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आधार-वोटर आईडी होने के बाद भी निर्वासिन क्यों?: कलकत्ता हाईकोर्ट ने बंगाल सरकार से किया सवाल, आदेश पर लगाई रोक
Thu, 08 Oct 2026 06:22 PM IST
अमन मौर्या
पीटीआई, कोलकाता, पश्चिम बंगाल
पीटीआई, कोलकाता, पश्चिम बंगाल
Published by: अमन मौर्या
Updated Thu, 08 Oct 2026 06:22 PM IST
सार
कलकत्ता हाईकोर्ट ने बंगाल सरकार से 1970 के दशक में सीमा पार कर भारत आने वाले लोगों पर सवाल किया। साथ ही साहिदुल शेख को बांग्लादेशी बताकर निर्वासित करने के आदेश पर फिलहाल रोक लगा दी है।
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कलकत्ता हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
कलकत्ता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार से 1970 के दशक में भारत-बांग्लादेश सीमा से भारत आने वाले लोगों की जानकारी मांगी। अदालत ने गुरुवार को एक व्यक्ति को बांग्लादेशी नागरिक बताकर हिरासत में लेने और निर्वासित करने के मामले की सुनवाई की। इस दौरान पश्चिम बंगाल सरकार से कोर्ट ने पूछा कि 1970 के दशक में भारत-बांग्लादेश सीमा से कितने लोग भारत आए थे और क्या उन सभी को वापस भेजना व्यावहारिक रूप से संभव है। जस्टिस सौगत भट्टाचार्य की अदालत ने साहिदुल शेख की याचिका पर सुनवाई की। शेख ने विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण कार्यालय (एफआरआरओ) द्वारा हिरासत में लेने और निर्वासन के आदेशों को लेकर कोर्ट में चुनौती दी है।
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हाईकोर्ट ने सरकार से क्या सवाल किया?
जस्टिस भट्टाचार्य ने अतिरिक्त महाधिवक्ता राजदीप मजूमदार से पूछा कि 1970 के दशक में कितने लोग सीमा पार कर भारत आए थे और क्या उन्हें पूरी तरह वापस भेजना व्यावहारिक रूप से संभव है। इस दौरान न्यायाधीश ने यह भी कहा कि जमीनी स्थिति को समझने के लिए बांग्लादेश की सीमा से लगे जिलों का दौरा करना चाहिए। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने शेख को बांग्लादेशी नागरिक के रूप में पहचानने के आधार को लेकर राज्य से सवाल भी किया और कहा कि उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना उन्हें दो महीने से अधिक समय तक हिरासत में क्यों रखा गया। जस्टिस भट्टाचार्य ने देश से निकाले जाने के आदेश के आधार पर भी सवाल उठाए, खासकर तब जब यह आदेश कथित तौर पर उन लोगों के बयानों पर आधारित था जिन्हें शेख ने अपने परिवार का सदस्य बताया था।
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कोर्ट ने सवाल किया कि यदि शेख बांग्लादेशी नागरिक हैं तो उनके पास आधार और मतदाता पहचान पत्र कैसे हो सकते हैं। इस पर राज्य सरकार के वकील ने कहा कि ये दस्तावेज स्थानीय पंचायत द्वारा जारी कथित फर्जी प्रमाणपत्रों के आधार पर हासिल किए गए थे। सरकार ने कोर्ट को बताया कि एफआरआरओ ने मुर्शिदाबाद जिले के रानीनगर थाने के प्रभारी अधिकारी की रिपोर्ट के आधार पर हिरासत का आदेश जारी किया था। शेख को आठ अगस्त को अवैध प्रवासी होने के संदेह पर रानीनगर पुलिस ने हिरासत में लिया था। इसके बाद 10 अगस्त को एफआरआरओ ने हिरासत की पुष्टि की थी।
बंगाल सरकार ने क्या कहा?
