220 साल पुराने आयुध कारखानों की कहानी: इन्हें कंपनी बनाने से इतने खुश क्यों हो रहे हैं विदेशी हथियार निर्माता
अखिल भारतीय रक्षा कर्मचारी महासंघ के महासचिव सी. श्रीकुमार ने बताया, सरकार की लंबे समय से इन कारखानों पर नजर थी। आज सरकार के इस फैसले से प्राइवेट कंपनियां और विदेशी हथियार निर्माता बहुत खुश हैं। वजह, ये कंपनियां, 41 आयुध कारखानों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पा रही थीं...
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केंद्रीय कैबिनेट की 16 जून को हुई बैठक में एक झटके से भारतीय रक्षा का चौथा बाजू कहे जाने वाले 220 साल पुराने आयुध कारखानों को सात कंपनियों में विभाजित कर दिया गया। ये वही कारखाने हैं, जिन्होंने भारतीय सेना को पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध, बांग्लादेश लिब्रेशन वॉर, करगिल की लड़ाई और लद्दाख जैसी झड़पों में साजो-सामान सप्लाई किया था। अखिल भारतीय रक्षा कर्मचारी महासंघ के महासचिव सी. श्रीकुमार ने बताया, सरकार की लंबे समय से इन कारखानों पर नजर थी। आज सरकार के इस फैसले से प्राइवेट कंपनियां और विदेशी हथियार निर्माता बहुत खुश हैं। वजह, ये कंपनियां, 41 आयुध कारखानों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पा रही थीं। सरकार का यह कदम इंडियन डिफेंस के रणनीतिक कौशल और प्रबंधन के साथ खिलवाड़ है। बतौर श्रीकुमार, भारतीय सेना के साजो-सामान की तैयारियों की दिशा में केंद्र सरकार का यह फैसला एक भ्रामक कदम साबित होगा। सेना के चार लाख सिविल कर्मी और आयुध कारखानों में काम करने वाले 70 हजार कर्मचारी 19 जून को काले बिल्ले लगाकर केंद्र सरकार का पुतला फूकेंगे। रविवार को एआईडीईएफ, आईएनडीडब्लूएफ और बीपीएमएस जैसे कर्मचारी संगठनों की बैठक हो रही है। इस बैठक में आयुध कारखानों में अनिश्चिकालीन हड़ताल करने का अहम निर्णय लिया जा सकता है।
केंद्र सरकार ने इसे सुधार प्रक्रिया का नाम दिया है
आयुध कारखानों को कंपनी में तब्दील करने के निर्णय को केंद्र ने एक सुधारात्मक कदम बताया है। करीब दो दशकों से यह प्रस्ताव लंबित था। अब आयुध कारखाना बोर्ड के पुनर्गठन को मंजूरी दे दी गई है। इसका उद्देश्य आयुध कारखानों की क्षमता बढ़ाने के साथ ही उन्हें प्रतिस्पर्द्धा के लिए तैयार करना है। बोर्ड के तहत संचालित हथियार और असलहा तैयार करने वाली 41 आयुध फैक्टरियों को आपस में विलय कर उन्हें सात कंपनियों में विभाजित कर दिया गया है। केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस निर्णय को एतिहासिक करार दिया है। इन आयुध कारखानों में कार्यरत 70,000 कर्मचारियों की सेवा शर्तों में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। यह निर्णय देश के रक्षा उत्पादन में बढ़ोतरी के मकसद से लिया गया है। इससे देश की रक्षा जरूरतों को पूरा किया जा सकेगा। सभी सात कंपनियां रक्षा क्षेत्र के अन्य उपक्रमों की तरह ही होंगी। उनका संचालन पेशेवर प्रबंधन द्वारा किया जाएगा। सुधार की यह पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्म निर्भर भारत दृष्टिकोण के तहत की जा रही है।
केंद्र ने कोरोना की आड़ में इन कारखानों की बर्बादी के दस्तावेज तैयार किए
एआईडीईएफ के महासचिव श्रीकुमार बताते हैं, केंद्र सरकार ने कोरोनाकाल की आड़ में 220 साल पुराने कारखानों को सात कॉरपोरेशन में तब्दील कर दिया है। यह नासमझी भरा कदम है। इससे सेना के रणनीति कौशल और प्रबंधन पर विपरित असर पड़ेगा। जब पूरा देश कोरोना से लड़ रहा था तो केंद्र सरकार इन कारखानों को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी कर रही थी। अभी सेना के सारे उपकरण एक छत के नीचे मिल जाते थे। अब भारतीय रक्षा के लिए अलग-अलग कंपनियों से संपर्क करना होगा। प्राइवेट कंपनियों और हथियार बनाने वाले विदेशी निर्माताओं का सपना पूरा हो गया है। सरकार उन्हें लाभ पहुंचाना चाहती थी। केंद्र ने कोविड रिलीफ पैकेज के नाम पर कारखानों को निगमों में तबदील कर दिया। देश की विरासत को प्राइवेट हाथों में सौंपने की तैयारी हो गई है। इस फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार के सभी कर्मचारी संगठनों और राजनीतिक दलों से समर्थन मांगा जाएगा।
आयुध कारखानों की जमीन को कोड़ियों के भाव बेचने की तैयारी!
