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बिहार के महाकांड: जब एक रात में जेल से फरार हुए 389 कैदी, पूरे शहर में एलान कर बम-बंदूक सब लूट ले गए नक्सली
Wed, 28 May 2025 08:38 AM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Wed, 28 May 2025 08:38 AM IST
सार
‘बिहार के महाकांड’ सीरीज की 10वीं कड़ी में आज जहानाबाद जेल ब्रेक कांड की बात करेंगे। 2005 में यह घटना कैसे हुई थी? 13 नवंबर 2005 की रात को कैसे जेल में बंद 658 कैदियों के भागने का रास्ता बना? इस पूरे प्रकरण ने कैसे जहानाबाद प्रशासन को कठघरे में खड़ा कर दिया था? आइये जानते हैं...
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बिहार के महाकांड: जहानाबाद जेल ब्रेक केस।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
बिहार में भागलपुर नरसंहार से लेकर बेलछी, लक्ष्मणपुर बाथे, बारा और ऐसे ही कई हत्याकांडों में सैकड़ों लोगों की जान गई। बिहार के इन महाकांडों की कहानी सिर्फ नरसंहार तक ही सीमित नहीं है। कुछ दूसरी घटनाओं ने भी बिहार को दहलाया है। ऐसी ही एक घटना थी- जहानाबाद का जेल ब्रेक कांड। यह घटना 2005 में तब हुई, जब पूरे बिहार में चुनाव के मद्देनजर सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद थी।
‘बिहार के महाकांड’ सीरीज की 10वीं कड़ी में आज जहानाबाद जेल ब्रेक कांड की बात करेंगे। 2005 में यह घटना कैसे हुई थी? 13 नवंबर 2005 की रात को कैसे जेल में बंद 658 कैदियों के भागने का रास्ता बना? इस पूरे प्रकरण ने कैसे जहानाबाद प्रशासन को कठघरे में खड़ा कर दिया था? आइये जानते हैं...
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‘बिहार के महाकांड’ सीरीज की 10वीं कड़ी में आज जहानाबाद जेल ब्रेक कांड की बात करेंगे। 2005 में यह घटना कैसे हुई थी? 13 नवंबर 2005 की रात को कैसे जेल में बंद 658 कैदियों के भागने का रास्ता बना? इस पूरे प्रकरण ने कैसे जहानाबाद प्रशासन को कठघरे में खड़ा कर दिया था? आइये जानते हैं...
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क्या है जहानाबाद जेल ब्रेक कांड की पृष्ठभूमि?
बिहार में 1967 के बाद से अति-वामपंथी संगठनों ने भूमिहीन मजदूरों को साथ लाकर जमींदारों के खिलाफ अभियान की शुरुआत कर दी। धीरे-धीरे यह अभियान हिंसक होने लगा। वामपंथी संगठनों के जवाब में जमींदारों ने उच्च जातियों के अलग-अलग समूहों का गठन किया। इसके साथ हिंसा और प्रतिहिंसा का खूनी दौर चल पड़ा। नतीजतन बिहार में 1970 से 1990 तक का दशक नरसंहार और अलग-अलग बर्बर हिंसक घटनाओं के लिए बदनाम हुआ। बिहार में इन तीन दशकों में प्रशासन नरसंहार-हत्याकांड की घटनाओं को रोकने में तो नाकाम रहा ही, साथ ही अधिकतर घटनाओं के अभियुक्तों को सजा दिलाने में भी नाकाम रहा। इससे प्रशासन के प्रति लोगों में गुस्सा बढ़ता गया।
