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भारत अब किस तरह का युद्ध लड़ेगा?: सीडीएस अनिल चौहान ने बताई रणनीति, तीन मोर्चों पर खतरों से निपटने की तैयारी
Fri, 09 Jan 2026 10:59 PM IST
निर्मल कांत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: निर्मल कांत
Updated Fri, 09 Jan 2026 10:59 PM IST
सार
सीडीएस जनरल अनिल चौहान ने रक्षा बजट, सेना के आधुनिकीकरण और भविष्य के युद्ध को लेकर बड़ा बयान दिया है। उनका कहना है कि अगर रक्षा खरीद देश में हो, तो इससे सरकार की कमाई भी बढ़ती है और रोजगार भी मिलता है। उन्होंने यह भी बताया कि आने वाले समय में युद्ध का तरीका पूरी तरह बदलने वाला है। विस्तार से पढ़िए रिपोर्ट-
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सीडीएस जनरल अनिल चौहान
- फोटो : एक्स/एएनआई/वीडियो ग्रैब
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विस्तार
चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल अनिल चौहान ने शुक्रवार को बजट आवंटन को लेकर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा, हमेशा से ही बंदूकों और मक्खन (यानी रक्षा और विकास) के बीच बहस चलती रही है। लेकिन अगर हम समझदारी से काम लें, तो एक दूसरे को योगदान दे सकते हैं।
सीडीएस ने कहा, बंदूक युद्ध में योगदान दे सकती है। पिछले तीन वर्षों में हमारी अधिकांश खरीद घरेलू स्रोतों से हुई है। ऐसा करने पर हम 18 फीसदी जीएसटी का भुगतान करते हैं, जो वापस सरकारी कोष में जाता है। औद्योगिकीकरण से रोजगार और राजस्व पैदा करने में मदद मिलती है। इसलिए रणनीति में यह बदलाव है। यह एक ऐसी बात है जिसमें हमें समझना होगा।
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उन्होंने आगे कहा, वर्तमान बजट आवंटन दो फीसदी से थोड़ा कम है। मेरा अनुमान है कि अगर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) आठ फीसदी की दर से बढ़ता रहता है, महंगाई की दर कम रहती है और हम सालाना 10 फीसदी की वृद्धि देखते हैं, तो कुछ महंगी खरीददारी को छोड़कर मौजूदा आधुनिकीकरण की योजनाएं अच्छी तरह से चलेंगी। शायद तुरंत कुछ बढ़ोतरी की जरूरत होगी। इसके बाद यह स्थिर हो जाएगा।
सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण पर सीडीएस ने क्या कहा?
तीनों सेनाओं के आधुनिकरण को लेकर जनरल चौहान ने कहा, करीब दो-तीन साल पहले हम कहते थे कि सशस्त्र बलों के पास पुराने, आधुनिक और भविष्य के विशेष उपकरणों का मिश्रण होना चाहिए। मैं इसे अलग तरीके से वर्गीकृत करने पर विचार कर रहा हूं। मैं कह रहा हूं कि आज हम सैन्य मामलों में क्रांति के दौर में हैं। मैं कहना चाहता हूं कि पहले युद्ध सीधी चाल और तेजी से हमले वाले युद्ध होते थे। उसके बाद सूचना और तकनीक के जरिये युद्ध लड़ना शुरू हुआ। अब हम तीसरे तरीके पर हैं, जो बुद्धिमानी और डाटा के सहारे लड़े जा रहे हैं।
उन्होंने कहा, हम अपने हथियारों और सेना के आधुनिकीकरण को इस तरह वर्गीकृत कर सकते थे कि 60 प्रतिशत सीधी लड़ाई, मदद और तेजी से हमला करने वाले युद्ध के लिए हो, 30 प्रतिशत सूचना और तकनीक के सहारे होने वाले युद्ध के समर्थन के लिए हो और 10 प्रतिशत सोच‑समझ, बुद्धिमानी और बिना परमाणु हथियारों वाले डर बनाए रखने वाले युद्ध के लिए हो।
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'नए तरीके से बनाई जाएंगी योजनाएं..'