एआईडीईएफ के अध्यक्ष एसएन पाठक, महासचिव श्रीकुमार, आईएनडीडब्लूएफ के अध्यक्ष अशोक सिंह व महासचिव आर श्रीनिवासन और बीपीएमएस के उपाध्यक्ष साधु सिंह व महासचिव मुकेश सिंह के अनुसार, सरकार ने आयुध निर्माणियों की जमीन को कोड़ियों के भाव बेचने की तैयारी कर ली थी। आखिर ऐसी क्या मजबूरी आ गई है कि केंद्र सरकार को रक्षा मंत्रालय की जमीन और आयुध फैक्ट्रियां, कोड़ियों के दाम पर बेचने के लिए प्रपोजल तैयार करने पर मजबूर होना पड़ा। पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर इस तरह के सौदे के खिलाफ थे। इन कारखानों की जमीन दो लाख करोड़ रुपये की है। सरकार अपने चहेते उद्योगपतियों को 62 हजार एकड़ जमीन कोड़ियों के भाव दिलाने के लिए इसकी कीमत 72 हजार करोड़ रुपये लगवा रही थी। एआईडीईएफ के महासचिव सी. श्रीकुमार बताते हैं, सरकार ने भारतीय आयुध कारखानों को बेचने की योजना बनाई है। बहुत से कारखाने ऐसे हैं, जिसके लिए किसानों और आदिवासियों ने अपनी जमीन दी है। आयुध निर्माणी को कंपनी में तब्दील करना सरासर गलत है। रक्षा क्षेत्र पर इसके विपरीत परिणाम देखने को मिलेंगे।
केंद्र सरकार की नजर पहले से ही ठीक नहीं थी...
श्रीकुमार के मुताबिक, आयुध निर्माणी कारखानों एवं उनकी जमीन बेचने और सेना के जवानों की पेंशन कैसे खत्म हो, केंद्र सरकार ऐसे प्रपोजल तैयार करा रही है। वित्त मंत्रालय ने प्रपोजल दिया था कि आयुध निर्माणी कारखाने की जमीन बेचने से जो पैसा आएगा, वह 50 प्रतिशत सेना के उपकरण आदि खरीदने में खर्च होगा। बाकी का पैसा सरकार ले लेगी। हालांकि बाद में इस प्रपोजल को नकार दिया गया। रक्षा मंत्रालय ने इस बाबत कहा था कि ओएफबी यानी आयुध निर्माणी बोर्ड को रक्षा मंत्रालय के अन्य सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) के साथ सम्मिलित किया जाएगा। यह ओएफबी के हित में है क्योंकि ये ओएफबी को परिचालन स्वतंत्रता और लचीलापन प्रदान करेगा। वर्तमान में इसका अभाव महसूस किया जा रहा है। श्रमिकों के हितों को लेकर जो निर्णय लेंगे, उनमें पर्याप्त रूप से सुरक्षा की भावना रहेगी।