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CJI Gavai: 'धारा 370 हटाने का फैसला स्वीकार किया ताकि देश में एक संविधान रहे', नागपुर में बोले सीजेआई गवई

Sat, 28 Jun 2025 02:47 PM IST
बशु जैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नागपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नागपुर Published by: बशु जैन Updated Sat, 28 Jun 2025 02:47 PM IST
सार

नागपुर में एक कार्यक्रम के दौरान मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ने संविधान के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि संविधान के केंद्रीकृत होने को लेकर बाबा साहब आंबेडकर की खूब आलोचना की गई थी। आज हम अपनी 75 साल की यात्रा में देख रहे हैं कि जब भी भारत ने किसी संकट का सामना किया है, तो देश एकजुट रहा है। यह संविधान से ही संभव हुआ है। 

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CJI Gavai said- Accepted the decision to remove Article 370 so that there is a Constitution in country
सीजेआई बीआर गवई। - फोटो : ANI/वीडियो ग्रैब

विस्तार

नागपुर में देश के मुख्य न्यायाधीश ने जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने के फैसले को लेकर बड़ा दावा किया। उन्होंने कहा कि देश को एकजुट रखने के एक ही संविधान की जरूरत है। हमने संसद द्वारा लिए गए धारा 370 को हटाने के फैसले को सर्वसम्मति से स्वीकार किया, ताकि देश में एक ही संविधान चले। देश के एक राज्य में अलग संविधान बाबा साहब आंबेडकर की विचारधारा के अनुरूप नहीं था।
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  उन्होंने कहा कि संविधान के केंद्रीकृत होने को लेकर बाबा साहब आंबेडकर की खूब आलोचना की गई थी। बाबा साहब ने उस आलोचना का जवाब देते हुए कहा था कि हम देश को सभी चुनौतियों के लिए उपयुक्त संविधान दे रहे हैं और मैं आपको आश्वस्त कर सकता हूं कि यह युद्ध और शांति के समय में देश को एकजुट रखेगा। आज हम अपनी 75 साल की यात्रा में देख रहे हैं कि हमारे आसपास क्या स्थिति है? जब भी भारत ने किसी संकट का सामना किया है, तो देश एकजुट रहा है। यह संविधान से ही संभव हुआ है। 
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इससे पहले मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ने कहा कि संविधान ने सरकार के तीन अंगों विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की सीमाएं तय की हैं। कानून बनाना विधायिका और राज्य विधानसभाओं की जिम्मेदारी है, जबकि कार्यपालिका संविधान और कानून के ढांचे के भीतर काम करती है। उन्होंने कहा कि संविधान और नागरिकों के अधिकारों को बनाए रखने के लिए आवश्यक है। 

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सीजेआई ने कहा कि अगर न्यायपालिका हर मामले में कार्यपालिका और विधायिका के क्षेत्रों में हस्तक्षेप करने की कोशिश करती है, तो मैं हमेशा कहता हूं हालांकि न्यायिक सक्रियता बनी रहेगी, लेकिन इसे न्यायिक दुस्साहस और न्यायिक आतंकवाद में बदलने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि जब कोई कानून संसद या राज्य विधानसभा के अधिकार से परे बनाया जाता है और यह सांविधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन करता है, तो न्यायपालिका के लिए हस्तक्षेप करना अनिवार्य है।


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