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कांग्रेस: पार्टी की एससी पॉलिटिक्स किसके भरोसे, नए नेताओं को कितना मौका दे रहे राहुल गांधी

Tue, 21 Sep 2021 03:28 PM IST
प्रतिभा ज्योति प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली।
प्रतिभा ज्योति, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: प्रतिभा ज्योति Updated Tue, 21 Sep 2021 03:28 PM IST
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सार
चरणजीत सिंह चन्नी को पंजाब का मुख्यमंत्री बनाने को कांग्रेस का मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि इससे पार्टी ने पंजाब के साथ-साथ अगले साल पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव के भी लिए भी जातीय समीकरण साध लिए हैं। लेकिन क्या अपने पुराने वोट बैंक को वापिस हासिल करने के लिए लेकर कांग्रेस की राजनीति केवल चन्नी के इर्द-गिर्द ही घूमेगी या फिर नए एससी नेताओं को भी नेतृत्व का मौका मिलेगा? 
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Congress: party's  Dalit politics depends on whom,  How much chance is Rahul Gandhi giving to new leaders?
हरीश रावत और राहुल गांधी के साथ चरणजीत सिंह चन्नी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

फरवरी 2016 में राहुल गांधी जब लखनऊ में पार्टी की राज्य इकाई की ओर से आयोजित एससी कॉन्क्लेव को संबोधित कर रहे थे तो उन्होंने वहां मौजूद युवाओं से कहा कि कांग्रेस ज्वाइन करो मैं आपको ताकत दूंगा। युवा दलितों को कांग्रेस में शामिल होने के लिए कहते हुए राहुल ने वादा किया कि उनकी पार्टी उन्हें आगे बढ़ने का मंच देगी। तो क्या एससी वोट पर नजर गड़ाए राहुल गांधी वाकई एससी नेताओं को आगे बढ़ने के लिए मंच दे रहे हैं। कांग्रेस का दावा है कि बड़े पैमाने पर हर राज्य में एससी नेताओं की एक सशक्त टीम तैयार हो रही है जो आने वाले चुनावों को ध्यान में रखकर तैयार की जा रही है। कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में युवा नेताओं की एक ऐसी फौज तैयार हो चुकी है जो विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए तैयार है। 


नई लीडरशीप तैयार
पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, राहुल गांधी के नेतृत्व में बड़े पैमाने पर हर राज्य में एससी लीडरशीप तैयार हो रही है। यूपी में तीन दशक से सत्ता से दूर कांग्रेस राज्य में वापसी के लिए भाजपा की सरकार को हटाने की कोशिश में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही. इसलिए युवा नेताओं का साथ आना जरूरी है। राहुल गांधी सिर्फ दिखावे के लिए काम नहीं करते, वे वाकई नेतृत्व तैयार करने में भरोसा रखते हैं। सिर्फ यूपी की ही बात करें तो सैंकड़ों एससी नेता पार्टी में जिम्मेदारी उठाने को तैयार हैं। इसके अलावा अलग-अलग राज्यों में कई एससी नेताओं को जिम्मेदारी दी गई है। 


पार्टी नेताओं का कहना है कि अलग-अलग विभागों और राज्यों में कई एससी युवा नेताओं को जिम्मेदारी सौंपी गई है और राहुल गांधी ने इन युवाओं पर अपना भरोसा जताया है। कांग्रेस के अनुसूचित जाति विभाग के अध्यक्ष डॉ नितिन राउत को पार्टी मुख्य एससी चेहरे के तौर पर पेश करती है। नितिन राउत ने हाल ही में 21 राज्यों के राष्ट्रीय पदाधिकारियों और राज्य अध्यक्षों के साथ मिलकर चुनावी रणनीति तैयार की। वे एससी वोटर्स पर खास फोकस कर रहे हैं।

दिल्ली के नेता राजेश लिलौटिया को कांग्रेस ने 2019 के लोकसभा चुनाव में आरक्षित सीट उत्तर पश्चिम दिल्ली से अपना उम्मीदवार बनाया था। राम्या हरिदास केरल से चुनी गई एकमात्र महिला सांसद हैं। वर्ष 2010 में भविष्य का नेता चुनने के लिए आयोजित गांधी टैलेंट हंट 'भविष्य का नेता' में टॉपर रही थीं। 

