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Bombay High Court: हाईकोर्ट ने दिखाई दरियादिली, 83 साल की सजा पाने वाले व्यक्ति को किया रिहा; पढ़ें अहम खबरें

Wed, 19 Jul 2023 06:39 PM IST
Jeet Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई Published by: Jeet Kumar Updated Wed, 19 Jul 2023 06:39 PM IST
सार

बॉम्बे हाईकोर्ट ने चोरी के 41 मामलों में 83 साल जेल की सजा पाने वाले पुणे के 30 वर्षीय व्यक्ति पर दरियादिली दिखाते हुए रिहा करने का आदेश दिया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि अगर व्यक्ति को सही समय पर कानूनी मदद मिल जाती तो वह 41 में से 38 में बरी हो जाता। 

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Bombay High Court orders release of man sentenced to 83 years jail in 41 cases
बॉम्बे हाईकोर्ट (फाइल फोटो) - फोटो : पीटीआई

विस्तार

बॉम्बे हाईकोर्ट ने चोरी के 41 मामलों में 83 साल जेल की सजा पाने वाले पुणे के 30 वर्षीय व्यक्ति पर दरियादिली दिखाते हुए रिहा करने का आदेश दिया। पीठ ने कहा कि अगर इस व्यक्ति पर फैसला नहीं लिया गया तो न्याय की गंभीर हानि होगी। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि अगर व्यक्ति को सही समय पर कानूनी मदद मिल जाती तो वह 41 में से 38 में बरी हो जाता। चूंकि वह गरीब है वह वकील नहीं कर सकता इसलिए वह जेल में अपनी सजा काट रहा था।

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बॉम्बे हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने असलम सलीम शेख नाम के व्यक्ति की याचिका पर सोमवार को आदेश पारित किया। शेख 3 मार्च 2014 को अपनी गिरफ्तारी के बाद से जेल में था। और चोरी से संबंधित अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया। वह फिलहाल पुणे की यरवदा जेल में बंद हैं। 
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शेख को पहली बार पुणे के शाहकर नगर द्वारा दर्ज चोरी के मामले में गिरफ्तार किया गया था और बाद में 40 अन्य चोरी के मामलों में 11 अन्य पुलिस स्टेशनों द्वारा गिरफ्तार किया गया। उसने 41 मामलों में दोष स्वीकार किया इसके बाद उसे छह महीने से तीन साल तक की अवधि के लिए कारावास की सजा सुनाई गई। उसकी सभी सजाएँ लगातार चलनी थीं क्योंकि ट्रायल कोर्ट ने यह निर्दिष्ट नहीं किया था कि सजाएँ पिछली दोषसिद्धि और सजाओं के साथ-साथ चलेंगी।
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हाईकोर्ट ने जांच में पाया व्यक्ति को नहीं मिली कानूनी मदद
अपनी गिरफ्तारी के नौ साल बाद, शेख ने 2022 में बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और याचिका में बताया कि वह अनपढ़ है, वकील नियुक्त करने के लिए बहुत गरीब है और उसे उन अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया था जो उसने नहीं किए थे। उच्च न्यायालय ने मामलों की जांच की और पाया कि शेख को 41 मामलों में से 38 में कानूनी सहायता भी नहीं मिली और यह कि उसके खिलाफ सबूत इतने कमजोर थे कि अगर उस पर मुकदमा चलता तो वह बरी हो जाता।

सजा देना दोषी द्वारा समान अपराध करने से रोकना है
न्यायमूर्ति रेवती मोहिते डेरे और न्यायमूर्ति गौरी गोडसे की खंडपीठ ने शेख द्वारा दायर याचिका पर 17 जुलाई को दिए गए अपने फैसले में कहा कि अदालतें न्याय करने के लिए मौजूद हैं और किसी भी निचली अदालत ने निवारण और सुधार की सजा नीति पर विचार नहीं किया। उन्होंने कहा कि सजा का निवारक प्रभाव दोषी द्वारा समान अपराध करने से रोकना है। कारावास की सजा का एक सुधारात्मक उद्देश्य भी होना चाहिए, इससे अपराधी का मनोबल नहीं गिरना चाहिए और वास्तव में, अपराधी को अपराध की प्रकृति के आधार पर खुद को सुधारने का अवसर दिया जाना चाहिए।

