Tejashwi Yadav Election Results 2020: जानिए कैसे तेजस्वी ने बिहार चुनाव में लगाया चिड़िया की एक आंख पर निशाना?
- जगदानंद सिंह, प्रो. नवल किशोर, चितरंगजन गगन, प्रो. चंद्रवंशी ने आसान की राह
- संजय यादव, राहुल यादव, आलोक मेहता और उर्मिल ने की मेहनत रंग लाई
- बड़े भाई चिराग, नीतीश के अहंकार और भाजपा की कोशिश ने दिखाई मंजिल
विस्तार
Tejashwi Yadav Bihar Election 2020: चुनाव की अधिसूचना जारी होने से पहले और पूर्व केंद्रीय मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह की नाराजगी सामने आने के बाद राजनीति के पंडितों को बिहार की राजनीति में तेजस्वी यादव के लिए बंटाढार ही नजर आ रहा था। यह वह दौर था जब महागठबंधन के सहयोगी(रालोसपा के उपेन्द्र कुशवाहा, वीआईपी के मुकेश साहनी, हम के जीतन राम मांझी) तेजस्वी को आईना दिखाने में जुट गए थे।
लेकिन दूसरे खेमे में भी खिचड़ी पक रही थी। दूसरी तरफ प्रो. नवल किशोर, जगदाबाबू, चितरंजन राम गगन, प्रो. राम बली चंद्रवंशी दूरगामी योजना पर काम कर रहे थे। सबकी कोशिश अर्जुन (तेजस्वी यादव) के निशाने को चिड़िया की एक आंख पर ही टिकाने तक सीमित थी।
केवल चिड़िया की एक आंख देखो तेजस्वी, आगे बढ़ो
74 साल के राजनीतिज्ञ बाबू जगदानंद सिंह लालू प्रसाद यादव के विश्वासपात्र नेताओं में हैं। राष्ट्रीय जनता दल, बिहार की कमान संभालने के बाद जगदाबाबू ने तय किया कि उन्हें राजद का केवल एक चेहरा (तेजस्वी) खड़ा करना है। जगदाबाबू की इस सोच पर लालू प्रसाद यादव की भी मुहर लग गई।
इसके बाद पूरे चुनाव प्रचार अभियान की जिम्मेदारी केवल मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करके तेजस्वी यादव के कंधे पर डाल दी। पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी, वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी, राज्यसभा सदस्य मीसा भारती, प्रो. मनोज झा समेत तमाम बड़े नेता पर्दे के पीछे की बड़ी भूमिका में चले गए। सभी को पार्टी के प्रचार से दूर रखा गया। रणनीतिकारों को लग रहा था कि प्रचार के दौरान खड़ा हुआ विरोधाभास पूरे अभियान में बट्टा लगा देगा।
प्रो. रामबली चंद्रवंशी पटना के बीएन कॉलेज से जुड़े हैं। प्रो. चंद्रवंशी ने तेजस्वी और राजद को सत्ता में लाने के लिए जमीनी सोशल इंजीनियरिंग को आगे बढ़ाया। वह बिहार में जगह-जगह विभिन्न पिछड़ी, अति पिछड़ी जातियों की एकजुटता पर काम कर रहे थे।
बताते हैं कि बिहार की 126-127 जातियों को उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल के साथ जोड़ने में अहम भूमिका निभाई। प्रो. नवल किशोर ने बिहार के आर्थिक आंकड़ों पर ध्यान केंद्रित किया तो चितरंजन गगन ने राजद का भावी एजेंडा तय करने में अहम भूमिका निभाई।
मीडिया, सोशल मीडिया प्रबंधन से लेकर बूथ प्रबंधन तक
राहुल यादव तेजस्वी यादव के साथ साये की तरह रहे। 2012 से ही तेजस्वी यादव के दोस्त संजय भी उनके साथ हैं। संजय ने 2015 के चुनाव में भी बड़ी भूमिका निभाई थी। इस चुनाव के बाद से ही तेजस्वी ने पार्टी अपनी टीम को भी आगे बढ़ाना शुरू कर दिया था।
टीम तेजस्वी ने अपना पूरा ध्यान मीडिया मैनेजमेंट पर फोकस किया। तेजस्वी के राजनीतिक एजेंडा तय करने में साथ दिया। सोशल मीडिया के बेहतर इस्तेमाल की रणनीति बनी और वीडियो वायरल करने जैसे तरीकों पर काम हुआ। बताते हैं टीम तेजस्वी के लिए उस समय खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा, जिस दिन 10 लाख रोजगार देने के वादे पर नीतीश कुमार ने कटाक्ष किया।
