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बिहार के महाकांड: जब साइकिल की तीली से आरोपी की आंख फोड़ती थी पुलिस, फूटी आंखों में डाल दिया जाता था तेजाब

Wed, 14 May 2025 07:37 AM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Wed, 14 May 2025 07:37 AM IST
सार

'बिहार के महाकांड' सीरीज की आठवीं कड़ी में आज बात भागलपुर के अंखफोड़वा कांड की। वो कांड जिसमें पुलिस ने आरोपियों की आंखें फोड़ उसमें तेजाब डाल दिया। महीनों चली इस क्रूरता को 'ऑपरेशन गंगाजल' नाम दिया गया। भागलपुर अंखफोड़वा कांड कैसे अंजाम दिया गया? ये दुनिया के सामने कैसे आया? इसके जिम्मेदारों का क्या हुआ? अदालतों में इस मामले का क्या हुआ? आइये जानते हैं...

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Bihar ke Mahakand Assembly Election 2025 Bhagalpur blindings operation gangajal
अंखफोड़वा कांड - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

नई दिल्ली बिहार की एक जेल में कुछ पुलिसवाले जेल में बंद कैदियों को गुस्से में मारते-पीटते हैं। इसके बाद उनकी आंखों को पेचकस और धारदार औजारों से फोड़ देते हैं। एक पुलिसकर्मी पुलिस जीप से एसिड लेकर आता है और जिनकी आंखें फोड़ी गई, उनकी आंखों में ही तेजाब डाल देता है।
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ये लाइनें पढ़कर आप कहेंगे कि यह तो 2003 में आई फिल्म गंगाजल के दृश्य हैं। ये सबकुछ 1979-80 में भागलपुर में असल में हुआ था। फिल्मी कहानी में तो घटना के शिकार सिर्फ आपराधिक प्रवृत्ति के लोग दिखाए गए थे, असल दास्तां में पुलिस की बर्बरता के शिकार सिर्फ बड़े अपराधी नहीं, बल्कि छोटे-मोटे जुर्म के आरोपी भी बने थे। इस पूरे कांड को भागलपुर अंखफोड़वा कांड कहते हैं।  
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आखिर भागलपुर अंखफोड़वा कांड क्या था? इसको कैसे अंजाम दिया गया? अंखफोड़वा कांड दुनिया के सामने कैसे आया? इसके जिम्मेदारों का क्या हुआ? अदालतों में इस मामले का क्या हुआ? आइये जानते हैं...
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कैसे हुई अंखफोड़वा कांड की शुरुआत?
1970 के दशक के अंत तक बिहार का भागलपुर जिला अपराध से बुरी तरह प्रभावित था। पुलिस को अपराधियों पर लगाम लगाने में खासी मुश्किलें आ रही थीं। ऐसे में पुलिस महकमे में कैदियों को ऐसी सजा देने की सुगबुगाहट उठने लगी, जिससे कि अपराधियों के मन में कानून का खौफ व्याप्त हो जाए। इसी दौरान आरोपियों की आंखें फोड़ने का सिलसिला शुरू हुआ।  

आर्थर बॉनर की किताब- अवर्टिंग द एपोकैलिप्स: सोशल मूवमेंट्स इन इंडिया टुडे (Averting the Apocalypse: Social Movements in India Today)  के 28वें अध्याय बिहार: ब्लाइंडिंग्स एंड मसैकर ( Bihar: Blindings and Massacre) भागलपुर अंखफोड़वा कांड पर आधारित है। इसी अध्याय में लिखा गया है- "5 जुलाई 1980 की रात को भागलपुर पुलिस को अनिल यादव नाम के एक शख्स की जानकारी मिली, जो कि हत्या और चोरी के मामले में वॉन्टेड था। पुलिस को पता चला कि वह पास के ही गांव में एक शादी में शामिल होने आ सकता है। पुलिस ने चुस्ती दिखाते हुए उसे गिरफ्तार कर लिया और सबूर पुलिस स्टेशन लाए। पुलिस के मुताबिक, अनिल ने अपने ऊपर लगे आरोप कबूल लिए। थाने में थाना इंचार्ज मोहम्मद वसीमुद्दीन ने अपने लोगों को अनिल यादव के हाथ-पैर बांधने का आदेश दिया। इसके बाद वसीमुद्दीन ने एक लोहे के नुकीले हथियार से उसकी आंखों पर वार कर दिए। वसीमुद्दीन ने आरोपी की आंखों में तेजाब डालकर यह सुनिश्चित किया कि उसको कुछ भी न दिखे और वो पूरी तरह अंधा हो जाए। इस घटना को सब-इंस्पेक्टर बिंदा प्रसाद और भागलपुर सदर पुलिस थाने के इंस्पेक्टर मनकेश्वर सिंह के सामने अंजाम दिया गया।"
 