पीठ ने कहा- हम न्याय के उपहास की अनुमति नहीं दे सकते
उच्च न्यायालय ने कहा कि यदि शेख को लगातार सभी मामलों में कारावास भुगतना पड़ा तो उसे लगभग 83 साल कारावास भुगतना होगा और चूंकि वह लगाया गया जुर्माना भरने की स्थिति में नहीं है, इसलिए उसे 10 साल अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा। पीठ ने कहा कि इसका मतलब उसी सजा कुल 93 साल की होगी। शेख का पूरा जीवन जेल में ही बीतेगा। हाईकोर्ट ने कहा कि यह एक ऐसी सजा है, जो किसी हत्या के लिए आजीवन कारावास की सजा से भी अधिक है। यदि अनुमति दी जाती है, तो यह निश्चित रूप से न्याय का उपहास होगा। इस वास्तविकता से अवगत होने के नाते, हम न्याय के उपहास की अनुमति नहीं दे सकते।

गिरफ्तारी के समय शेख केवल 21 वर्ष का था
पीठ ने कहा कि गिरफ्तारी के समय शेख केवल 21 वर्ष का था और किसी भी मामले में किसी भी वकील ने उसका बचाव नहीं किया था और ट्रायल कोर्ट द्वारा उसे कानूनी सहायता की भी पेशकश नहीं की गई थी। शेख ने सभी निचली अदालतों से उसके प्रति नरमी बरतने की मांग की थी क्योंकि वह एक गरीब परिवार से था और उसका परिवार उस पर निर्भर था। 

Bombay High Court orders release of man sentenced to 83 years jail in 41 cases
बॉम्बे हाईकोर्ट - फोटो : सोशल मीडिया

पुलिस बल को संवेदनशील बनाने की जरूरत: हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने बुधवार को कहा कि परिवार के सदस्यों के साथ टकराव में समलैंगिक जोड़ों से संबंधित मामलों से निपटने के तरीके को लेकर पूरे महाराष्ट्र में पुलिस बल को संवेदनशील बनाने की आवश्यकता है। जस्टिस रेवती मोहिते डेरे की अध्यक्षता वाली एक खंडपीठ एक महिला द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें इस आधार पर पुलिस सुरक्षा दिए जाने का अनुरोध किया गया था कि उसे और उसकी महिला साथी को उसकी साथी के परिवार द्वारा धमकी दी जा रही है। मामले की छह जुलाई को हुई पिछली सुनवाई पर राज्य सरकार ने अदालत को आश्वासन दिया था कि वह समलैंगिक जोड़े को पुलिस सुरक्षा देगी।

Bombay High Court orders release of man sentenced to 83 years jail in 41 cases
बॉम्बे हाईकोर्ट

दृष्टिहीनों के लिए अलग बैंक नोट जारी करना मुश्किल कामः आरबीआई
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने बुधवार को बॉम्बे हाईकोर्ट से कहा कि वह दृष्टि-बाधित लोगों को बैंक नोटों की पहचान में पेश होने वाली दिक्कतों से परिचित है, लेकिन उनके लिए नए बैंक नोट जारी करना एक समय-साध्य कार्य है और इस पर भारी खर्च भी आएगा। आरबीआई ने हाईकोर्ट में दायर एक हलफनामे में कहा कि बैंक नोट की नई ‘सीरीज’ जारी करने की प्रक्रिया बेहद जटिल है और इसमें छह से सात साल तक का समय लग जाता है। हलफनामा दृष्टिबाधितों की संस्था 'नेशनल एसोसिएशन ऑफ ब्लाइंड' (एनएबी) की तरफ से दायर याचिका के जवाब में दाखिल गया है। मामले की अगली सुनवाई 12 सप्ताह बाद होगी।

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