फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   China increased its security forces in pakistan in name of CPEC Project security amid Taliban, planning to build military base in gwadar

तालिबान से घबराया ड्रैगन: पाकिस्तान में चीन ने तैनात की अपनी टॉप सुरक्षा एजेंसियां, इस्लामाबाद में हो रहा विरोध

Thu, 26 Aug 2021 03:51 PM IST
Ashish Tiwari आशीष तिवारी
Updated Thu, 26 Aug 2021 03:51 PM IST
सार

अफगानिस्तान में तालिबानियों के सत्ता पर काबिज होने के बाद चीन ने पाकिस्तान में अपने सुरक्षाकर्मियों की संख्या बढ़ा दी है। पाकिस्तान की जमीन से चीन भारत पर नजर रखने की कोशिश कर रहा है...

विज्ञापन
China increased its security forces in pakistan in name of CPEC Project security amid Taliban, planning to build military base in gwadar
चीनी कर्मचारी - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

पाकिस्तान की जमीन पर चीनी सुरक्षा कर्मियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। यह संख्या अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता पर काबिज होने के बाद और बढ़ी है। पाकिस्तान में चीनी सुरक्षा कर्मियों और सेना के जवानों समेत अधिकारियों की बढ़ रही तैनाती को सामान्य नजरिए से नहीं देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि एक विशेष प्रोजेक्ट की सुरक्षा के नाम पर चीन ने जिस तरीके से पाकिस्तान में अपनी टॉप सिक्योरिटी एजेंसी को लगा रखा है, वह सुरक्षा के नाम पर न सिर्फ भारत की जासूसी करना चाहता है बल्कि पाकिस्तान से जुड़ने वाले समुद्री तटों से अपनी ताकत भी बढ़ाना चाह रहा है। चीन की इस खतरनाक चाल का पाकिस्तान में विरोध चल रहा है। पाकिस्तान के एक धड़े ने खुद को गुलामी की ओर ले जाने की बातें भी शुरू कर दी हैं।

विज्ञापन


दरअसल पाकिस्तान में बनने वाले चीन और पाकिस्तान के ड्रीम प्रोजेक्ट 'चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर' (सीपीईसी) को तैयार करने में लगे अधिकारी और इंजीनियरों की सुरक्षा के नाम पर चीन सरकार ने अपने देश की सर्वोच्च सुरक्षा एजेंसियों और सेना के सुरक्षा कर्मियों को पाकिस्तान में तैनात कर दिया है।
विज्ञापन


विज्ञापन
विज्ञापन


अफगानिस्तान में तालिबानियों के काबिज होने के बाद सबसे ज्यादा खलबली अगर कहीं मची हुई है तो चीन और पाकिस्तान में है। क्योंकि पाकिस्तान के जिस बलूचिस्तान प्रांत के ग्वादर बंदरगाह से सीपीईसी को तैयार किया जा रहा है, वहां पर न सिर्फ इस प्रोजेक्ट बल्कि चीन का भी खूब विरोध हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार प्रोफेसर जेएस शर्मा कहते हैं कि कुछ समय पहले चीन के इंजीनियर और अधिकारियों पर बलूचिस्तान में हमला हुआ था। कहने को तो पाकिस्तानी सेना से लेकर स्थानीय सुरक्षा एजेंसियों और पुलिस भी चीन के अधिकारियों और इंजीनियर की सुरक्षा में लगी हुई थी। लेकिन एक समझौते के तहत चीन ने इस प्रोजेक्ट में शामिल सभी लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी उठाते हुए अपनी टॉप सिक्योरिटी एजेंसी से जुड़े सुरक्षाकर्मियों को पाकिस्तान में तैनात कर दिया है। बवाल इसी के बाद से मचना शुरू हुआ। पाकिस्तान में सीनेट की स्थाई समिति के अध्यक्ष ताहिर मशहदी ने पाकिस्तान सरकार को घेरते हुए इस बात की चिंता जताई थी कि अगर चीन इसी तरीके से अपने सुरक्षाकर्मियों को पाकिस्तान में तैनात करता रहेगा, तो एक दिन चीन पाकिस्तान पर न सिर्फ कब्जा कर लेगा, बल्कि पाकिस्तान आर्थिक बोझ के नीचे भी दबकर खत्म हो जाएगा।

खुफिया सूत्रों के मुताबिक 15 अगस्त के बाद से अफगानिस्तान में हुए तख्तापलट के बाद चीन ने अपनी रणनीति बदल दी। सूत्रों के मुताबिक तालिबानियों के सत्ता पर काबिज होने के बाद इसी का सहारा लेकर चीन ने पाकिस्तान में अपनी और सुरक्षा एजेंसियों की कई टुकड़ियां को तैनात करना शुरू कर दिया। क्योंकि यह प्रोजेक्ट बलूचिस्तान से शुरू होकर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर, गिलगित बालटिस्तान होते हुए चीन के उत्तरी पश्चिम शिंजियांग तक जा रहा है। क्योंकि पाकिस्तान के जिन राज्यों से होकर इस कॉरिडोर को निकलना है उसमें अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज हुए तालिबानियों का बहुत दखल है।

