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आरोप-प्रत्यारोप: भाजपा ने कहा- मोदी सरकार पर अमर्त्य सेन की टिप्पणी पूरी तरह से राजनीतिक
Sun, 06 Jun 2021 03:51 AM IST
देव कश्यप
पीटीआई, कोलकाता
पीटीआई, कोलकाता
Published by: देव कश्यप
Updated Sun, 06 Jun 2021 03:51 AM IST
सार
- नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन की टिप्पणी को भाजपा ने राजनीति से प्रेरित बताया।
- बंगाल भाजपा के प्रवक्ता समिक भट्टाचार्य ने कहा कि वह पूरी दुनिया के सामने सरकार की लगातार आलोचना नहीं कर सकते।
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अमर्त्य सेन (फाइल फोटो)
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
पश्चिम बंगाल भाजपा ने नोबेल पुरस्कार से सम्मानित अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन की उस टिप्पणी को पूर्ण रूप से राजनीतिक करार दिया है, जिसमें सेन ने कहा कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने ‘भ्रम में रहते हुए’ कोविड-19 को फैलने से रोकने के लिए काम करने के बजाय अपने कामों का श्रेय लेने पर ध्यान केंद्रित किया जिससे ‘स्किजोफ्रेनिया’ की स्थिति बन गई और काफी दिक्कतें पैदा हुई।
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स्किजोफ्रेनिया एक गंभीर मनोरोग होता है जिसमें रोगी वास्तविक और काल्पनिक संसार में भेद नहीं कर पाता। प्रदेश भाजपा के प्रवक्ता समिक भट्टाचार्य ने कहा कि वह पूरी दुनिया के सामने सरकार की लगातार आलोचना नहीं कर सकते।
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भट्टाचार्य ने संवाददाताओं से कहा, 'मैं उतना अधिक अहंकारी नहीं कि यह कहूं कि सेन की आयु अधिक हो गई है और उन्हें काउंसलिंग की जरूरत है। हालांकि, हमें मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले की भी उनकी टिप्पणियों को नहीं भूलना चाहिए। सेन ने प्रधानमंत्री और केंद्र के खिलाफ जो भी कहा, वह पूरी तरह से राजनीतिक टिप्पणी है।'
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बता दें कि प्रख्यात अर्थशास्त्री ने राष्ट्र सेवा दल द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में कहा कि भारत अपने दवा निर्माण के कौशल और साथ ही उच्च रोग प्रतिरोधक क्षमता के कारण महामारी से लड़ने के लिए बेहतर स्थिति में था। सेन की ये टिप्पणियां कोरोना वायरस महामारी की दूसरी लहर की पृष्ठभूमि में आई हैं। कुछ प्रतिष्ठित लोगों का कहना है कि पहले ही विजयी होने की भावना से यह संकट पैदा हुआ।
सेन ने कहा कि सरकार में भ्रम के कारण संकट से खराब तरीके के निपटने की वजह से भारत अपनी क्षमताओं के साथ काम नहीं कर सका। उन्होंने कहा, 'सरकार ने जो किया उसका श्रेय लेने की इच्छुक दिखाई दी जबकि उसे यह सुनिश्चित करना था कि भारत में यह महामारी न फैले। इसका नतीजा काफी हद तक स्किजोफ्रेनिया जैसा था।' गौरतलब है कि हार्वर्ड विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र और दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर सेन ने 1769 में एडम स्मिथ के लिखे एक लेख के हवाले से कहा कि अगर कोई अच्छा काम करता है तो उसे उसका श्रेय मिलता है। श्रेय कई बार एक संकेत होता है कि कोई व्यक्ति कितना अच्छा काम कर रहा है। लेकिन श्रेय पाने की कोशिश करना और श्रेय पाने वाला अच्छा काम न करना बौद्धिक नादानी का एक स्तर दिखाता है, जिससे बचना चाहिए। भारत ने यही करने की कोशिश की।
उन्होंने कहा कि भारत पहले से ही सामाजिक असमानताओं, धीमे विकास और बेरोजगारी से जूझ रहा है जो इस महामारी के दौरान बढ़ गया है। अर्थव्यवस्था की विफलता और सामाजिक एकजुटता की विफलता, महामारी से निपटने में नाकामी की भी वजह है। शिक्षा संबंधी सीमाओं के चलते शुरुआती स्तर पर लक्षणों और इलाज के प्रोटोकॉल पता लगाने में मुश्किलें हुईं। सेन ने स्वास्थ्य देखभाल और शिक्षा के क्षेत्र के साथ ही अर्थव्यवस्था और सामाजिक नीतियों में भी बड़े सार्थक बदलाव की पैरवी की।