जनरल चौहान ने कहा, यह सब करने के लिए हम अपनी खरीद की योजनाओं में बदलाव कर रहे हैं। अब ये योजनाएं पुराने तरीके से नहीं बनेंगी, बल्कि नए तरीके से तय की जाएंगी। साथ ही, हम गहन अध्ययन और विश्लेषण की मदद ले रहे हैं, ताकि यह तय किया जा सके कि सेना को किस तरह के हथियार कितनी संख्या में और कितनी मात्रा में चाहिए।
तीनों सेनाओं के प्रमुखों को लेकर क्या बोले सीडीएस?
ऑपरेशन सिंदूर और अन्य सैन्य अभियानों में सीडीएस की भूमिका पर जनरल अनिल चौहान ने कहा, सरकार के आदेश से सीडीएस का पद बनाया गया है। सीडीएस को तीनों सेनाओं के प्रमुखों पर सीधी सैन्य कमान नहीं दी गई है। इसलिए वे सीधे तौर पर किसी सेना को आदेश नहीं देते। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि उनकी कोई भूमिका नहीं होती। उनकी भूमिका चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी से आती है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी ज्यादातर फैसले इसी कमेटी ने लिए थे, जिसके वे स्थायी अध्यक्ष हैं। इसलिए वहां उनकी सक्रिय भूमिका रहती है। इसके अलावा, युद्ध के नए क्षेत्रों में उनकी सीधी भूमिका है। ये युद्ध जमीन, समुद्र या हवा से जुड़े नहीं हैं, बल्कि अंतरिक्ष, साइबर, सोच से जुड़ा युद्ध और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक क्षेत्र हैं। ये नए क्षेत्र सीधे मुख्यालय के नियंत्रण में होते हैं।
तीन मोर्चे पर युद्ध की तैयारियों पर क्या जनरल चौहान ने क्या कहा?
पाकिस्तान, चीन और तुर्किये से तीन मोर्चों पर युद्ध की आशंका पर उन्होंने कहा कि इन तीन देशों में से एक देश तुर्किये है, जिसकी हमारे साथ कोई सीमा नहीं लगती। इन देशों के बीच कोई औपचारिक सैन्य गठबंधन या समझौता भी नहीं है। एक‑दूसरे की मदद अलग तरीके से हो सकती है और हमें इसे अपनी योजना बनाते समय ध्यान में रखना होता है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हमने कुछ संसाधन और सैन्य साधन, जो उत्तरी सीमाओं पर तैनात थे, उन्हें पश्चिमी सीमाओं की ओर भेजा। ऐसी आपात योजनाएं हमारी सैन्य योजनाओं का हिस्सा होती हैं। इसी तरह हम अलग‑अलग मोर्चों को संभालते हैं। दो देशों के बीच तकनीकी सहयोग के बारे में उन्होंने कहा कि हमें लगातार यह देखना होता है कि वे कौन‑सी नई तकनीकें हासिल कर रहे हैं और भविष्य में उनका युद्ध पर क्या असर पड़ेगा। हम इन सब बातों पर नजर रखे हुए हैं और उसी के अनुसार जरूरी कदम उठा रहे हैं।
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सीडीएस ने कहा, बंदूक युद्ध में योगदान दे सकती है। पिछले तीन वर्षों में हमारी अधिकांश खरीद घरेलू स्रोतों से हुई है। ऐसा करने पर हम 18 फीसदी जीएसटी का भुगतान करते हैं, जो वापस सरकारी कोष में जाता है। औद्योगिकीकरण से रोजगार और राजस्व पैदा करने में मदद मिलती है। इसलिए रणनीति में यह बदलाव है। यह एक ऐसी बात है जिसमें हमें समझना होगा।
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उन्होंने आगे कहा, वर्तमान बजट आवंटन दो फीसदी से थोड़ा कम है। मेरा अनुमान है कि अगर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) आठ फीसदी की दर से बढ़ता रहता है, महंगाई की दर कम रहती है और हम सालाना 10 फीसदी की वृद्धि देखते हैं, तो कुछ महंगी खरीददारी को छोड़कर मौजूदा आधुनिकीकरण की योजनाएं अच्छी तरह से चलेंगी। शायद तुरंत कुछ बढ़ोतरी की जरूरत होगी। इसके बाद यह स्थिर हो जाएगा।
सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण पर सीडीएस ने क्या कहा?
