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बिहार के महाकांड: जब एक डीएम को पहले मारी गई गोली, फिर हुई लिंचिंग; जिस बाहुबली को उम्रकैद हुई, आज वो आजाद
Thu, 19 Jun 2025 08:55 AM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Thu, 19 Jun 2025 08:55 AM IST
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सार
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दिवंगत जी कृष्णय्या (बाएं) और आनंद मोहन।
- फोटो :
अमर उजाला
विस्तार
बिहार में हिंसा के साथ सांप्रदायिकता और जातीयता के कोण बिल्कुल उसी तरह जुड़े रहे हैं, जैसे बाहुबलियों के साथ राजनीति। इतिहास भी कुछ इसी तरह की गवाही देता है। फिर चाहे बात चाहे सीवान के पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन हों या सहरसा-सुपौल से जुड़े आनंद मोहन या फिर मोकामा के अनंत कुमार सिंह की हो। ऐसे ही कई और बाहुबली हैं जिनका बिहार की राजनीति में दबदबा रहा है। 'बिहार के महाकांड' सीरीज में आज बात आनंद मोहन से जुड़े एक कांड की करेंगे।आखिर कैसे एक बाहुबली नेता का नाम एक डीएम की दिनदहाड़े हुई हत्या से जुड़ गया? उस कलेक्टर ने आखिर उस दिन ऐसा क्या किया था कि हजारों की संख्या में इकट्ठा हुई भीड़ ने उसकी लिंचिंग कर दी? मामले में कार्रवाई किस तरह आगे बढ़ी? दोषी आनंद मोहन को इस मामले में क्या सजा हुई और आखिर अब वह आजाद कैसे घूम रहा है? आइये जानते हैं...
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पहले जानें- कौन थे डीएम जी. कृष्णय्या, जिनकी हुई थी दिनदहाड़े हत्या?
जी. कृष्णय्या मूलतः आंध्र प्रदेश के महबूबनगर (अब तेलंगाना में) के रहने वाले थे। वे बिहार कैडर के 1985 बैच के आईएएस अधिकारी थे। वह दलित समुदाय से आते थे और उनकी गिनती ईमानदार छवि वाले अफसरों में होती थी। बताया जाता था कि शुरुआती जीवन में कृष्णय्या को काफी संघर्ष करना पड़ा था। उनके पिता कुली थे, इसलिए उन्होंने एक कुली के तौर पर भी काम किया। हालांकि, बाद में पढ़ाई पर जोर देते हुए वह पत्रकारिता और फिर लेक्चरर बने। बाद में वे एक सरकारी क्लर्क के तौर पर नौकरी पा गए। इसके बाद अपने बलबूते पर आईएएस बने।
जी. कृष्णय्या मूलतः आंध्र प्रदेश के महबूबनगर (अब तेलंगाना में) के रहने वाले थे। वे बिहार कैडर के 1985 बैच के आईएएस अधिकारी थे। वह दलित समुदाय से आते थे और उनकी गिनती ईमानदार छवि वाले अफसरों में होती थी। बताया जाता था कि शुरुआती जीवन में कृष्णय्या को काफी संघर्ष करना पड़ा था। उनके पिता कुली थे, इसलिए उन्होंने एक कुली के तौर पर भी काम किया। हालांकि, बाद में पढ़ाई पर जोर देते हुए वह पत्रकारिता और फिर लेक्चरर बने। बाद में वे एक सरकारी क्लर्क के तौर पर नौकरी पा गए। इसके बाद अपने बलबूते पर आईएएस बने।
बिहार कैडर में होने की वजह से कृष्णय्या की पहली पोस्टिंग उस वक्त डकैती और अपहरण की घटनाओं के लिए बदनाम पश्चिमी चंपारण में हुई। तब इस क्षेत्र में जमींदारों और खेतों पर काम करने वाले मजदूरों के बीच संघर्ष भी शुरू हो चुका था। इन कठिन परिस्थितियों के बावजूद जी. कृष्णय्या ने क्षेत्र में काफी काम कराया और भूमि सुधारों को जगह दी। बताया जाता है कि गरीब किसान और मजदूर उन्हें काफी मानते थे, क्योंकि वे हर वक्त उनके लिए उपलब्ध रहते थे। अपने बेहतरीन रिकॉर्ड के बलबूते ही 1994 में कृष्णय्या को गोपालगंज जिले का कलेक्टर बना दिया गया। हालांकि, इसी गोपालगंज का जिलाधिकारी रहते हुए उनकी हत्या कर दी गई।
अब जानें- कृष्णय्या की हत्या की पृष्ठभूमि किसने और कैसे तैयार की?
