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चमोली त्रासदीः खतरा अभी टला नहीं, चुनौती से कम नहीं हैं ये विचित्र झीलें, पढ़िये ये खास रिपोर्ट
Thu, 11 Feb 2021 04:18 PM IST
Harendra Chaudhary
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Harendra Chaudhary
Updated Thu, 11 Feb 2021 04:18 PM IST
सार
रिपोर्ट बताती है कि ग्लेशियर के अपनी जगह से हटने के बाद यह तबाही मची है। उस पूरे इलाके का हवाई सर्वेक्षण किया गया है। उसमें पता चला है कि पहाड़ियों में कई नई वॉटर बॉडी स्थापित हो गई हैं...
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उत्तराखंड त्रासदी
- फोटो : ITBP
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विस्तार
उत्तराखंड के चमोली में ग्लेशियर टूटने के बाद वहां के चप्पे-चप्पे पर वैज्ञानिकों की नजर है। हालांकि अब सामने आ रहा है कि ग्लेशियर के नीचे मौजूद चट्टान खिसकने के कारण वहां एक बड़ी झील बन गई थी। राहत एवं बचाव कार्यों के अलावा कई तरह के आंकड़े एकत्रित कर रही विभिन्न एजेंसियों ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को जो ताजा रिपोर्ट भेजी है, उसमें चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। इसमें बताया गया है कि चमोली और उसके आसपास के ऊपरी क्षेत्र में खतरा अभी टला नहीं है। वहां पर कई विचित्र झीलें बन गई हैं।
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चूंकि ये झीलें ग्लेशियर या उसके नीचे की चट्टान टूटने के बाद अस्तित्व में आई हैं, इसलिए इनके बारे में किसी को कोई सटीक जानकारी भी नहीं है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट के प्रोग्राम डायरेक्टर ‘क्लाइमेट चेंज’ सम्राट सेन गुप्ता के मुताबिक, चुनौती अभी सामने है। इन झीलों का अध्ययन कर यह पता लगाया जाएगा कि उनकी क्षमता कैसी है। उनके किनारे मजबूत हैं या नहीं। भारी बरसात या बर्फबारी हो जाए तो क्या वे झीलें वह दबाव सह पाएंगी। कहीं ऐसा तो नहीं होगा कि बरसात में उनके किनारे टूट जाएं और वे बाढ़ के रूप में तबाही मचा दें। सुरक्षा एजेंसियों की रिपोर्ट में कहा गया है कि चमोली में अब जितनी भी नई झीलें बनी हैं, उनका सिलसिलेवार अध्ययन बहुत जरूरी है। कई दूसरे एक्सपर्ट भी उस इलाके का दौरा कर रहे हैं।
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बता दें कि चमोली या बाकी दूसरे इलाके, जहां ग्लेश्यिर मौजूद हैं, वे सभी हिमालय की युवा श्रेणी में आते हैं। यानी अभी इनका विकास हो रहा है। इनका मौजूदा आकार या आकृति भविष्य में कैसा रूप लेती है, इसे लेकर अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। यह लगातार अध्ययन का विषय है। आईटीबीपी के प्रवक्ता विवेक पांडे बताते हैं, बुधवार को चमोली में बड़ा हवाई सर्वेक्षण किया गया था। इसमें वैज्ञानिक और राहत एवं बचाव दलों के अधिकारी भी मौजूद थे।
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उनकी रिपोर्ट बताती है कि ग्लेशियर के अपनी जगह से हटने के बाद यह तबाही मची है। उस पूरे इलाके का हवाई सर्वेक्षण किया गया है। उसमें पता चला है कि पहाड़ियों में कई नई वॉटर बॉडी स्थापित हो गई हैं। इसे चिंता का विषय भी कहा जा सकता है। इनका अध्ययन बहुत जरूरी है। सभी एजेंसियां अपने तरीके से जानकारी जुटा रही हैं। नई वाटर बॉडी को लेकर अभी किसी को ज्यादा कुछ मालूम नहीं है। जो रिपोर्ट मिल रही है, उसमें अभी खतरे की कोई बात नहीं है, लेकिन वाटर बॉडी को लेकर ज्यादा से ज्यादा सूचनाएं जुटानी होंगी।
विवेक पांडे ने बताया, हमारी टीम ने पूरे इलाके की हवाई रेकी की है। उसी आधार पर वैज्ञानिकों से आग्रह किया है कि जल भराव वाली जगहों का विश्लेषण कर लें। पहाड़ पर कहीं ज्यादा दबाव के साथ पानी एकत्रित न हो, इस बारे में सावधानी बरतने की आवश्यकता है। एनडीआरएफ और राज्य सरकार की एजेंसियों के साथ भी यह जानकारी शेयर की गई है।