैयार करने की योजना है।
कंपनी के प्रबंध निदेशक महिमा डाटला ने बताया कि कंपनी ने बैयलोर कॉलेज ऑफ मेडिसिन ह्यूस्टन एंड डायनावैक्स टेक्नलॉजी कार्पोरेशन के साथ मिलकर इस टीके को विकसित किया है। पिछले महीने ही टीके को भारतीय औषधि नियामक से तीसरे चरण के परीक्षण की मंजूरी मिली थी। डाटला ने बताया कि वह जल्द ही इसके आपातकालीन इस्तेमाल की मंजूरी के लिए आवेदन करेंगे।