सूत्रों का कहना है चीन ने इसी का आधार बनाते हुए सुरक्षा कर्मियों की संख्या को इस पूरे प्रोजेक्ट में बढ़ा दिया है। सिर्फ पाकिस्तान में ही नहीं बल्कि यह प्रोजेक्ट अफगानिस्तान के एक इलाके से होते हुए चीन के उत्तर पश्चिमी राज्य शिंजियांग तक जा रहा है जहां पर पहले से ही तालिबानियों के मददगार उईगुर मुस्लिम समुदाय के हजारों लोग रहते हैं। चीन का इस समुदाय से छत्तीस का आंकड़ा है और उसे इस बात का डर भी बना हुआ है कि कहीं इस पूरे इकोनामिक कॉरिडोर को तहस-नहस करने के लिए तालिबानी अपना पूरा जाल ना बिछा दें।

पाकिस्तान समेत एशिया के कई मुस्लिम देशों में खुफिया सेवाओं में काम कर चुके एक पूर्व वरिष्ठ राजनयिक का कहना है कि दरअसल चीन, पाकिस्तान की धरती को अपने निजी स्वार्थ और खुफिया मामलों के लिए इस्तेमाल करना चाह रहा है। पाकिस्तान की बिगड़ी हुई आर्थिक दशा और कमजोर सैन्य शक्तियों के चलते उसके पास इस वक्त चीन के सामने घुटने टेकने के अलावा कोई दूसरा रास्ता भी नहीं बचा है। क्योंकि पाकिस्तान इस प्रोजेक्ट के माध्यम से चीन से कई तरीके के समझौते कर चुका है। जिसमें सैन्य समझौतों से लेकर आर्थिक समझौते भी शामिल हैं।

इस पूरे मामले को बहुत करीब से समझने वाले खुफिया विभाग के पूर्व अधिकारियों का कहना है कि बलूचिस्तान के ग्वादर से शुरू होने वाले सीपीईसी प्रोजेक्ट की लंबाई तकरीबन ढाई हजार किलोमीटर की है। चीन ने पाकिस्तान को सौर ऊर्जा समेत दूसरे इंफ्रास्ट्रक्चर को डेवलप करने के नाम पर अपने साथ जोड़ा है। क्योंकि पाकिस्तान के पास अपने आर्थिक संकट को दूर करने के लिए चीन के सामने घुटने टेकने के सिवा दूसरा कोई चारा नहीं बचता है। इसलिए उसने इस कॉरिडोर के नाम पर पाकिस्तान के ज्यादातर राज्यों को चीन की सुरक्षा एजेंसियों के हवाले कर दिया है। चीन ने इस प्रोजेक्ट के नाम पर पाकिस्तान को नौ पनडुब्बी देने का न सिर्फ सौदा किया है बल्कि इस कॉरिडोर के माध्यम से व्यावसायिक गतिविधियों को बढ़ाने के लिए अन्य देशों से भी पाकिस्तान के संबंध बेहतर करने का वादा भी किया है।

अब चीन और पाकिस्तान को तालिबानियों से डर लग रहा है। जानकारों का कहना है कि चीन और पाकिस्तान मिलकर जिन राज्यों से इस इकोनामिक कॉरिडोर को निकाल रहे हैं उनमें ज्यादातर राज्यों के लोग पाकिस्तान और चीन से नफरत करते हैं। लगातार इन राज्यों के लोगों की मांग को लेकर तालिबानी कमांडर न सिर्फ पाकिस्तान को निशाने पर लेते रहे हैं बल्कि अफगानिस्तान में सत्ता बदलने के बाद इन राज्यों के आतंकी संगठनों के साथ खुलकर सामने भी आने लगे हैं। ऐसे में लगभग 50 बिलियन डॉलर के इस प्रोजेक्ट पर संकट तो खड़ा हो गया है, लेकिन इस संकट में भी चीन ने अपनी नई चाल चली शुरू कर दी है। यह चाल पाकिस्तान में अपनी सुरक्षा एजेंसियों के ज्यादा से ज्यादा लोगों की संख्या में तैनाती की है।  

विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी कीमत पर चीन इस प्रोजेक्ट को पूरा करना चाह रहा है। इस प्रोजेक्ट के लिए वह तालिबानियों से हाथ भी मिलाने को तैयार है। दरअसल चीन के लिए सीपीईसी प्रोजेक्ट आर्थिक दृष्टिकोण से बहुत फायदेमंद सौदा है। इसके अलावा सैन्य दृष्टिकोण से भी चीन को यह कॉरिडोर बहुत फायदेमंद लग रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अभी चीन को हिंद महासागर होते हुए अपने देश पहुंचने के लिए 12 हजार किलोमीटर लंबे रास्ते का चयन करना पड़ता है। जबकि इस कॉरिडोर के बन जाने से उसकी हिंद महासागर से सीधे नौ हजार किलोमीटर की न सिर्फ दूरी कम हो जाएगी, बल्कि हिंद महासागर तक उसकी पहुंच भी बहुत आसान हो जाएगी। विशेषज्ञों का कहना है अगर चीन की पहुंच हिन्द महासागर तक सीधे हो गई तो वह कई देशों के लिए चुनौती के तौर पर सामने खड़ा हो जाएगा। इसलिए चीन इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए हर कीमत अदा करने को तैयार है। तालिबानियों के सत्ता पर काबिज होने के बाद जिस तरीके से उनका संवाद बलूचिस्तान के तमाम आतंकी संगठनों से होना शुरू हुआ उससे चीन की चिंता तो बढ़ गयी है। इसीलिए उसने इस बहाने से अपनी सुरक्षा एजेंसियों को पाकिस्तान में ज्यादा से ज्यादा तैनात करना शुरू कर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है चीन का पाकिस्तान की जमीन पर इतने ज्यादा दखल से पड़ोसी मुल्कों को बहुत ज्यादा सजग रहना होगा।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed