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Hindi News ›   India News ›   CAPF 11 lakh soldiers will remain deprived of OPS even in 2025: Case pending in Supreme Court

2025 में भी OPS से वंचित रहे लाखों CAPF जवान: सुप्रीम कोर्ट में केस लंबित, ITBP में केवल 89 ने चुना यूपीएस

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Wed, 31 Dec 2025 06:47 PM IST
सार

साल 2023 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने एक अहम फैसले में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को 'भारत संघ के सशस्त्र बल' मानते हुए इन्हें ओपीएस के दायरे में लाने की बात कही थी, लेकिन सरकार इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में चली गई। मौजूदा समय में यह मामला, सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

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CAPF 11 lakh soldiers will remain deprived of OPS even in 2025: Case pending in Supreme Court
(प्रतीकात्मक) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के 11 लाख जवानों/अधिकारियों के लिए इस साल भी 'पुरानी पेंशन' बहाल नहीं हो सकी। इन बलों में 'पुरानी पेंशन' बहाली का मुद्दा, सालभर चर्चा में रहा है। संसद सत्र में भी यह मुद्दा उठाया गया। 'अलायंस ऑफ ऑल एक्स पैरामिलिट्री फोर्सेस वेलफेयर एसोसिएशन' के अलावा विभिन्न केंद्रीय कर्मचारी संगठनों ने इन बलों में 'पुरानी पेंशन' बहाली करने के लिए आवाज उठाई, लेकिन सरकार ने कोई घोषणा नहीं की। साल 2023 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने एक अहम फैसले में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को 'भारत संघ के सशस्त्र बल' मानते हुए इन्हें ओपीएस के दायरे में लाने की बात कही थी, लेकिन सरकार इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में चली गई। मौजूदा समय में यह मामला, सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। एनपीएस में शामिल 25 लाख से ज्यादा केंद्रीय कर्मियों में से लगभग एक लाख कर्मचारी ही अभी तक यूपीएस में शामिल हुए हैं। आईटीबीपी की कुल नफरी 87921 में से केवल 89 कार्मिकों ने ही यूपीएस का विकल्प चुना है। दूसरे केंद्रीय बलों में कुछ ऐसी ही स्थिति बताई जा रही है।  
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तब पुरानी पेंशन के दायरे में आ जाते सीएपीएफ जवान 
दिल्ली उच्च न्यायालय ने केंद्रीय अर्धसैनिक बल 'सीएपीएफ' को 'भारत संघ के सशस्त्र बल' माना था। हाईकोर्ट ने इन बलों में लागू 'एनपीएस' को स्ट्राइक डाउन करने की बात कही। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था, चाहे कोई आज इन बलों में भर्ती हुआ हो, पहले कभी भर्ती हुआ हो या आने वाले समय में भर्ती होगा, सभी जवान और अधिकारी, पुरानी पेंशन स्कीम के दायरे में आएंगे। सरकार ने इस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट में स्टे ले लिया। सर्वोच्च अदालत ने इस मामले की सुनवाई करते हुए उस निर्देश पर अंतरिम रोक की पुष्टि की थी, जिसमें पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस), सीसीएस (पेंशन) नियम, 1972 के अनुसार, केंद्रीय अर्धसैनिक बलों/केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के कर्मियों पर भी लागू होने की बात कही गई थी। न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ अपील करने के लिए भारत संघ को अनुमति देते हुए उक्त आदेश पारित किया था। इसके तहत प्रतिवादियों/सीएपीएफ कर्मियों की याचिकाओं का निपटान उच्च न्यायालय के फैसले के अनुसार किया गया था। सीएपीएफ में ओपीएस लागू कराने के लिए ये याचिकाएं पवन कुमार एवं अन्य के द्वारा दायर की गई थी। 
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देश की रक्षा करने वाले बलों के साथ समानता   
पवन कुमार के मामले में यह माना गया था कि केंद्रीय अर्धसैनिक बल, 'संघ के सशस्त्र बल' हैं। ऐसे में पुरानी पेंशन योजना उन पर भी लागू होती है। सुप्रीम कोर्ट के समक्ष हुई संक्षिप्त सुनवाई में, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी (संघ के लिए) ने बताया था कि याचिकाकर्ता देश की रक्षा करने वाले बलों के साथ समानता की मांग कर रहे हैं। उच्च न्यायालय ने भी पवन कुमार मामले में यह माना है कि केंद्रीय अर्धसैनिक बल 'संघ के सशस्त्र बल' हैं। पुरानी पेंशन योजना उन पर भी लागू होती है। सीनियर एडवोकेट अंकुर छिब्बर ने प्रतिवादियों (सीएपीएफ कर्मियों) की ओर से अनुरोध किया था कि इस मामले में एक निश्चित तारीख दे दी जाए। सुप्रीम कोर्ट ने उनके अनुरोध को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि मामला इतना जरूरी नहीं है। इसकी सुनवाई में कुछ समय लगेगा। वे छह से आठ सप्ताह बाद जल्दी सुनवाई के लिए ऐप्लिकेशन मूव कर सकते हैं। 
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सीएपीएफ को सिविलियन फोर्स बता रही सरकार 
केंद्र सरकार, सीएपीएफ को सिविलियन फोर्स बताती है। जानकारों का कहना है कि सीएपीएफ पर भारतीय सेना के कानून लागू होते हैं, फोर्स के नियंत्रण का आधार भी सशस्त्र बल है। इन बलों के लिए जो सर्विस रूल्स तैयार किए गए हैं, उनका आधार भी फौज है। इन सारी बातों के होते हुए भी केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को 'पुरानी पेंशन' से वंचित किया गया है। दिल्ली उच्च न्यायालय भी यह मान चुका है कि केंद्रीय अर्धसैनिक बल 'सीएपीएफ', 'भारत संघ के सशस्त्र बल' हैं। केंद्र सरकार, कई मामलों में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को सशस्त्र बल मानने को तैयार नहीं होती। सीएपीएफ में पुरानी पेंशन का मुद्दा भी इसी चक्कर में फंसा हुआ है। एक जनवरी 2004 के बाद केंद्र सरकार की नौकरियों में भर्ती हुए सभी कर्मियों को पुरानी पेंशन के दायरे से बाहर कर उन्हें 'एनपीएस' में शामिल कर दिया गया। इसी तर्ज पर सीएपीएफ जवानों को सिविल कर्मचारी मानकर उन्हें भी एनपीएस दे दिया गया। 