 

जिग्नेश मेवानी
जिग्नेश मेवानी
राहुल ने पूर्व नौकरशाह कोप्पुला राजू को कांग्रेस कोर टीम के नए प्रमुख के रूप में चुना है। वे आंध्र कैडर के रिटार्यड आईएएस ऑफिसर हैं। कोप्पुला राजू कांग्रेस में एक महत्वपूर्ण एससी चेहरा माने जाते हैं और अगस्त 2013 से पार्टी की अनुसूचित जाति विभाग का नेतृत्व कर रहे थे। अब वे कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी की कोर टीम का हिस्सा हैं। इसके अलावा बाजीराव खाड़े, उत्तर प्रदेश के सेक्रेटरी इंचार्ज, बृजलाल खबरी-बिहार के सेक्रेटरी इंचार्ज हैं। गुजरात में एससी समुदाय पर अपनी पकड़ बनाने के लिए पार्टी युवा नेता जिग्नेश मेवानी को पार्टी में लाने पर विचार कर रही है।

कांग्रेस पार्टी को लंबे समय से कवर करने वाली वरिष्ठ पत्रकार स्मिता गुप्ता कहती हैं ज्यादा से ज्यादा एससी नेताओं को आगे लाना होगा और पद देना होगा। केवल एक एससी नेता को सीएम बना देने से पार्टी को कोई खास सियासी फायदा नहीं होगा।  इसके लिए नेताओं की फौज तैयार करनी होगी। लेकिन हां, यदि चरणजीत सिंह चन्नी जैसे नेता अपनी काबिलियत साबित कर सकें तो पार्टी में उनका कद बढ़ जाएगा और दूसरे एससी नेताओं का भी दावा मजबूत होगा।  

अशोक तंवर राहुल पर उठाते हैं सवाल
हालांकि पार्टी ने कुछ महत्वाकांक्षी युवा नेताओं को दूर भी कर दिया है। हरियाणा की राजनीति में एससी नेता के तौर पर पहचान रखने वाले पूर्व कांग्रेसी नेता अशोक तंवर राहुल गांधी के फैसले को लेकर सवाल खड़े करते हैं। तंवर लंबे समय से राजनीतिक वनवास झेल रहे हैं। भूपेंद्र सिंह हुड्डा के दबाव में पिछले विधानसभा चुनाव से ठीक पहले तंवर को हरियाणा कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटाया गया था और कुमारी सैलजा को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष पद सौंपा गया था। इसके बाद अशोक तंवर ने पार्टी छोड़ने का एलान कर दिया और अपना अलग मोर्चा बना लिया है। 

अशोक तंवर कहते हैं-कांग्रेस सिर्फ एससी युवाओं और नेताओं को आगे करने की बात करती है, यह महज ढोंग है। चरणजीत सिंह चन्नी को सीएम की कुर्सी तक पहुंचा दिया यह एक चुनावी हथकंडा है। कांग्रेस पार्टी मेहनतकश एससी युवाओं को आगे नहीं आने देना चाहती और जो अपनी क्षमता से आगे बढ़ते हैं उन्हें रोक दिया जाता है।

कांग्रेस को पता नहीं जो लुट गया उसे कैसे हासिल करें
दिल्ली विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र के प्रोफेसर शशिभूषण सिंह इससे इत्तिफाक रखते हैं। उनका कहना है कांग्रेस को समझ में नहीं आ रहा है कि हमारा जो लुट गया उसे कैसे हासिल करें। एक जमाने में एससी वोट पर कांग्रेस की मजबूत पकड़ थी, जो धीरे-धीरे फिसल गई है। इसकी एक बड़ी वजह यह है  कि चाहे एससी समुदाय से हो या किसी और समुदाय से कांग्रेस ऐसे किसी भी नेता को आगे नहीं बढ़ना देना चाहती जिसका मजबूत जनाधार हो जाए। क्योंकि पार्टी नेतृत्व को इससे असुरक्षा होने लगती है। चन्नी को सीएम बचाने से ज्यादा पार्टी को अमरिंदर सिंह से छुटकारा पाना था। इसलिए कांग्रेस के इस कदम से ज्यादा उम्मीद मत पालिए।
 