गोपालगंज के डीएम जी. कृष्णय्या की हत्या के मामले और इससे आनंद मोहन का नाम कैसे जुड़ा, यह जानने के लिए हमें जानना होगा इस पूरे मामले के एक और चेहरे छोटन शुक्ला को। माफिया कौशलेंद्र शुक्ला उर्फ छोटन शुक्ला को तब कांग्रेस के प्रभावशाली नेता और मुजफ्फरपुर के विधायक रघुनाथ पांडेय के शिष्य माना जाता था। बिहार में 1995 के विधानसभा चुनाव के मद्देनजर छोटन ने इस बार केसरिया विधानसभा सीट से चुनावी मैदान में उतरने की ठानी।
छोटन शुक्ला उस दौरान आनंद मोहन के काफी करीबी थे और 1994 के लोकसभा उपचुनाव में वैशाली सीट पर उनकी पत्नी लवली आनंद को जिताने के लिए भूमिहार वोट जुटाने में उनकी अहम भूमिका मानी जाती थी। छोटन को उम्मीद थी कि आगामी विधानसभा चुनाव में उन्हें आनंद मोहन की बिहार पीपल्स पार्टी (बीपीपी) टिकट दे देगी। छोटन शुक्ला राजनीति में जगह बनाने की इसी मंशा के साथ राजपूतों और भूमिहारों को साथ लाने की कोशिश करते रहे।
गोपालगंज के डीएम जी. कृष्णय्या की हत्या के मामले और इससे आनंद मोहन का नाम कैसे जुड़ा, यह जानने के लिए हमें जानना होगा इस पूरे मामले के एक और चेहरे छोटन शुक्ला को। माफिया कौशलेंद्र शुक्ला उर्फ छोटन शुक्ला को तब कांग्रेस के प्रभावशाली नेता और मुजफ्फरपुर के विधायक रघुनाथ पांडेय के शिष्य माना जाता था। बिहार में 1995 के विधानसभा चुनाव के मद्देनजर छोटन ने इस बार केसरिया विधानसभा सीट से चुनावी मैदान में उतरने की ठानी।
छोटन शुक्ला उस दौरान आनंद मोहन के काफी करीबी थे और 1994 के लोकसभा उपचुनाव में वैशाली सीट पर उनकी पत्नी लवली आनंद को जिताने के लिए भूमिहार वोट जुटाने में उनकी अहम भूमिका मानी जाती थी। छोटन को उम्मीद थी कि आगामी विधानसभा चुनाव में उन्हें आनंद मोहन की बिहार पीपल्स पार्टी (बीपीपी) टिकट दे देगी। छोटन शुक्ला राजनीति में जगह बनाने की इसी मंशा के साथ राजपूतों और भूमिहारों को साथ लाने की कोशिश करते रहे।
4 दिसंबर 1994: माफिया छोटन शुक्ला की हत्या पर भड़की भीड़
4 दिसंबर के दिन छोटन जब उत्तरी चंपारण के केसरिया विधानसभा क्षेत्र से मुजफ्फरपुर स्थित अपने नया टोला निवास लौट रहे थे। उसी दौरान सदर पुलिस स्टेशन के करीब भगवानपुर चौक पर रात 10 बजे कुछ लोगों ने छोटन पर जबरदस्त गोलीबारी की। इस घटना में छोटन के साथ चार और लोगों की मौके पर ही मौत हो गई। घटना में एक व्यक्ति बाल-बाल बच निकला और इस घटना की सूचना छोटन के भाई अवधेश शुक्ला और भुटकुन शुक्ला को देने में सफल हुआ। यह दोनों ही छोटन के साथ जुड़े रहे थे और खुद भी बाहुबली थे। बाद में जब यह खबर उड़ी कि छोटन की हत्या में एक पुलिसकर्मी भी शामिल था तो छोटन के समर्थकों ने पूरे मुजफ्फरपुर में प्रदर्शन शुरू कर दिए। कई वाहनों में तोड़फोड़ हुई और ट्रैफिक जहां-तहां थम गया।