सबूर थाने लाए गए नौ लोगों में से दो आरोपियों- शंकर टंटी और अनिरुद्ध टंटी को पुलिस शंकर के घर लेकर गई। हालांकि, जब पुलिस को खोजबीन के दौरान कुछ नहीं मिला तो पुलिसवालों ने शंकर से 500 रुपये रिश्वत के तौर पर देने की मांग की। पुलिसकर्मियों ने धमकी दी कि अगर ऐसा नहीं होता तो उसे अंधा कर दिया जाएगा। शंकर के पास पैसे नहीं थे, लेकिन अनिरुद्ध की पत्नी ने किसी तरह 150 रुपये का जुगाड़ कर लिया। इसके बाद शंकर और अनिरुद्ध को सबूर स्टेशन वापस लाया गया, जहां पैसा न देने के लिए शंकर की आंखें नुकीले हथियार के जरिए फोड़ दीं गईं। बिंदा प्रसाद ने उसकी आंखों में तेजाब डाल दिया। इसके बाद अंधे किए गए दो लोगों को गिरफ्तार किए गए बाकी आरोपियों के साथ चोरी की साजिश रचने के आरोप में भागलपुर की सेंट्रल जेल में भेज दिया गया। 


 एक और घटना का जिक्र करते हुए आर्थर बॉनर लिखते हैं, “24 जुलाई 1980 को नौ लोगों को चोरी की साजिश रचने के आरोपों में सबूर पुलिस थाने लाया गया। दो दिन बाद इनमें से एक व्यक्ति लखी महतो को एक अलग कमरे में ले जाया गया और लाठियों से पीटा गया। अगली सुबह उसे हाथ-पैर बांधकर बाहर डाल दिया गया और एक बार फिर मोहम्मद वसीमुद्दीन ने उसकी आंख फोड़ दी। इस बार वसीमुद्दीन के साथ भागलपुर सदर थाने के इंस्पेक्टर मनकेश्वर सिंह भी थे, जिन्होंने नुकीले हथियार से पहले लखी की आंखें फोड़ीं। सब इंस्पेक्टर बिंदा प्रसाद ने बाद में लखी की आंखों में तेजाब डाल दिया।  

ऊपर बताई गई घटनाएं  सिर्फ कुछ उदाहरण हैं। इस मामले की जब सच्चाई सामने आई तो पता चला कि ऐसे 30 से ज्यादा लोग तो सिर्फ भागलपुर सेंट्रल जेल में ही अंधे किए जा चुके थे। पुलिस ने इस क्रूर अभियान को ‘ऑपरेशन गंगाजल’ नाम दिया था। 



दुनिया को कैसे पता चला भागलपुर अंखफोड़वा कांड?
पूर्व केंद्रीय मंत्री और पत्रकार रहे अरुण शौरी अपनी किताब- द कमिश्नर फॉर लॉस्ट कॉजेज (The Commissioner For Lost Causes)  में लिखते हैं, "इस पूरे मामले का खुलासा इंडियन एक्सप्रेस के बिहार ब्यूरो के पत्रकार अरुण सिन्हा ने किया। नवंबर 1980 में सिन्हा को जानकारी मिली कि भागलपुर सेंट्रल जेल में कुछ कैदियों की पुलिसवालों और आम लोगों ने आंखें फोड़ दी हैं। उन्होंने जब इस मामले में आईजी (जेल) से पूछा तो उन्होंने सवालों पर ध्यान ही नहीं दिया। इसके बाद वो भागलपुर निकल गए। भागलपुर में जेल सुपरिटेंडेंट बच्चू लाल दास ने उन्हें बताया कि भागलपुर के अलग-अलग थानों में आरोपियों की आंखें फोड़ी गईं और उनमें तेजाब डाला गया। दास ने इससे जुड़े कई दस्तावेज और तस्वीरें भी मुहैया कराईं। दास ने कई पीड़ितों से भी उन्हें मिलवाया। यही बच्चू लाल दास बाद में इस पुलिसिया क्रूरता के खिलाफ कोर्ट भी गए। 

दूसरी ओर भागलपुर के पुलिस स्टेशनों के पुलिसकर्मियों का कहना था कि आरोपियों को ग्रामीणों की 'भीड़' ने अंधा किया है। आरोपी पुलिस स्टेशन लाए जाने से पहले ही अंधे किए जा चुके थे। हालांकि, पुलिसकर्मियों की ओर से कहा गया कि जो घटनाएं हुईं, वह हत्यारों, चोरों और दुष्कर्मियों के साथ हुईं, इसलिए उनके लिए आंसू बहाने का कोई मतलब नहीं है।  

भागलपुर अंखफोड़वा कांड की रिपोर्ट अखबार में प्रकाशित होते ही बिहार में हड़कंप मच गया। 22 नवंबर 1980 को अखबार में पीड़ितों की तस्वीरों के साथ घटना पर उन लोगों के बयान भी छपे, जो इस मामले से कहीं न कहीं जुड़े रहे। लेख का शीर्षक था- 'आइज पंक्चर्ड ट्वाइस टू एनश्योर ब्लाइंडनेस'।  

