बच्चों को झेलना पड़ सकता है कोरोना का सबसे गंभीर संकट, बाल मजदूरी में हो सकती है बढ़ोतरी
- यूनिसेफ का अनुमान, गरीबी बढ़ने के कारण बाल मजदूरी में हो सकती है बढ़ोतरी
- अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने कहा, बच्चों का भविष्य बचाने के लिए विशेष सामाजिक सुरक्षा की दरकार
- भारत ने 2025 तक देश से बाल मजदूरी के पूर्ण उन्मूलन का रखा है लक्ष्य
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कोरोना संक्रमण की दर कम रखने के लिए दुनिया के अनेक देशों ने अपने यहां लॉकडाउन लगाया। इस दौरान व्यापारिक गतिविधियां, कल-कारखाने बंद रहे। इससे करोड़ों लोगों को बेरोजगार होना पड़ा और उनके परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया।
यूनिसेफ का अनुमान है कि इन परिस्थितियों के कारण दुनियाभर में बाल मजदूरी में बढ़ोतरी हो सकती है। गरीबी से त्रस्त परिवार बच्चों को खतरनाक औद्योगिक गतिविधयों में भी काम करने को भेज सकते हैं।
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन का अनुमान है कि वर्ष 2016 में पांच वर्ष से 17 वर्ष की आयु के 15.2 करोड़ बच्चों को बाल मजदूरी करनी पड़ रही थी। इनमें पांच वर्ष से 14 वर्ष आयु के बाल मजदूरों की संख्या 11.4 करोड़ थी।
यह संख्या कुल बाल मजदूरों की संख्या की 75 फीसदी थी। कुल 7.3 करोड़ बच्चे खतरनाक प्रकृति के उद्योगों में काम कर रहे थे, जहां उनके शारीरिक और मानसिक विकास पर बेहद प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा था।
संगठन के सेक्रेटरी जनरल गाय रायडर ने कहा है कि ऐसे दौर में बच्चों को सामाजिक संरक्षण की विशेष आवश्यकता है। ऐसा न हो पाने पर उनके संपूर्ण विकास पर गहरी नकारात्मक चोट पहुंच सकती है।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग से दुनिया में बाल श्रम को नब्बे के दशक के अंत में 26 करोड़ से घटाकर अब 15.2 करोड़ तक लाने में सफलता मिली है, लेकिन कोरोना काल के कारण उपजी विकट परिस्थितियों में इसमें फिर बढ़ोतरी की आशंका पैदा हो गई है।
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन, यूनिसेफ और अन्य संगठनों के प्रयास के कारण 2012 से 2016 के दौरान खतरनाक क्षेत्रों में बच्चों को लगाए जाने के मामलों में कमी आई, लेकिन इस मामले में दुखद बात यह थी कि पांच से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के खतरनाक उद्योगों में काम करने के मामले में केवल सात फीसदी की कमी आई थी।
अनुमान लगाया जाता है कि ये वर्ग अपेक्षाकृत गरीब अफ्रीकी और एशियाई देशों से ज्यादा जुड़ा हुआ हो सकता है।
यूनिसेफ का अनुमान है कि किसी देश की गरीबी में अगर एक फीसदी की बढ़ोतरी होती है, तो इससे बालश्रम के मामलों में 0.7 फीसदी की बढ़ोतरी होने की आशंका बढ़ जाती है। कोरोना काल में गरीब देशों में इसका व्यापक नकारात्मक असर देखने को मिल सकता है।
कोरोना काल के दौरान बच्चों की शैक्षिक गतिविधियां पूरी तरह से ठप पड़ी हुई हैं। अनुमान है कि दुनिया के लगभग 100 करोड़ बच्चों को इसका नुकसान उठाना पड़ा है।
अगर शैक्षिक गतिविधियों को ठप रखने की समस्या लंबी खिंचती है तो इससे बच्चों के विकास पर गहरा नकारात्मक असर देखने को मिल सकता है।
भारत में बाल मजदूरों की स्थिति और उन पर कार्रवाई
वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में एक करोड़ से अधिक बाल श्रमिक विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे थे। आज भी अकेले बिहार में 10.88 लाख बाल श्रमिक विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे हैं।
यह संख्या भारत के कुल बाल श्रमिकों की लगभग 10.7 फीसदी है।
भारत ने वर्ष 2025 तक देश से बाल श्रम मजदूरी को समूल नष्ट करने की प्रतिबद्धता जाहिर कर रखी है।
अनुमान है कि उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश जैसे अपेक्षाकृत ज्यादा पिछड़े राज्यों में कोरोना काल में गरीबी बढ़ सकती है।
औद्योगिक गतिविधयों के धीमेपन का असर लोगों की रोजी-रोटी पर पड़ सकता है। इससे इन राज्यों के गरीब लोग अपने बच्चों को बाल मजदूरी के लिए भेजने पर मजबूर हो सकते हैं।
बचपन बचाओ आंदोलन के प्रमुख कार्यकर्ता राकेश सेंगर ने अमर उजाला को बताया कि अनुमान है कि कोरोना के बाद के परिणामों में लोग अपने बच्चों को अनैतिक गतिविधियों में धकेलने को भी मजबूर हो सकते हैं।
अगर केंद्र और राज्य सरकारें अपने यहां गरीबी रोकने, परिवारों को खाद्यान्न सुरक्षा देने और बेरोजगार हुए लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने में सफल नहीं हो पाईं, तो बच्चों को इसका सीधा दुष्परिणाम झेलना पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने मांगा है जवाब
बचपन बचाओ आंदोलन की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों के हितों के लिए उठाए जा रहे कदमों की जानकारी मांगी है। केंद्र को जानकारी उपलब्ध कराने के लिए दो हफ्ते का समय दिया गया है।
संगठन ने अपनी याचिका में इस बात की आशंका जाहिर की है कि कोरोना काल के बाद बच्चों को न सिर्फ मजदूरी में धकेला जा सकता है, बल्कि उन्हें वेश्यावृत्ति जैसे घोर अनैतिक पेशे में जाने को भी मजबूर किया जा सकता है।
इस दौरान बाल तस्करी और बाल विवाह की घटनाओं के बढ़ने की भी आशंका व्यक्त की गई है।
बाल श्रम कानूनों में इतनों पर हुई कार्रवाई
एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2016 में बाल श्रम विरोधी कानून (CLPRA) के तहत 204 मामले दर्ज किए गये थे। इसी प्रकार 2017 में 462 और 2018 में 464 लोगों पर कार्रवाई हुई थी।
इन मामलों में न्यूनतम 1879 बच्चों को बाल मजदूरी से मुक्त भी कराया गया था।
यूपी ने उठाए कदम
शुक्रवार को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश के दो हजार बच्चों के लिए विशेष छात्रवृत्ति योजना का आरंभ किया। इसके तहत बच्चों को आठवीं, नवीं और दसवीं की परीक्षा पास करने पर एक हजार रुपये मासिक सहायता राशि दी जाएगी।
इसके आलावा कक्षाओं में उत्तीर्ण होने पर उन्हें छह हजार रुपये की अतिरिक्त सहायता दी जाएगी। मुख्यमंत्री ने उम्मीद जताई है कि प्रदेश से जल्दी ही बाल श्रम को मुक्त करा लिया जायेगा।
विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों के भविष्य को बचाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक पैमाने पर इस तरह के कदम उठाये जाने की आवश्यकता है।