4 दिसंबर के दिन छोटन जब उत्तरी चंपारण के केसरिया विधानसभा क्षेत्र से मुजफ्फरपुर स्थित अपने नया टोला निवास लौट रहे थे। उसी दौरान सदर पुलिस स्टेशन के करीब भगवानपुर चौक पर रात 10 बजे कुछ लोगों ने छोटन पर जबरदस्त गोलीबारी की। इस घटना में छोटन के साथ चार और लोगों की मौके पर ही मौत हो गई। घटना में एक व्यक्ति बाल-बाल बच निकला और इस घटना की सूचना छोटन के भाई अवधेश शुक्ला और भुटकुन शुक्ला को देने में सफल हुआ। यह दोनों ही छोटन के साथ जुड़े रहे थे और खुद भी बाहुबली थे। बाद में जब यह खबर उड़ी कि छोटन की हत्या में एक पुलिसकर्मी भी शामिल था तो छोटन के समर्थकों ने पूरे मुजफ्फरपुर में प्रदर्शन शुरू कर दिए। कई वाहनों में तोड़फोड़ हुई और ट्रैफिक जहां-तहां थम गया।
5 दिसंबर 1994: छोटन का शव लेकर प्रदर्शन में जुटे उसके भाई
छोटन की हत्या के अगले दिन उसका भाई भुटकुन समर्थकों के साथ छोटन का शव लेकर पैदल ही वैशाली के लालगंज स्थित अपने पैतृक गांव रवाना हो गया। 35 किलोमीटर दूर गांव के रास्ते में एक के बाद एक लोग छोटन की हत्या के खिलाफ हो रहे प्रदर्शन से जुड़ते चले गए। आलम यह था कि दोपहर करीब 3 बजे मुजफ्फरपुर में हालात बेकाबू हो गए। इसी दौरान राजपूत नेता आनंद मोहन भी अपने समर्थकों के साथ इन प्रदर्शनों से जुड़े। उनके साथ स्थानीय नेता अरुण कुमार सिन्हा और अखलाक अहमद भी शामिल थे। इस दौरान आनंद मोहन ने छोटन की हत्या के पीछे राज्य सरकार और प्रशासन की नाकामी को जिम्मेदार ठहराया।
इन प्रदर्शनों को कवर कर रहे एक पत्रकार ने बाद में बताया था कि आनंद मोहन के भाषण के चलते प्रदर्शनकारियों में पुलिस और प्रशासन के खिलाफ गुस्सा और भड़क उठा। इसी बीच शाम करीब 4 बजे गोपालगंज के जिलाधिकारी- जी कृष्णय्या हाजीपुर में एक कार्यक्रम से गोपालगंज लौट रहे थे। इस घटना को लेकर उस दौर के अखबारों से जो जानकारी मिलती है, उसके मुताबिक जी कृष्णय्या एक सफेद रंग की लाल बत्ती लगी एम्बैसेडर कार में बैठकर आए थे। चूंकि यह प्रशासनिक कर्मी के आने का संकेत था, इसलिए आनंद मोहन के भाषण से भड़की भीड़ उनकी गाड़ी की तरफ बढ़ी और इस पर हमला कर दिया।
छोटन की हत्या के अगले दिन उसका भाई भुटकुन समर्थकों के साथ छोटन का शव लेकर पैदल ही वैशाली के लालगंज स्थित अपने पैतृक गांव रवाना हो गया। 35 किलोमीटर दूर गांव के रास्ते में एक के बाद एक लोग छोटन की हत्या के खिलाफ हो रहे प्रदर्शन से जुड़ते चले गए। आलम यह था कि दोपहर करीब 3 बजे मुजफ्फरपुर में हालात बेकाबू हो गए। इसी दौरान राजपूत नेता आनंद मोहन भी अपने समर्थकों के साथ इन प्रदर्शनों से जुड़े। उनके साथ स्थानीय नेता अरुण कुमार सिन्हा और अखलाक अहमद भी शामिल थे। इस दौरान आनंद मोहन ने छोटन की हत्या के पीछे राज्य सरकार और प्रशासन की नाकामी को जिम्मेदार ठहराया।
इन प्रदर्शनों को कवर कर रहे एक पत्रकार ने बाद में बताया था कि आनंद मोहन के भाषण के चलते प्रदर्शनकारियों में पुलिस और प्रशासन के खिलाफ गुस्सा और भड़क उठा। इसी बीच शाम करीब 4 बजे गोपालगंज के जिलाधिकारी- जी कृष्णय्या हाजीपुर में एक कार्यक्रम से गोपालगंज लौट रहे थे। इस घटना को लेकर उस दौर के अखबारों से जो जानकारी मिलती है, उसके मुताबिक जी कृष्णय्या एक सफेद रंग की लाल बत्ती लगी एम्बैसेडर कार में बैठकर आए थे। चूंकि यह प्रशासनिक कर्मी के आने का संकेत था, इसलिए आनंद मोहन के भाषण से भड़की भीड़ उनकी गाड़ी की तरफ बढ़ी और इस पर हमला कर दिया।
कैसे हुई जी. कृष्णय्या की हत्या, आनंद मोहन कैसे बना आरोपी?
