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Bombay High Court: वकील और पूर्व सैनिक को लगाई बेवजह हथकड़ी, अदालत का आदेश- सरकार दे 50-50 हजार रुपये मुआवजा

Fri, 24 Apr 2026 04:14 AM IST
Devesh Tripathi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई Published by: Devesh Tripathi Updated Fri, 24 Apr 2026 04:14 AM IST
सार

अमरावती के पुलिस अधीक्षक ने अदालत को बताया कि संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ जांच कर कार्रवाई की गई है। हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि केवल कार्रवाई पर्याप्त नहीं है, बल्कि मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के मामलों में पीड़ित को मुआवजा भी मिलना चाहिए।

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bombay high court order maharashtra government Rs 50000 compensation compensation illegal handcuffing
बॉम्बे हाई कोर्ट - फोटो : ANI

विस्तार

बॉम्बे हाईकोर्ट ने वकील और पूर्व सैनिक को हथकड़ी लगाकर ले जाने के मामले को अपमान करार देते हुए महाराष्ट्र सरकार को दोनों को 50-50 हजार रुपये मुआवजा आठ सप्ताह के भीतर देने का आदेश दिया है।
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नागपुर पीठ ने अपने आदेश में कहा कि महाराष्ट्र पुलिस का आदर्श वाक्य ‘सद्रक्षणाय खलनिग्रहणाय’ (अच्छों की रक्षा और बुराइयों का दमन) है, जिसका पालन होना चाहिए। अदालत ने पाया कि दोनों को अमरावती जिले के तलेगांव पुलिस थाने से तहसीलदार कार्यालय तक राज्य परिवहन बस में हथकड़ी लगाकर ले जाया गया, जहां उन्हें जमानत दी गई।
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हाईकोर्ट ने और क्या कहा?
जस्टिस उर्मिला जोशी-फाल्के और जस्टिस निवेदिता मेहता की पीठ ने कहा कि कानून लागू करने वालों की जिम्मेदारी केवल आरोपी और पीड़ित तक सीमित नहीं होती, बल्कि राज्य और समाज के प्रति भी होती है। ऐसे मामलों से आपराधिक न्याय व्यवस्था पर लोगों का भरोसा कमजोर होता है। अदालत ने कहा कि सहायक पुलिस निरीक्षक और दो कांस्टेबल ने याचिकाकर्ताओं (वकील योगेश्वर कवाड़े और पूर्व सैनिक अविनाश दाते) को अनावश्यक रूप से अपमानित किया, जो किसी भी नागरिक के साथ नहीं किया जा सकता। इसलिए वे मुआवजे के हकदार हैं।
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हाईकोर्ट ने कहा- केवल कार्रवाई पर्याप्त नहीं
अमरावती के पुलिस अधीक्षक ने अदालत को बताया कि संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ जांच कर कार्रवाई की गई है। हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि केवल कार्रवाई पर्याप्त नहीं है, बल्कि मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के मामलों में पीड़ित को मुआवजा भी मिलना चाहिए। अदालत ने कहा कि जब मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो केवल यह कहना काफी नहीं कि कार्रवाई हो गई है, बल्कि न्यायिक राहत के रूप में मुआवजा देना जरूरी है। अदालत ने इसे कानूनी चोट के लिए न्यायिक उपचार की अनिवार्यता बताया। कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को निर्देश दिया कि दोनों याचिकाकर्ताओं को आठ सप्ताह के भीतर मुआवजा दिया जाए।


याचिकाकर्ताओं ने कहा- वे न तो आदतन और न ही गंभीर अपराधी थे
याचिका के अनुसार, अगस्त 2010 में दोनों एक व्यक्ति के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने तलेगांव पुलिस थाने गए थे। उस व्यक्ति ने उनके खिलाफ मारपीट और धमकी का आरोप लगाते हुए पलट शिकायत दर्ज कराई। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि पुलिस ने उन्हें आधी रात के बाद अवैध रूप से हिरासत में रखा, कपड़े उतरवाए और केवल अंत:वस्त्र में बैठाए रखा। अगले दिन पुलिस ने उन्हें हथकड़ी लगाकर बस से तहसीलदार कार्यालय ले जाया। वहां तहसीलदार ने हथकड़ी हटाने का निर्देश देते हुए दोनों को जमानत दे दी। याचिका में कहा गया कि इस कार्रवाई से उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा और यह कानून के भी खिलाफ था, क्योंकि वे न तो आदतन अपराधी थे और न ही गंभीर अपराधी।

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