बिहार में 1967 के बाद से अति-वामपंथी संगठनों ने भूमिहीन मजदूरों को साथ लाकर जमींदारों के खिलाफ अभियान की शुरुआत कर दी। धीरे-धीरे यह अभियान हिंसक होने लगा। वामपंथी संगठनों के जवाब में जमींदारों ने उच्च जातियों के अलग-अलग समूहों का गठन किया। इसके साथ हिंसा और प्रतिहिंसा का खूनी दौर चल पड़ा। नतीजतन बिहार में 1970 से 1990 तक का दशक नरसंहार और अलग-अलग बर्बर हिंसक घटनाओं के लिए बदनाम हुआ। बिहार में इन तीन दशकों में प्रशासन नरसंहार-हत्याकांड की घटनाओं को रोकने में तो नाकाम रहा ही, साथ ही अधिकतर घटनाओं के अभियुक्तों को सजा दिलाने में भी नाकाम रहा। इससे प्रशासन के प्रति लोगों में गुस्सा बढ़ता गया।
इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली मैगजीन में लेख जहानाबाद-1: जेल ब्रेक एंड द माओइस्ट मूवमेंट में बेला त्रिवेदी लिखती हैं कि 2005 में जहानाबाद में जो जेल ब्रेक कांड हुआ, उसकी वजह माओवादियों में प्रशासन के खिलाफ भड़का गुस्सा था। माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) का आरोप था कि जेल में बंद किए जाने के बाद जमींदारों के खिलाफ आवाज उठाने वाले उसके समर्थकों के साथ जातीय आधार पर भेदभाव होता। इतना ही नहीं उनके रहने की स्थितियां भी दयनीय थीं।
अब जानें- 13 नवंबर की उस रात क्या हुआ था?
13 नवंबर 2005 का दिन बिहार के जहानाबाद के लिए आम दिनों की तरह ही था। लेकिन, रात होते-होते बहुत कुछ बदल गया। क्योंकि इसी रात एक बहुत बड़ी साजिश को अंजाम दिया गया। ये साजिश जहानाबाद जेल ब्रेक की थी। इस साजिश के लिए उस वक्त को चुना गया जब बिहार में विधानसभा के चुनाव हो रहे थे। दो चरण की वोटिंग हो चुकी थी, जबकि दो और चरणों में मतदान होना बाकी था। ऐसे में राज्य की पुलिस पोलिंग ड्यूटी पर तैनात थी। इसका फायदा माओवादियों ने उठाया।
उस वक्त जहानाबाद के सांसद रहे गणेश प्रसाद सिंह ने सदन में कहा था “शाम साढे़ सात बजे से आठ बजे तक जहानाबाद शहर पर माओवादियों का कब्जा हो गया था।”
13 नवंबर 2005 का दिन बिहार के जहानाबाद के लिए आम दिनों की तरह ही था। लेकिन, रात होते-होते बहुत कुछ बदल गया। क्योंकि इसी रात एक बहुत बड़ी साजिश को अंजाम दिया गया। ये साजिश जहानाबाद जेल ब्रेक की थी। इस साजिश के लिए उस वक्त को चुना गया जब बिहार में विधानसभा के चुनाव हो रहे थे। दो चरण की वोटिंग हो चुकी थी, जबकि दो और चरणों में मतदान होना बाकी था। ऐसे में राज्य की पुलिस पोलिंग ड्यूटी पर तैनात थी। इसका फायदा माओवादियों ने उठाया।
उस वक्त जहानाबाद के सांसद रहे गणेश प्रसाद सिंह ने सदन में कहा था “शाम साढे़ सात बजे से आठ बजे तक जहानाबाद शहर पर माओवादियों का कब्जा हो गया था।”
जहानाबाद जेल और पुलिस लाइन के साथ शहर के अधिकतर हिस्सों की बिजली काट दी गई। इसके बाद माओवादी पुलिस की वर्दी में और पुलिस लिखी गाड़ियों में बैठकर जहानाबाद के केंद्र में पहुंचे। चूंकि उन्होंने पुलिस की वर्दी पहनी थी, इसलिए लोगों को शक नहीं हुआ। हालांकि, बाद में कुछ चश्मदीदों ने घटना को याद करते हुए बताया कि कई माओवादियों को वर्दी फिट नहीं आई थी। इतना ही नहीं कुछ माओवादी तो चप्पलें और नंगे पैर ही पहुंच गए थे। सभी छोटे-छोटे समूहों में बंट गए। इस दौरान स्थानीय लोगों को अपने घरों के अंदर रहने और खिड़की-दरवाजे बंद रखने के लिए कहा गया। माओवादियों ने इसे आम लोगों के खिलाफ नहीं, बल्कि प्रशासन से जंग करार दिया।