जी कृष्णय्या की हत्या में भावावेश भीड़ का हमला ही जिम्मेदार नहीं था। कृष्णय्या के ड्राइवर दीपक कुमार ने कुछ समय पहले ही एक मीडिया समूह से बातचीत में उस पूरी घटना का जिक्र भी किया था। दीपक ने बताया था कि जब भीड़ डीएम की कार का घेराव करने के लिए जुटी, तब नेशनल हाईवे-28 पर कृष्णय्या का बॉडीगार्ड टीएम हेम्ब्रम उनसे बातचीत करने के लिए उतरा। हालांकि, भीड़ ने उस पर हमला बोल दिया। दीपक के मुताबिक, डीएम ने उससे कार को रोकने और बॉडीगार्ड का इंतजार करने के लिए कहा। हालांकि, ड्राइवर ने कार पीछे करना जारी रखा। दीपक के मुताबिक, कृष्णय्या भीड़ से बातचीत कर उन्हें समझाना और अपने बॉडीगार्ड को बचाना चाहते थे। इसके लिए ड्राइवर ने उन्हें मना भी किया। हालांकि, डीएम गाड़ी से उतर गए। ठीक इसी दौरान भीड़ ने उनकी एक नहीं सुनी और कॉलर से पकड़कर उन पर हमला कर दिया।
कृष्णय्या इस हमले के बीच भीड़ को यह बताने की कोशिश करते रहे कि वे उनके क्षेत्र के नहीं, बल्कि गोपालगंज के जिलाधिकारी हैं और सिर्फ आधिकारिक काम से इस सड़क से गुजर रहे थे। हालांकि, भड़की हुई भीड़ ने उनके साथ मारपीट जारी रखी। 2007 में निचली अदालत के आनंद मोहन को दोषी पाए जाने के फैसले के मुताबिक, भीड़ के हमले के दौरान ही आनंद मोहन भीड़ के बीच से आगे आया और भुटकुन शुक्ला से बोला- देखता क्या है भुटकुन, बदला ले लो।
जी कृष्णय्या की हत्या में भावावेश भीड़ का हमला ही जिम्मेदार नहीं था। कृष्णय्या के ड्राइवर दीपक कुमार ने कुछ समय पहले ही एक मीडिया समूह से बातचीत में उस पूरी घटना का जिक्र भी किया था। दीपक ने बताया था कि जब भीड़ डीएम की कार का घेराव करने के लिए जुटी, तब नेशनल हाईवे-28 पर कृष्णय्या का बॉडीगार्ड टीएम हेम्ब्रम उनसे बातचीत करने के लिए उतरा। हालांकि, भीड़ ने उस पर हमला बोल दिया। दीपक के मुताबिक, डीएम ने उससे कार को रोकने और बॉडीगार्ड का इंतजार करने के लिए कहा। हालांकि, ड्राइवर ने कार पीछे करना जारी रखा। दीपक के मुताबिक, कृष्णय्या भीड़ से बातचीत कर उन्हें समझाना और अपने बॉडीगार्ड को बचाना चाहते थे। इसके लिए ड्राइवर ने उन्हें मना भी किया। हालांकि, डीएम गाड़ी से उतर गए। ठीक इसी दौरान भीड़ ने उनकी एक नहीं सुनी और कॉलर से पकड़कर उन पर हमला कर दिया।
कृष्णय्या इस हमले के बीच भीड़ को यह बताने की कोशिश करते रहे कि वे उनके क्षेत्र के नहीं, बल्कि गोपालगंज के जिलाधिकारी हैं और सिर्फ आधिकारिक काम से इस सड़क से गुजर रहे थे। हालांकि, भड़की हुई भीड़ ने उनके साथ मारपीट जारी रखी। 2007 में निचली अदालत के आनंद मोहन को दोषी पाए जाने के फैसले के मुताबिक, भीड़ के हमले के दौरान ही आनंद मोहन भीड़ के बीच से आगे आया और भुटकुन शुक्ला से बोला- देखता क्या है भुटकुन, बदला ले लो।
आनंद मोहन का यह कहना था और भुटकुन ने अपनी पिस्तौल से कृष्णय्या को गोली मार दी। गोली डीएम के गले के पास लगी, लेकिन उनकी मौत नहीं हुई। इसके बाद भुटकुन ने कृष्णय्या को भीड़ को सौंप दिया। इसके बाद जिसे जो कुछ मिला, उसी से डीएम पर हमला बोल दिया। किसी ने उन्हें पत्थर से मारा तो किसी ने ईंट से उनके सिर पर हमला बोला। शाम करीब 4.30 बजे हालात यह थे कि भीड़ आपा खो चुकी थी। ठीक इसी दौरान आनंद मोहन को अंदाजा हो गया कि एक सरकारी अफसर की मौत का क्या असर हो सकता है। उसने तुरंत घटनास्थल छोड़ दिया। देखते ही देखते भीड़ भी तितर-बितर हो गई और छोटन शुक्ल के शव के साथ प्रदर्शनकारी लालगंज रवाना हो गए।