उसके बाद भाजपा ने 19 लाख लोगों को रोजगार देने का वादा कर दिया। रणनीति में यह भी तय किया गया कि पूरे चुनाव प्रचार में तेजस्वी एनडीए और खासकर नीतीश कुमार के टारगेट में नहीं उलझेंगे, बल्कि संक्षिप्त भाषण के जरिए उन्हें अपने प्रचार अभियान में उलझाकर रखेंगे।
अशोक मेहता जैसे रणनीतिकारों की सलाह इसमें काफी महत्वपूर्ण रही। सामाजिक समीकरण पर बारीक नजर रखने वाले प्रो मनोज झा भी इसके लिए लगातार पटना में कैंप किए। राजद महिला विंग की प्रमुख उर्मिला ठाकुर का पूरा ध्यान महिलाओं के मुद्दे पर केंद्रित था।
निराला यादव, मदन शर्मा, निर्भय अंबेडकर भी रहे खास सहयोगी
राष्ट्रीय जनता दल को सत्ता में लाने के लिए युवाओं की गोलबंदी जरूरी थी। टीम तोजस्वी ने इस पर खास तरीके से फोकस किया। तेजस्वी के साथ चुनाव प्रचार के दौरान रहने वाले राहुल यादव, निराला यादव, लगातार नजर रखकर अगली रणनीति का इनपुट देने में मदन शर्मा और निर्भय अंबेडकर ने खासी बड़ी भूमिका निभाई।
बताते हैं इस पूरे चुनाव प्रचार अभियान में लालू प्रसाद यादव के परिवार ने बड़ी भूमिका निभाई। सभी ने लक्ष्य को साधने के लिए खुद को केवल पर्दे के पीछे तक सीमित रखा। टीम तेजस्वी और रणनीतिकारों को सबसे बड़ा खतरा भाई तेज प्रताप और उनके अलबेले अंदाज से नजर आ रहा था लेकिन पूरे चुनाव प्रचार में तेज प्रताप ने गजब का अनुशासन और सूझ-बूझ दिखाई।
तेजस्वी ने भी लिया संयम से काम
टीम तेजस्वी ने कहा कि आम तौर पर वह शांति से समझने का प्रयास करते हैं और इसके बाद अपने अंदाज में मुद्दों को उठाते हैं। फिर उनके धैर्य को लेकर कुछ संशय हो रहा था। तेजस्वी से पिछले आठ साल से जुड़े सूत्र का कहना है कि उन्हें लग रहा था दूसरे चरण का मतदान आते-आते बड़ी गड़बड़ हो सकती है, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।
जैसे-जैसे प्रचार चढ़ता गया, तेजस्वी न केवल अपनी जनसभा की संख्या बढ़ाते गए, बल्कि कूल डूड होते गए। तेजस्वी ने वाम दलों और कांग्रेस के प्रत्याशियों के प्रचार में भी समय दिया और बेहतर तालमेल दिखाया।
चिराग, नीतीश और भाजपा ने भी बनाए जीत के समीकरण
टीम तेजस्वी के आंकड़ेबाज और रणनीतिकारों के चेहरे पर दो घटनाओं ने पूरी रौनक ला दी। पहली घटना थी, चिराग का बिहार में एनडीए से अलग होना। जद(यू) के खिलाफ प्रत्याशी खड़ा करने और भाजपा को समर्थन देने का निर्णय। पार्टी के रणनीतिकार बताते हैं कि जद(यू) के चुनाव में पिटने का अर्थ राजद का उठना था।
इसका परोक्ष फायदा भाजपा को जाता दिखाई दे रहा था, लेकिन जब लोजपा ने भाजपा और संघ से जुड़े नेताओं को जद(यू) के खिलाफ उतारना शुरू किया तो उम्मीद काफी बढ़ गई। पार्टी के पूर्व सांसद कहते हैं कि भाजपा केवल राष्ट्रवाद, कश्मीर जैसे मुद्दे पर चुनाव लड़ रही थी। बिहार के मुद्दों पर नहीं।
वह बिहार में लालू यादव के जंगलराज और भ्रष्टाचार को याद कर रही थी, लेकिन लोगों से जुड़े मुद्दे नहीं उठा रही थी। दूसरी तरफ चिराग को लेकर भ्रम की स्थिति पैदा करने में भाजपा के नेताओं ने बड़ी सहायता की। बताते हैं एनडीए में चुनाव प्रचार में तालमेल के अभाव ने राजद को वॉकओवर दे दिया।
नीतीश का अहंकार और चिराग का फैसला
राष्ट्रीय जनता दल में लालू प्रसाद यादव के दौर से राजनीति समझने वाले वरिष्ठ नेता फोन पर काफी चुटकियों भरा जवाब देते हैं। पूर्व राज्यसभा सदस्य का कहना है कि रालोसपा के नेता उपेन्द्र कुशवाहा और हम के जीतनराम माझी का स्वभाव चुनाव के कुछ महीने पहले से समझ में नहीं आ रहा था।
उपेन्द्र से तेजस्वी के समीकरण भी बिगड़ रहे थे। दोनों नेताओं ने समय देखकर साथ छोड़ दिया। दूसरी तरफ वीआईपी के मुकेश साहनी के भाजपा के संपर्क में होने की सूचना थी, लेकिन नीतीश कुमार के अहंकार ने सबकुछ बदलकर रख दिया।