क्या कहता है बीएसएफ एक्ट 1968
उस वक्त सरकार का मानना था कि देश में सेना, नेवी और वायु सेना ही 'सशस्त्र बल' हैं। बीएसएफ एक्ट 1968 में भी कहा गया है कि इस बल का गठन 'भारत संघ के सशस्त्र बल' के रूप में हुआ है। इसी तरह सीएपीएफ के बाकी बलों का गठन भी भारत संघ के सशस्त्र बलों के रूप में हुआ है। कोर्ट ने माना है कि 'सीएपीएफ' भी भारत के सशस्त्र बलों में शामिल हैं। इस लिहाज से उन पर 'एनपीएस' लागू नहीं होता है। केंद्रीय गृह मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा 6 अगस्त 2004 को जारी पत्र में घोषित किया गया है कि गृह मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के तहत केंद्रीय बल, 'संघ के सशस्त्र बल' हैं। सीएपीएफ के जवानों और अधिकारियों का कहना है कि केंद्रीय अर्धसैनिक बलों में फौजी महकमे वाले सभी कानून लागू होते हैं। सरकार खुद मान चुकी है कि ये बल तो भारत संघ के सशस्त्र बल हैं। 

सिविल महकमे के कर्मी नहीं लेते ऐसी शपथ 
सीएपीएफ जवानों को अलाउंस भी सशस्त्र बलों की तर्ज पर मिलते हैं। इन बलों में कोर्ट मार्शल का भी प्रावधान है। इस मामले में सरकार दोहरा मापदंड अपना रही है। अगर सीएपीएफ जवानों को सरकार, सिविलियन मानती है तो उनमें आर्मी की तर्ज पर बाकी प्रावधान क्यों हैं। फोर्स के नियंत्रण का आधार भी सशस्त्र बल है। जो सर्विस रूल्स हैं, वे भी सैन्य बलों की तर्ज पर बने हैं। अब इन्हें सिविलियन फोर्स मान रहे हैं तो ऐसे में ये बल अपनी सर्विस का निष्पादन कैसे करेंगे। इन बलों को शपथ दिलाई गई थी कि इन्हें जल, थल और वायु में जहां भी भेजा जाएगा, ये वहीं पर काम करेंगे। सिविल महकमे के कर्मी तो ऐसी शपथ नहीं लेते हैं। 


महज एक लाख कर्मी ही यूपीएस में आए 
नेशनल मिशन फॉर ओल्ड पेंशन स्कीम भारत' के अध्यक्ष डॉ. मंजीत सिंह पटेल बताते हैं कि यूपीएस को लेकर कर्मचारियों का रूझान सकारात्मक नहीं है। अभी तक तीन प्रतिशत कर्मियों ने भी यूपीएस का विकल्प नहीं चुना है। पेंशन सचिव के साथ बैठक में कर्मचारी पक्ष की तरफ से कहा गया था कि यूपीएस में जब तक वीआरएस के दिन से पेंशन देने का प्रावधान नहीं होगा और लम सम राशि को दो से तीन गुणा नहीं किया जाएगा, तब तक यह स्कीम कर्मियों को अपनी तरफ आकर्षित नहीं कर सकती। फिलहाल जो कर्मचारी यूपीएस में गए हैं, उनमें आधे ऐसे हैं जो रिटायर हो चुके हैं। आधे वो लोग हैं जो बड़े पदों पर हैं। वे भी चार छह माह बाद वापस एनपीएस में आ जाएंगे, क्योंकि वन टाइम विकल्प के तहत वे वापस आ सकते हैं।

हमें ओपीएस की आत्मा को समझना चाहिए 
यूपीएस में शामिल होने का विकल्प 30 नवंबर तक देना था। अब वह पोर्टल बंद हो चुका है। वह पोर्टल ठीक से खुल भी नहीं सका। इसके चलते इच्छुक कर्मचारी भी यूपीएस में नहीं जा सके। सरकार द्वारा खुद ही इसे फेल किया जा रहा है। आठवें वेतन आयोग के टीओआर में कर्मचारियों के लिए ओपीएस आज भी सबसे बड़ा मुद्दा है। ओपीएस मिल जाए या वैसे लाभ मिल जाएं, इसके लिए संघर्ष जारी रहेगा। डॉ. पटेल ने कहा, हमें ओपीएस की आत्मा को समझना चाहिए। नाम से कोई लेना देना नहीं है। कर्मचारियों का एक ही मकसद है कि रिटायरमेंट पर पचास प्रतिशत पेंशन मिले और कर्मचारी का अंशदान जीपीएफ सहित वापस मिल जाए। 
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