इस घटना के चश्मदीद रहे कृष्णय्या के बॉडीगार्ड ने बताया था कि भीड़ की पिटाई के बाद उन्होंने होश खो दिए थे। थोड़ी देर बाद जब उन्हें होश आया तो वे कार की तरफ भागे, जिसे भीड़ ने पलटा दिया था। डीएम कृष्णय्या उस कार से कुछ ही दूर खून से लथपथ पड़े थे। उनके चेहरे को बार-बार पत्थर से कुचला गया था। साथ ही गले के पास गोली भी लगी थी। पुलिस ने आनन-फानन में कृष्णय्या को मुजफ्फरपुर के श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज के अस्पताल पहुंचाया। यहां डॉक्टरों ने उन्हें लगी गोली निकाली। हालांकि, डीएम की एक घंटे बाद ही मौत हो गई।
इस घटना के चश्मदीद रहे कृष्णय्या के बॉडीगार्ड ने बताया था कि भीड़ की पिटाई के बाद उन्होंने होश खो दिए थे। थोड़ी देर बाद जब उन्हें होश आया तो वे कार की तरफ भागे, जिसे भीड़ ने पलटा दिया था। डीएम कृष्णय्या उस कार से कुछ ही दूर खून से लथपथ पड़े थे। उनके चेहरे को बार-बार पत्थर से कुचला गया था। साथ ही गले के पास गोली भी लगी थी। पुलिस ने आनन-फानन में कृष्णय्या को मुजफ्फरपुर के श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज के अस्पताल पहुंचाया। यहां डॉक्टरों ने उन्हें लगी गोली निकाली। हालांकि, डीएम की एक घंटे बाद ही मौत हो गई।
डीएम की हत्या के बाद मामले में क्या-क्या हुआ?
एक आईएएस अधिकारी की हत्या की घटना मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की जनता दल सरकार के लिए बड़ी कानूनी विफलता के तौर पर देखी जा रही थी। ऐसे में लालू ने खुद मुजफ्फरपुर पहुंचे। लालू यह जानकर चौंक गए थे कि डीएम को पहले गोली मारी गई और उसके बाद उनकी लिंचिंग हुई। हालांकि, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में इसकी पुष्टि होने के बाद लालू ने डीएम के हत्यारों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का आश्वासन दिया।
6 दिसंबर 1994: पुलिस की कार्रवाई शुरू, 36 लोगों पर केस दर्ज
मुजफ्फरपुर के सदर पुलिस थाने में 36 लोगों के खिलाफ केस दर्ज हुआ। आरोपियों में आनंद मोहन के अलावा उनकी पत्नी और भुटकुन का नाम शामिल था। इसके अलावा अखलाक और अरुण सिन्हा को भी आरोपी बनाया गया।
एक आईएएस अधिकारी की हत्या की घटना मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की जनता दल सरकार के लिए बड़ी कानूनी विफलता के तौर पर देखी जा रही थी। ऐसे में लालू ने खुद मुजफ्फरपुर पहुंचे। लालू यह जानकर चौंक गए थे कि डीएम को पहले गोली मारी गई और उसके बाद उनकी लिंचिंग हुई। हालांकि, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में इसकी पुष्टि होने के बाद लालू ने डीएम के हत्यारों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का आश्वासन दिया।
6 दिसंबर 1994: पुलिस की कार्रवाई शुरू, 36 लोगों पर केस दर्ज
मुजफ्फरपुर के सदर पुलिस थाने में 36 लोगों के खिलाफ केस दर्ज हुआ। आरोपियों में आनंद मोहन के अलावा उनकी पत्नी और भुटकुन का नाम शामिल था। इसके अलावा अखलाक और अरुण सिन्हा को भी आरोपी बनाया गया।