CRPF: सीएमओ ने सीआरपीएफ डिप्टी कमांडेंट से बोले ऐसे शब्द कि मामला पहुंच गया बल मुख्यालय, जानें क्या है विवाद?
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विस्तार
देश के सबसे बड़े केंद्रीय अर्धसैनिक बल 'सीआरपीएफ' के हैदराबाद स्थित ग्रुप सेंटर पर डिप्टी कमांडेंट और चीफ मेडिकल अफसर 'सीएमओ' के बीच एक बड़ा विवाद सामने आया है। मामले की जानकारी नई दिल्ली स्थित, बल मुख्यालय को भी दी गई है। डिप्टी कमांडेंट की गलती केवल इतनी सी थी कि उन्होंने डीआईजी रिक्रूटमेंट के निर्देशों का हवाला देते हुए सीएमओ से उच्च अधिकारियों की बैठक में आने की प्रार्थना कर दी। इस पर सीएमओ भड़क गए। उन्होंने डिप्टी कमांडेंट के लिए अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया। इतना ही नहीं, सीएमओ ने कहा, तुम एक जूनियर अधिकारी होकर मुझे बैठक के लिए बुला रहे हो। यह मामला अब शीर्ष अधिकारियों तक पहुंच गया है। देखने वाली बात यह है कि अब सीएमओ के खिलाफ सख्त कार्रवाई होती है या नहीं।
डिप्टी कमांडेंट ने इसलिए किया था सीएमओ को फोन
अश्वनी कुमार मिश्रा, ग्रुप सेंटर हैदराबाद पर डिप्टी कमांडेंट (प्रशासन) की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। उनके पास एसी (लीगल) का भी चार्ज है। ग्रुप सेंटर पर मेडिकल ऑफिसर सिलेक्शन बोर्ड 'एमओएसबी'2022 के तहत कई तरह की जिम्मेदारियां निभानी होती हैं। भर्ती प्रक्रिया, बिना किसी बाधा के संपन्न हो, इसके लिए विभिन्न शाखाओं के बीच समन्वय करने का दायित्व भी डिप्टी कमांडेंट मिश्रा, निभा रहे हैं। डॉ. नागभूषण, सीआरपीएफ के हैदराबाद स्थित कंपोजिट अस्पताल में सीएमओ के अलावा प्रशासनिक अधिकारी भी हैं। 13 मई को डिप्टी कमांडेंट मिश्रा ने सीएमओ डॉ. नागभूषण एम से टेलीफोन पर बातचीत की। इसका मकसद भर्ती प्रक्रिया से जुड़ी तैयारी जैसे 'रिव्यू मेडिकल एग्जामिनेशन' (आरएमई)/'मेडिकल एग्जामिनेशन टेस्ट' (एमईटी) आदि के लिए प्रबंध कार्यों का जायजा लेना था।
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इस बात पर भड़क गए डॉ. नागभूषण
डिप्टी कमांडेंट मिश्रा ने डॉ. नागभूषण से प्रार्थना करते हुए कहा, अगर उनके पास समय हो, तो वे ग्रुप सेंटर के प्रशासनिक भवन में आ सकते हैं। उस बैठक में सीआरपीएफ साउथ जोन के एडीजी और भर्ती बोर्ड के सदस्य भी आने थे। यह बैठक 14 मई को होनी थी। मिश्रा ने जैसे ही बैठक में आने के लिए कहा तो डॉ. नागभूषण नाराज हो गए। उन्होंने शिष्ट तरीका छोड़ते हुए मिश्रा के साथ अभद्रतापूर्वक बातचीत की। सीएमओ ने सीआरपीएफ के राजपत्रित अधिकारी डिप्टी कमांडेंट अश्वनी कुमार मिश्रा, जो 17 वर्ष की सेवा पूरी कर चुके हैं, को अपशब्द कह दिए। तुम एक जूनियर अधिकारी होकर मुझे बैठक में आने के लिए कह रहे हो। इन बातों से सीएमओ के गैर जिम्मेदाराना व्यवहार का अंदाजा लगाया जा सकता है। ऐसा व्यवहार तो तब हुआ है, जब डिप्टी कमांडेंट मिश्रा की सेवा, डॉ. नागभूषण से कहीं ज्यादा है।
क्या अब सीएमओ के खिलाफ होगी कार्रवाई