संसद में तत्कालीन केंद्रीय गृह राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जयसवाल ने जो बयान दिया था, उसके मुताबिक, 300 से 400 नक्सलियों ने रात करीब 9 बजे एक बार में सीआरपीएफ कैंप, पुलिस स्टेशन, पुलिस लाइन्स और जहानाबाद उप-संभागीय जेल पर हमला बोल दिया। वहीं, सदन में इस मुद्द पर बहस के दौरान ही जहानाबाद सांसद गणेश प्रसाद सिंह ने कहा, “इनकी संख्या तीन-चार सौ नहीं, बल्कि दो हजार थी। ये सभी हथियारों, राइफलों, बमों से लैस थे। वे सीधे-सीधे सरकार और पुलिस प्रशासन को चुनौती दे रहे थे। वे जीप में बैठकर माइक से प्रचार कर रहे थे कि यदि कोई आदमी सड़क पर बाहर निकला, तो उसे बुरा अंजाम भुगतना पड़ेगा, उसे गोलियों से भून दिया जाएगा, बम से उड़ा दिया जाएगा। मैंने वहां देखा है, ऐसी मुख्य सड़क पर जहां कचहरी चौक है, जहां न्यायालय है, उस चौक पर बहुत बड़ा बम रखा हुआ है।”
जहानाबाद जेल पर हमला
- उस रात जहानाबाद जेल की सुरक्षा के हाल भी खस्ता थे। 600 से ज्यादा कैदियों की जिम्मेदारी सिर्फ आठ सुरक्षाकर्मियों पर थी। इनमें तीन पुलिस कॉन्स्टेबल और पांच होम गार्ड थे। माओवादियों ने जेल पर हमला बोला और 389 कैदी भाग निकले। इनमें से कई माओवादी कार्यकर्ता थे। इनमें से भाकपा (माओवादी) का एक बड़ा नेता अजय कानु भी शामिल था।
- हमलावरों ने इस दौरान जेल के हथियारखाने के गार्ड को घायल कर दिया और सुरक्षाकर्मी को मार दिया। इसके अलावा रणवीर सेना से जुड़ा बीनू शर्मा उर्फ बड़े शर्मा और एक अन्य कैदी भी मारा गया। बड़े शर्मा तब जहानाबाद जेल में 'दादागिरी' की वजह से कई कैदियों के निशाने पर था। जहानाबाद में इस पूरे कांड को अंजाम देने के बाद माओवादियों को भाग निकलने में कोई खास दिक्कत नहीं आई।
आखिरकार 14 नवंबर की सुबह 11 बजे जहानाबाद में सुरक्षाबलों ने नियंत्रण स्थापित किया। इससे पहले तक सैकड़ों की संख्या में लोग सुबह-सुबह ही जेल के हालात देखने अंदर तक जा चुके थे। एक व्यक्ति ने मीडिया समूह से बातचीत में यह तक कहा था- "सुबह में पूरे जहानाबाद की जनता जेल के अंदर थी और कैदी बाहर।"
राज्य सरकार के मुताबिक, बाद में होम गार्ड्स की आठ राइफल और कुछ गोला-बारूद भी लूटे जाने की बात सामने आई। कुल-मिलाकर दो जेलकर्मियों, दो रणवीर सेना के कार्यकर्ताओं और दो नक्सलियों के अलावा एक आम व्यक्ति की इस हमले में मौत हुई।
राज्य सरकार के मुताबिक, बाद में होम गार्ड्स की आठ राइफल और कुछ गोला-बारूद भी लूटे जाने की बात सामने आई। कुल-मिलाकर दो जेलकर्मियों, दो रणवीर सेना के कार्यकर्ताओं और दो नक्सलियों के अलावा एक आम व्यक्ति की इस हमले में मौत हुई।
जहानाबाद जेल ब्रेक कांड के बाद क्या हुआ?