सुशील कुमार शिंदे (फाइल फोटो)
सुशील कुमार शिंदे (फाइल फोटो) - फोटो : Social Media
पढ़े-लिखे  नेताओं को आगे लाएं राहुल
स्मिता गुप्ता कहती हैं नेतृत्व सौंपने के लिए सिर्फ जाति मापदंड नहीं होना चाहिए। यदि राहुल गांधी पढ़े-लिखे अंबेदकरवादी दमदार नेताओं को जो नेतृत्व करना चाहते हैं, यदि उन्हें आगे लेकर आएं तभी पार्टी को इसका फायदा होगा। यह जरूरी है कि पद संभालने वाले व्यक्ति में संगठन और नेतृत्व की क्षमता हो। राहुल गांधी अनुसूचित जाति के लोगों के  घर जाकर खाना खाते हैं, इससे उस समुदाय को अब ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। उनके लिए किसी नेता का उनके घर खाना खाने का अब कोई मायने नहीं रह गया है क्योंकि उन्होंने मायावती को मुख्यमंत्री बनते देखा है। 

कांग्रेस की एससी राजनीति बहुत पुरानी
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ सोशल साइंस सेंटर में समाजशास्त्र विभाग के प्रमुख विवेक कुमार का कहना है कि कांग्रेस की एससी राजनीति बहुत पुरानी है जो जगजीवन राम से शुरू होती है। इंदिरा गांधी ने जगजीवन राम का नाम लेकर पूरे एससी समाज को अपने साथ कर लिया था।  लेकिन बाद में क्या हुआ जब सत्ता उनको देनी थी तो उनको बाहर का रास्ता दिखा दिया। एससी की वजह से सत्ता में बने रहे। यह प्रश्न पूछा जाना चाहिए कि अनुसूचित जाति ने कांग्रेस को कितनी बार सत्ता दिलाई है।

कांग्रेस पर एससी नेताओं को छोड़ने का आरोप
कांग्रेस पर यह आरोप लगते रहे हैं कि वे एससी नेताओं के जरिए सियासी फायदा तो उठाती है लेकिन जब उन्हें सत्ता में लाने की बारी आती है तो उन्हें भूल जाती है। बताया जाता है कि राजनीतिक लाभ के लिए महाराष्ट्र में (2003-04) के चुनाव से पहले सुशील कुमार शिंदे को मुख्यमंत्री नियुक्त बनाया और जीत के बाद विलासराव देशमुख के कारण उन्हें छोड़ दिया। इसी तरह पार्टी पर 1980 में राजस्थान में जगन्नाथ पहाड़िया के साथ भी ऐसा ही व्यवहार करने का आरोप लगा। चुनाव उनके नेतृत्व में लड़ा गया लेकिन चुनाव के बाद शिवचरण माथुर को मुख्यमंत्री बनाया। 

भाजपा भी कांग्रेस पर यही आरोप लगा रही कि कांग्रेस की राजनीति में एससी महज एक मोहरा है। कौशांबी के सांसद विनोद सोनकर ने पंजाब में सत्तारूढ़ पार्टी पर "दिखावे के एससी-प्रेम" में लिप्त होने का आरोप लगाया है। सोनकर ने मीडिया से बातचीत में कहा कांग्रेस का एससी समुदाय के नेताओं को "छोड़ देने" और "बुरा व्यवहार" करने का इतिहास रहा है। उन्होंने कहा कि "कांग्रेस भूल गई होगी कि उसने डॉ भीमराव अंबेडकर के साथ कैसा व्यवहार किया या बाबू जगजीवन राम को प्रधान मंत्री बनने से किस तरह रोका गया था। अगर उनकी मंशा साफ है, तो उन्हें गारंटी देनी चाहिए कि वे चुनाव के बाद चन्नी को नहीं छोड़ेंगे। 
 