डिप्टी कमांडेंट मिश्रा ने सीएमओ के साथ बातचीत में डीआईजी 'रिक्रूटमेंट' के 11 अप्रैल को जारी उन निर्देशों का हवाला दिया था, जिसमें भर्ती प्रक्रिया को बिना किसी बाधा के संपन्न कराने की बात कही गई है। चूंकि डॉ. नागभूषण, हैदराबाद में अस्पताल के प्रशासनिक अधिकारी भी हैं, इसलिए वहां चल रही भर्ती प्रक्रिया में उनका योगदान भी अहम है। डॉ. नागभूषण के इस व्यवहार की शिकायत ग्रुप सेंटर के डीआईजी से की गई है। ग्रुप सेंटर के डीआईजी ने यह जानकारी आईजी 'दक्षिण सेक्टर' को दी है। इसके अलावा मेडिकल डायरेक्टर को भी उक्त मामले से अवगत कराया गया है। डीआईजी रिक्रूटमेंट और भर्ती बोर्ड के समक्ष भी यह मामला रखा गया। ग्रुप सेंटर के डीआईजी ने अपने सिग्नल में सीएमओ के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की मांग की है।
डॉक्टरों और कैडर अफसरों के बीच रहा है विवाद
सीएपीएफ में मेडिकल कैडर, मिनिस्ट्रियल और यहां तक की वेटनरी डॉक्टर को भी समय पर पदोन्नति मिल जाती है, मगर एग्जीक्यूटिव कैडर के अफसर, इस मामले में पिछड़ जाते हैं। सीआरपीएफ के एमटेक, बीटेक, आईआईटी व दूसरी डिग्री हासिल किए अधिकारियों को समय रहते पदोन्नति नहीं मिल पाती। सुप्रीम कोर्ट ने कैडर अधिकारियों के मामले में संगठित सेवा 'ओजीएएस' का लाभ देने का आदेश दिया। 2019 में केंद्रीय कैबिनेट से नोटिफाई होने के बाद भी 'ओजीएएस' आज तक लागू नहीं हो सका। इस वजह से नए सर्विस रूल्स भी नहीं बने। ऐसे में एग्जीक्यूटिव कैडर को पदोन्नति मिलने की राह दूर होती चली गई। दो साल पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने सीआरपीएफ के तत्कालीन डीजी कुलदीप सिंह पर अदालत के आदेशों का पालन न करने के चलते 20 हजार रुपये जुर्माना लगाया था। वह मामला भी मेडिकल एवं एग्जीक्यूटिव कैडर से जुड़ा था।
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हाई कोर्ट ने 'स्पीकिंग ऑर्डर' जारी करने का आदेश दिया था
सीआरपीएफ के एग्जीक्यूटिव कैडर से सम्बंधित एक अधिकारी द्वारा किए गए केस में हाईकोर्ट ने डीजी को आदेश दिया था कि वे इस बाबत विस्तृत आदेश 'स्पीकिंग ऑर्डर' निकालें। डीजी ने इस मामले में कोई आदेश नहीं निकाला। इस केस में सीआरपीएफ के मेडिकल कैडर को लेकर कई सारी बातें कही गई थीं। एग्जीक्यूटिव कैडर के अफसरों का कहना था कि डॉक्टरों को टाइम बाउंड रैंक नहीं मिलना चाहिए। उन्हें वेतन मिल रहा है, वह मिलता रहे। केंद्रीय गृह मंत्रालय के आदेश से बल के डॉक्टरों को अब रैंक और बैज भी मिलने लगा। यह उनके साथ भेदभाव है। नियमानुसार, इस तरह के मामले में यूपीएससी और डीओपीटी से सलाह लेकर ही कोई आदेश जारी किया जा सकता है। सीआरपीएफ मुख्यालय ने केवल गृह मंत्रालय के आदेश पर डॉक्टरों को बैज और रैंक देना शुरू कर दिया। याचिकाकर्ता के मुताबिक, ये प्रक्रिया ठीक नहीं है। इस तरीके से डॉक्टर, प्रमोशन के मामले में एग्जीक्यूटिव कैडर से काफी आगे निकल गए, जबकि वे केवल मौखिक साक्षात्कार देकर बल में आते हैं।
कमांडेंट तक पहुंचने में लगेंगे 25 साल
एग्जीक्यूटिव कैडर के अधिकारी बताते हैं कि वे तरक्की के मोर्चे पर पिछड़ते जा रहे हैं। कैडर समीक्षा प्रक्रिया को लेकर 'केंद्रीय गृह मंत्रालय और बल मुख्यालय' गंभीर नहीं हैं। 'सहायक कमांडेंट, डिप्टी कमांडेंट और सेकंड इन कमांड', इन तीन पदों पर प्रमोशन लेना मुश्किल हो गया है। सहायक कमांडेंट को पहली पदोन्नति मिलने में 13-15 साल से ज्यादा समय लग रहा है। अगर यूं ही चलता रहा तो उन्हें कमांडेंट तक पहुंचने में 25 साल लग जाएंगे। मतलब रिटायरमेंट की दहलीज पर जाकर, उन्हें बटालियन को कमांड करने का मौका मिल सकेगा। अधिकारियों का तर्क है कि वे बल की तरफ से हर छोटा बड़ा जोखिम उठाते हैं। सभी तरह के ऑपरेशन को लीड करते हैं। यूपीएससी से नियुक्ति मिलने के बावजूद प्रमोशन में वे पिछड़ जाते हैं।