जहानाबाद में जेल ब्रेक कांड की गूंज बिहार ही नहीं केंद्र सरकार तक सुनाई दी। विपक्ष ने राजद के शासनकाल में बिहार की कानून व्यवस्था का मुद्दा जोर-शोर से उठाया। इसके बाद संसद में सरकार को बयान जारी करना पड़ा। गृह राज्य मंत्री ने इस दौरान बताया कि राज्य सरकार के पास नक्सलियों के मूवमेंट से जुड़ी खुफिया जानकारी मौजूद थी। प्रशासन के पास नदौल रेलवे स्टेशन, काको पुलिस स्टेशन और पुलिसबल पर हमले से जुड़े इनपुट्स भी दिए गए थे। हालांकि, सुरक्षा व्यवस्था बनाए न रख पाने की वजह से जहानाबाद के पुलिस सुपरिटेंडेंट सुनील कुमार को सस्पेंड कर दिया गया। साथ ही केंद्र सरकार ने अर्धसैनिक बलों के सैकड़ों जवानों को बिहार में तैनात किया।
जेल ब्रेक के बाद सुरक्षा व्यवस्था और अराजकता के आरोपों में घिरा प्रशासन सक्रिय हुआ। जहानाबाद और आसपास के इलाकों में घोषणा कराई गई कि जेल से भागे जो भी कैदी तीन दिन में वापस आ जाएंगे, उन पर जेल से फरारी का केस नहीं होगा। इसके चलते दिसंबर तक 389 भागे हुए कैदियों में से करीब 70 फीसदी यानी 269 वापस आ गए। इनमें से कई कैदी छोटे-मोटे अपराधों के मामले में बंद थे। उनका कहना था कि वह इसलिए भागे, क्योंकि उन्हें लगा कि जेल को डायनामाइट से उड़ा दिया जाएगा।
जहानाबाद में जेल ब्रेक कांड की गूंज बिहार ही नहीं केंद्र सरकार तक सुनाई दी। विपक्ष ने राजद के शासनकाल में बिहार की कानून व्यवस्था का मुद्दा जोर-शोर से उठाया। इसके बाद संसद में सरकार को बयान जारी करना पड़ा। गृह राज्य मंत्री ने इस दौरान बताया कि राज्य सरकार के पास नक्सलियों के मूवमेंट से जुड़ी खुफिया जानकारी मौजूद थी। प्रशासन के पास नदौल रेलवे स्टेशन, काको पुलिस स्टेशन और पुलिसबल पर हमले से जुड़े इनपुट्स भी दिए गए थे। हालांकि, सुरक्षा व्यवस्था बनाए न रख पाने की वजह से जहानाबाद के पुलिस सुपरिटेंडेंट सुनील कुमार को सस्पेंड कर दिया गया। साथ ही केंद्र सरकार ने अर्धसैनिक बलों के सैकड़ों जवानों को बिहार में तैनात किया।
जेल ब्रेक के बाद सुरक्षा व्यवस्था और अराजकता के आरोपों में घिरा प्रशासन सक्रिय हुआ। जहानाबाद और आसपास के इलाकों में घोषणा कराई गई कि जेल से भागे जो भी कैदी तीन दिन में वापस आ जाएंगे, उन पर जेल से फरारी का केस नहीं होगा। इसके चलते दिसंबर तक 389 भागे हुए कैदियों में से करीब 70 फीसदी यानी 269 वापस आ गए। इनमें से कई कैदी छोटे-मोटे अपराधों के मामले में बंद थे। उनका कहना था कि वह इसलिए भागे, क्योंकि उन्हें लगा कि जेल को डायनामाइट से उड़ा दिया जाएगा।
हालांकि, जहानाबाद जेल में तब गंभीर आपराधिक मामलों में बंद रहे 60-70 कैदी वापस नहीं लौटे। इनमें बिंदु सिंह और चुन्नू शर्मा गैंग के कई हत्यारोपी शामिल थे। इसके अलावा माओवादी संगठन और रणवीर सेना के लोग भी वापस नहीं आए।