राज्य सरकार के वकील ने बताया कि केंद्र सरकार ने दो मई, 2026 को देश में अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी नागरिकों और रोहिंग्याओं की पहचान और उनके निर्वासन की सुविधा के लिए दिशानिर्देश जारी किए थे। इसके तहत अवैध प्रवासियों की पहचान के लिए विशेष अभियान चल रहा है। उन्होंने बताया कि कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर मतदाता पहचान, आधार और पैन कार्ड हासिल करना संदेह पैदा करता है और यह निर्वासन का आधार बन सकता है। वकील ने बताया कि अधिकारियों के समक्ष जरूरी दस्तावेज पेश न करना भी निर्वासन का आधार हो बन है। राज्य के वकील ने आगे कहा कि जिन लोगों को शेख ने अपने परिवार का सदस्य बताया था, उन्होंने अधिकारियों को बताया कि वे उसे नहीं जानते थे।
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हालांकि, कोर्ट ने सवाल किया कि कथित परिवार के सदस्यों द्वारा शेख को पहचानने से इनकार करना कैसे यह साबित करता है कि वह बांग्लादेशी नागरिक हैं। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता को भी अपनी स्थिति स्पष्ट करने का मौका दिया जाना चाहिए। राज्य सरकार के अनुरोध पर कोर्ट ने याचिका को उचित अधिकार क्षेत्र वाली पीठ के समक्ष रखने का निर्देश दिया। अब यह मामला 14 अक्तूबर को संबंधित पीठ के समक्ष रखा जाएगा। कोर्ट ने तब तक के लिए शेख के खिलाफ निर्वासन आदेश पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि शेख के खिलाफ डिपोर्टेशन का आदेश तब तक रुका रहेगा, जब तक कि उचित बेंच इस मामले की सुनवाई न कर ले।
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हाईकोर्ट ने सरकार से क्या सवाल किया?
जस्टिस भट्टाचार्य ने अतिरिक्त महाधिवक्ता राजदीप मजूमदार से पूछा कि 1970 के दशक में कितने लोग सीमा पार कर भारत आए थे और क्या उन्हें पूरी तरह वापस भेजना व्यावहारिक रूप से संभव है। इस दौरान न्यायाधीश ने यह भी कहा कि जमीनी स्थिति को समझने के लिए बांग्लादेश की सीमा से लगे जिलों का दौरा करना चाहिए। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने शेख को बांग्लादेशी नागरिक के रूप में पहचानने के आधार को लेकर राज्य से सवाल भी किया और कहा कि उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना उन्हें दो महीने से अधिक समय तक हिरासत में क्यों रखा गया। जस्टिस भट्टाचार्य ने देश से निकाले जाने के आदेश के आधार पर भी सवाल उठाए, खासकर तब जब यह आदेश कथित तौर पर उन लोगों के बयानों पर आधारित था जिन्हें शेख ने अपने परिवार का सदस्य बताया था।
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कोर्ट ने सवाल किया कि यदि शेख बांग्लादेशी नागरिक हैं तो उनके पास आधार और मतदाता पहचान पत्र कैसे हो सकते हैं। इस पर राज्य सरकार के वकील ने कहा कि ये दस्तावेज स्थानीय पंचायत द्वारा जारी कथित फर्जी प्रमाणपत्रों के आधार पर हासिल किए गए थे। सरकार ने कोर्ट को बताया कि एफआरआरओ ने मुर्शिदाबाद जिले के रानीनगर थाने के प्रभारी अधिकारी की रिपोर्ट के आधार पर हिरासत का आदेश जारी किया था। शेख को आठ अगस्त को अवैध प्रवासी होने के संदेह पर रानीनगर पुलिस ने हिरासत में लिया था। इसके बाद 10 अगस्त को एफआरआरओ ने हिरासत की पुष्टि की थी।
बंगाल सरकार ने क्या कहा?
राज्य सरकार के वकील ने बताया कि केंद्र सरकार ने दो मई, 2026 को देश में अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी नागरिकों और रोहिंग्याओं की पहचान और उनके निर्वासन की सुविधा के लिए दिशानिर्देश जारी किए थे। इसके तहत अवैध प्रवासियों की पहचान के लिए विशेष अभियान चल रहा है। उन्होंने बताया कि कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर मतदाता पहचान, आधार और पैन कार्ड हासिल करना संदेह पैदा करता है और यह निर्वासन का आधार बन सकता है। वकील ने बताया कि अधिकारियों के समक्ष जरूरी दस्तावेज पेश न करना भी निर्वासन का आधार हो बन है। राज्य के वकील ने आगे कहा कि जिन लोगों को शेख ने अपने परिवार का सदस्य बताया था, उन्होंने अधिकारियों को बताया कि वे उसे नहीं जानते थे।
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हालांकि, कोर्ट ने सवाल किया कि कथित परिवार के सदस्यों द्वारा शेख को पहचानने से इनकार करना कैसे यह साबित करता है कि वह बांग्लादेशी नागरिक हैं। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता को भी अपनी स्थिति स्पष्ट करने का मौका दिया जाना चाहिए। राज्य सरकार के अनुरोध पर कोर्ट ने याचिका को उचित अधिकार क्षेत्र वाली पीठ के समक्ष रखने का निर्देश दिया। अब यह मामला 14 अक्तूबर को संबंधित पीठ के समक्ष रखा जाएगा। कोर्ट ने तब तक के लिए शेख के खिलाफ निर्वासन आदेश पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि शेख के खिलाफ डिपोर्टेशन का आदेश तब तक रुका रहेगा, जब तक कि उचित बेंच इस मामले की सुनवाई न कर ले।