मीरा कुमार
मीरा कुमार - फोटो : Social Media
पुराने नेताओं को लेकर सवाल
विवेक कुमार कांग्रेस के पुराने एससी नेताओं को लेकर भी कुछ सवाल करते हैं। वे कहते हैं कांग्रेस ने एससी समुदाय के नाम पर प्रतीकात्मक राजनीति करती रही है। जगजीवन राम के नाम पर मीरा कुमार को लोकसभा अध्यक्ष भी बना दिया लेकिन क्या उनमें निर्णय लेने की क्षमता थी या उनकी वजह से एससी समुदाय में कोई गुणात्मक परिवर्तन आया? जैसे ही मायावती का उदय होने लगा कांग्रेस ने एससी को ज्यादा तरजीह देना शुरु किया लेकिन वह सिर्फ गिने-चुने एससी नेताओं तक सिमट कर रह गई है। कांग्रेस ने एससी राष्ट्रपति भी बना दिया, सात-सात गर्वनर बना दिए लेकिन बताइए कि इससे गरीब एससी समुदाय के जीवन में कितना फर्क आया? 

कांग्रेस के वो नेता जो एससी समुदाय का चेहरा हैं
मल्लिकार्जुन खड़गे, सुशील कुमार शिंदे, मीरा कुमार, कुमारी सैलजा, मुकुल वासनिक, पीएल पुनिया कई ऐसे नाम है जिनके चेहरे आगे करके कांग्रेस अब तक अनूसूचित जाति की राजनीति करती रही है। लेकिन मल्लिकार्जुन खड़गे, पीएल पुनिया और कुमारी सैलजा को को छोड़ दें तो बाकी नेता अभी ज्यादा सक्रिय नजर आते।

देश के प्रख्यात एससी नेता और उपप्रधानमंत्री रहे बाबू जगजीवन राम की बेटी होने के नाते मीरा कुमार का सियासी सफर शुरू हुआ और उन्हें देश की पहली महिला लोकसभा अध्यक्ष बनने का मिला गौरव हासिल हुआ। मीरा कुमार कांग्रेस का एक महत्वपूर्ण एससी महिला चेहरा मानी जाती रही हैं। कांग्रेस अपनी बिहार इकाई की कमान किसी एससी चेहरे को सौंपने की तैयारी में है और इसमें मीरा कुमार का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा था। हालांकि बताया गया है कि मीरा कुमार ने प्रदेश अध्यक्ष बनने से मना कर दिया है। विधायक राजेश राम का नाम भी बिहार कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए आगे चल रहा है।

मल्लिकार्जुन खड़गे कर्नाटक से कांग्रेस का दलित चेहरा हैं।  राज्यसभा में कांग्रेस के नेता बनाए गए हैं। खड़गे की राजनीतिक यात्रा लंबी रही है। वे कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी के भरोसे के शख्स माने जाते हैं। पार्टी उन्हे संकट मोचक की तरह देखती है। पीएल पुनिया उत्तर प्रदेश से काग्रेस का प्रमुख एससी चेहरा माने जाते हैं। पिछले साल तक राज्यसभा सांसद रहे और अब  छत्तीसगढ़ के प्रभारी हैं। 2009 का लोकसभा चुनाव वे बाराबंकी से लड़े लेकिन 2014 में अपनी सीट नहीं बचा पाए। वहीं बात करें कुमारी सैलजा की तो वे हरियाणा में कांग्रेस का मुख्य एससी चेहरा हैं। पार्टी ने उन्हें राज्यसभा भी पहुंचाया और अब वे हरियाणा की प्रदेश अध्यक्ष हैं।

2019 में हुए लोकसभा चुनाव के बाद इस बात की चर्चा जोरों पर थी कि 136 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी की कमान संभालने वाले अगले पार्टी अध्यक्ष मुकुल वासनिक हो सकते हैं। उस समय वह पार्टी अध्यक्ष बनने की दौड़ में सबसे आगे माने जा रहे थे। मुकुल वासनिक महाराष्ट्र के एक दलित नेता हैं। उत्तर-पश्चिम दिल्ली के सासंद रहे उदित राज ने 2019 के चुनाव में टिकट नहीं मिलने से नाराज होकर कांग्रेस का दामन थाम लिया था लेकिन माना जाता है कि वे दूसरे राज्यों में एससी वोट बटोरने में उतने प्रभावी नहीं है। 


 
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