तीनों सेनाओं के आधुनिकरण को लेकर जनरल चौहान ने कहा, करीब दो-तीन साल पहले हम कहते थे कि सशस्त्र बलों के पास पुराने, आधुनिक और भविष्य के विशेष उपकरणों का मिश्रण होना चाहिए। मैं इसे अलग तरीके से वर्गीकृत करने पर विचार कर रहा हूं। मैं कह रहा हूं कि आज हम सैन्य मामलों में क्रांति के दौर में हैं। मैं कहना चाहता हूं कि पहले युद्ध सीधी चाल और तेजी से हमले वाले युद्ध होते थे। उसके बाद सूचना और तकनीक के जरिये युद्ध लड़ना शुरू हुआ। अब हम तीसरे तरीके पर हैं, जो बुद्धिमानी और डाटा के सहारे लड़े जा रहे हैं।
उन्होंने कहा, हम अपने हथियारों और सेना के आधुनिकीकरण को इस तरह वर्गीकृत कर सकते थे कि 60 प्रतिशत सीधी लड़ाई, मदद और तेजी से हमला करने वाले युद्ध के लिए हो, 30 प्रतिशत सूचना और तकनीक के सहारे होने वाले युद्ध के समर्थन के लिए हो और 10 प्रतिशत सोच‑समझ, बुद्धिमानी और बिना परमाणु हथियारों वाले डर बनाए रखने वाले युद्ध के लिए हो।
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'नए तरीके से बनाई जाएंगी योजनाएं..'
जनरल चौहान ने कहा, यह सब करने के लिए हम अपनी खरीद की योजनाओं में बदलाव कर रहे हैं। अब ये योजनाएं पुराने तरीके से नहीं बनेंगी, बल्कि नए तरीके से तय की जाएंगी। साथ ही, हम गहन अध्ययन और विश्लेषण की मदद ले रहे हैं, ताकि यह तय किया जा सके कि सेना को किस तरह के हथियार कितनी संख्या में और कितनी मात्रा में चाहिए।
तीनों सेनाओं के प्रमुखों को लेकर क्या बोले सीडीएस?
ऑपरेशन सिंदूर और अन्य सैन्य अभियानों में सीडीएस की भूमिका पर जनरल अनिल चौहान ने कहा, सरकार के आदेश से सीडीएस का पद बनाया गया है। सीडीएस को तीनों सेनाओं के प्रमुखों पर सीधी सैन्य कमान नहीं दी गई है। इसलिए वे सीधे तौर पर किसी सेना को आदेश नहीं देते। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि उनकी कोई भूमिका नहीं होती। उनकी भूमिका चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी से आती है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी ज्यादातर फैसले इसी कमेटी ने लिए थे, जिसके वे स्थायी अध्यक्ष हैं। इसलिए वहां उनकी सक्रिय भूमिका रहती है। इसके अलावा, युद्ध के नए क्षेत्रों में उनकी सीधी भूमिका है। ये युद्ध जमीन, समुद्र या हवा से जुड़े नहीं हैं, बल्कि अंतरिक्ष, साइबर, सोच से जुड़ा युद्ध और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक क्षेत्र हैं। ये नए क्षेत्र सीधे मुख्यालय के नियंत्रण में होते हैं।
तीन मोर्चे पर युद्ध की तैयारियों पर क्या जनरल चौहान ने क्या कहा?
पाकिस्तान, चीन और तुर्किये से तीन मोर्चों पर युद्ध की आशंका पर उन्होंने कहा कि इन तीन देशों में से एक देश तुर्किये है, जिसकी हमारे साथ कोई सीमा नहीं लगती। इन देशों के बीच कोई औपचारिक सैन्य गठबंधन या समझौता भी नहीं है। एक‑दूसरे की मदद अलग तरीके से हो सकती है और हमें इसे अपनी योजना बनाते समय ध्यान में रखना होता है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान हमने कुछ संसाधन और सैन्य साधन, जो उत्तरी सीमाओं पर तैनात थे, उन्हें पश्चिमी सीमाओं की ओर भेजा। ऐसी आपात योजनाएं हमारी सैन्य योजनाओं का हिस्सा होती हैं। इसी तरह हम अलग‑अलग मोर्चों को संभालते हैं। दो देशों के बीच तकनीकी सहयोग के बारे में उन्होंने कहा कि हमें लगातार यह देखना होता है कि वे कौन‑सी नई तकनीकें हासिल कर रहे हैं और भविष्य में उनका युद्ध पर क्या असर पड़ेगा। हम इन सब बातों पर नजर रखे हुए हैं और उसी के अनुसार जरूरी कदम उठा रहे हैं।