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बच्चों की दवा का कोरोना संक्रमण पर दिख रहा असर, शरीर में जाने पर साइटोकाइन स्टॉर्म को पूरी तरह रोक देती है

Wed, 03 Jun 2020 05:23 PM IST
Rajeev Rai वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Rajeev Rai Updated Wed, 03 Jun 2020 05:23 PM IST
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Children's drug has visible effect on Covid-19 infection, completely inhibits cytokine storm on entering the body
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : PTI

इम्यून डिजीज से पीड़ित बच्चों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवा रुक सॉलिट्यूड रुक सॉलिड नीम का सकारात्मक असर कोरोना के मरीजों पर देखने को मिला है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस दवा से होमोफैगोसाइकोटिक लिंफोहिस्टीयोसाइटोसिस (एचएलएच) का इलाज होता है। एचएलएच गंभीर इन्फ्लेमेंट्री सिंड्रोम है जो युवाओं में होता है। इस रोग में शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता अत्यधिक सक्रिय हो जाती है जिससे स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

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सिनसिनाटी अस्पताल के वैज्ञानिकों का अध्ययन
अमेरिका के सिनसिनाटी चिल्ड्रेन अस्पताल के वैज्ञानिकों का कहना है कि इस दवा के प्रयोग से देखा गया है कि जिन मरीजों को यह दवा दी गई है उनमें सांस संबंधी तकलीफों में 10 गुना अधिक सुधार देखा गया है। उन मरीजों की तुलना में जीने प्लेसीबो दिया गया। वैज्ञानिकों का कहना है कि जिन्हें यह दवा नहीं दी गई। उनमें से 14 फीसदी मरीजों की मौत भी रिपोर्ट की गई। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह दवा साइटोंकाइन स्टॉर्म को रोकती है। स्टॉर्म के कारण शरीर वायरस से लड़ नहीं पाता है और स्वस्थ कोशिकाओं पर हमला बोलकर उन्हें नुकसान पहुंचाता है। इस दवा से कुछ कैंसर कोशिकाओं को भी मारने में मदद मिली है।
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14 दिन के भीतर 90 फीसदी में सुधार
जर्नल ऑफ एलर्जी एंड क्लिनिकल इम्यूनोलॉजी में प्रकाशित शोध में कैंसर पैथोलॉजिस्ट डॉ. गैंग हुआंग ने बताया कि इस दवा से कोरोना के इलाज में संभावना है। शोध में 9 फरवरी से 28 फरवरी के बीच भर्ती हुए। 43 मरीजों पर दवा के असर को जांचा गया। सभी मरीज वुहान में थे, जहां से वायरस पूरी दुनिया में फैला है। वैज्ञानिकों का दावा है कि जिन मरीजों को यह दवा दी गई है, उनमें से 90 फीसदी की हालत में 14 दिन के भीतर सुधार देखा गया और इसकी पुष्टि सीटी स्कैन रिपोर्ट से हुई है।
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आधे से अधिक संक्रमित मरीजों में लक्षण ही नहीं
अमेरिकी संस्था सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रीवेंशन (सीडीसी) ने कहा था कि कोरोना संक्रमित 35 फीसदी मरीजों में लक्षण नहीं दिखता है। उधर वुहान के वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि कोरोना संक्रमित आधे लोगों में लक्षण नहीं दिखता है। वैज्ञानिकों के अनुसार 40 फीसदी मरीजों को खासी, बुखार और सांस संबंधी तकलीफ भी नहीं होती है। यही कारण है कि वायरस का प्रसार दुनियाभर में तेजी से हुआ और अधिकतर लोग क्रमित हुए। वह इस बात से अनजान होकर दूसरों को भी संक्रमित करते रहे। अध्ययन में पता चला है कि वायरस से सबसे अधिक नुकसान युवाओं और महिलाओं को हुआ है।


सिर्फ 45 फीसदी मरीजों में खांसी और बुखार
वुहान के झोगनान अस्पताल के शोधकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने 78 मरीजों पर अध्ययन किया। उसमें पाया गया कि 45 मरीजों को सूखी खांसी, बुखार, थकान और सांस लेने की तकलीफ थी। 33 मरीज यानी 42 फीसदी से अधिक में कोई भी लक्षण नहीं था। खास बात यह है कि ऐसे मरीजों की उम्र 20 से 40 वर्ष के बीच थी। लक्षण वाले मरीजों में अधिकतर की उम्र 30 से 60 वर्ष के बीच थी।

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