कैसे महीनों चलता रहा अंखफोड़वा कांड?
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई के बाद जो फैसले सुनाए, उनसे पता चलता है कि आरोपियों को नुकीले हथियार (साइकिल की तीली, सूजा और नाई द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाले नेल कटर जैसे हथियार) से पहले अंधा करने और फिर उनकी आंखों में तेजाब डालने की घटनाएं एक अभियान की तरह चल रही थीं। कुछ घटनाएं ऐसी थीं कि पहले पीड़ितों को पकड़कर थाने लाया जाता था। यहां पुलिसकर्मी उन्हें बांधकर बर्बरता से पीटते थे और फिर कुछ पुलिसवाले उनके हाथ-पैर कस के पकड़ते थे। इसके बाद एक पुलिसवाला आरोपियों की आंखों को टकवा (बोरा सिलने वाला सूजा) से फोड़ देता था। इसके बाद जेल में एक 'डॉक्टर साहब' को बुलाया जाता था, जो उनकी फूटी आंखों में एसिड का इंजेक्शन लगा देता था, ताकि पीड़ितों को पूरी तरह दिखना बंद हो जाए। 

इस दौरान करीब सात से ज्यादा पीड़ितों ने यह खुलासा किया कि जब पुलिसकर्मियों ने उनकी आंख फोड़ दी तो 'डॉक्टर साहब' ने उनसे पूछा कि क्या उन्हें कुछ दिखाई पड़ रहा है। इन आरोपियों को जब लगा कि शायद डॉक्टर साहब मानवीयता के नाते उनकी आंखों का इलाज कर सकते हैं, तो यह लोग हां में जवाब देते थे। लेकिन डरावनी बात यह है कि डॉक्टर साहब असल में पीड़ितों को पूरी तरह अंधा करने आते थे। बाद में जो लोग पुलिस के हमले के बावजूद अंधे होने से बच जाते थे, उनका अंधा होना 'डॉक्टर साहब' आंखों में एसिड डालकर सुनिश्चित कर देते थे। 

निचले स्तर से उच्च स्तर तक छिपाई गई घटना, डॉक्टरों तक ने नहीं किया पीड़ितों का इलाज
बताया जाता है कि जुलाई 1980 में डीआईजी पूर्वी रेंज गजेंद्र नारायण ने भागलपुर में अपराध कम करने के तरीके सुझाने के लिए सीआईडी के डीजी एमके झा से एक सीआईडी इंस्पेक्टर भेजने के लिए कहा। सीआईडी इंस्पेक्टर ने अपनी रिपोर्ट में पुलिस के आंख फोड़ने के अभियान को बर्बर और योजनाबद्ध करार दिया और इसे तुरंत रोके जाने की मांग की। उन्होंने इस बारे में डीआईजी के साथ-साथ सीआईडी के डीजी तक को रिपोर्ट भेजी। हालांकि, कार्रवाई करने की जगह उन्हें अपनी रिपोर्ट बदलने के लिए कहा गया। यहां तक कि उनका भागलपुर जाने के लिए दिया जाने वाला यात्रा भत्ता तक रोक दिया गया।  

 

राजनीतिक गलियारों में मामले का क्या हुआ?
अखबार के खुलासे के बाद बिहार से दिल्ली तक सियासी कोहराम मच गया। विपक्ष के हंगामे के बाद केंद्र सरकार ने दोनों सदनों में इस पर चर्चा कराई। खुद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस मुद्दे पर जवाब दिया- "मुझे विश्वास नहीं होता कि ऐसा कुछ भी हो सकता है।" देश के तत्कालीन गृह मंत्री ज्ञानी जैल सिंह ने संसद से कहा कि इस मामले को ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर पेश न करें, इससे विदेश में भारत की छवि पर असर पड़ेगा। वहीं, मंत्री वसंत साठे समेत सत्तापक्ष के कई नेताओं ने कहा कि इस मामले को उठाकर हम पुलिसवालों के हौसले को तोड़ रहे हैं। 

अदालतों में मामले का क्या हुआ?
1. निचली अदालत
  • जुलाई 1980 के बाद 11 अंडरट्रायल कैदियों ने सत्र न्यायालय से आंख फोड़े जाने की घटना की जांच के लिए याचिका लगाई। 
  • 9 अक्तूबर 1980 को जेलों में अंधे किए गए 10 कैदियों ने आपराधिक न्यायालय में एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeus Corpus) दायर की और खुद की कोर्ट में पेशी की मांग की। 
  • इन कैदियों ने अपनी जांच मेडिकल बोर्ड से कराने, हर्जाने और बर्बरता करने वाले पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई की मांग की। 
  • सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि कई पीड़ितों को गिरफ्तारी के 24 घंटे के अंदर मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया गया, जो कि संविधान के अनुच्छेद 22 का सीधा उल्लंघन था। 
  • जिन लोगों को पहली बार मजिस्ट्रेट के सामने लाया गया, उन्हें आगे की सुनवाइयों में पेश नहीं किया गया।




सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले की 1980 से 1983 तक सुनवाई हुई। सर्वोच्च न्यायालय ने इससे जुड़े कुल सात फैसले दिए। इनमें जेल में बंद कैदियों को कानूनी सहायता का अधिकार, मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए मुआवजा और न्यायिक जवाबदेही और पुलिस सुधारों से जुड़े आदेश शामिल थे।
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