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Seat Ka Samikaran: चकाई सीट पर रहा है दो परिवारों का दबदबा, पार्टियां बदलीं पर 15 में से 13 जीत इन्हीं के नाम

Wed, 09 Jul 2025 07:03 AM IST
ज्योति भास्कर इलेक्शन डेस्क, अमर उजाला।
इलेक्शन डेस्क, अमर उजाला। Published by: ज्योति भास्कर Updated Wed, 09 Jul 2025 07:03 AM IST
सार

‘सीट का समीकरण’ सीरीज की पंदरहवी कड़ी में आज हम आपको चकाई विधानसभा सीट के बारे में बताएंगे। इस सीट मुख्य तौर पर दो परिवारों की लड़ाई देखने को नजर आती है। 1977 से अबतक सीट पर केवल दो परिवारों के बीच ही सीट का संघर्ष देखने को मिला है।

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बिहार चुनाव 2025 - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बिहार विधानसभा चुनाव से पहले सियासी उठापटक जारी है। आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला भी शुरू हो चुका है। राज्य में हो रही आपराधिक वारदातों पर भी सियासत हो रही है। इस चुनावी साल में अमर उजाला अलग-अलग सीरीज के जरिए बिहार की सियासत के बारे में बता रहा है। इसी से जुड़ी ‘सीट का समीकरण’ सीरीज की 15वीं कड़ी में आज हम चकाई विधानसभा सीट की बात करेंगे। 
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पहले जानते है चकाई सीट के बारे में 
बिहार के 38 जिला में से एक जिला जमुई भी है। 21 फरवरी, 1991 को मुंगेर से अलग होकर जमुई जिले का गठन हुआ था। जमुई लोकसभा सीट में छह विधानसभा सीटें आती हैं। इसमें से चार विधानसभा सीटें सिकंदरा , जमुई, झाझा, चकाई जमुई जिले का हिस्सा हैं। वहीं, तारापुर सीट मुंगेर जिले और शेखपुरा सीट शेखपुरा जिले में आती है। चकाई विधानसभा सीट पर सबसे पहले 1962 में चुनाव हुआ था।  

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चकाई में रहा है दो परिवारों का दबदबा
चकाई विधानसभा सीट पर अब तक कुल 15 चुनाव हुए हैं। इनमें से 13 चुनाव में दो परिवारों के छह लोग विधायक बन चुके हैं। 1962 में जब पहली बार चकाई सीट पर चुनाव हुआ तब यह सीट एसटी आरक्षित थी। इसके बाद इसे समान्य सीट में बदल दिया गया। समान्य सीट होने के बाद 1967 में यहां से जमुई-बांका इलाके के बड़े राजपूत नेता श्रीकृष्ण सिंह जीते। इसके बाद से यहां से या तो श्रीकृष्ण सिंह और उनके परिवार के लोग जीतते रहे या फिर फाल्गुनी प्रसाद यादव और उनकी पत्नी को जीत मिली। सिर्फ 1972 में ये सिलसिला टूटा जब यहां से कांग्रेस के चंद्रशेखर सिंह जीते थे। चंद्रशेखर सिंह बाद में बिहार के मुख्यमंत्री भी बने। 

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1962 में लखन मुर्मू को मिली पहली जीत
1962 में चकाई सीट पर सबसे पहले चुनाव हुए। इस चुनाव में यहां से सोशलिस्ट पार्टी को जीत मिली थी। तब सोशलिस्ट पार्टी के लखन मुर्मू ने कांग्रेस के भागवत मुर्मू को 2,404 वोट से हरा दिया था। उस समय चकाई सीट एसटी आरक्षित थी।  

1967: श्रीकृष्ण सिंह को मिली जीत
1967 के विधानसभा चुनाव में चकाई से संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी ने जीत दर्ज की। एसएसपी के श्रीकृष्ण सिंह ने कांग्रेस के एम. मिश्रा को 6,674 वोट से हरा दिया। 1969 के चुनाव में भी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के श्रीकृष्ण सिंह को ही जीत मिली। उन्होंने कांग्रेस के सच्चिदानंद राय को 4,249 वोट से हरा दिया।

1972: कांग्रेस को मिली पहली जीत 
1972 के विधानसभा चुनाव में चकाई सीट पर कांग्रेस को पहली बार जीत मिली। कांग्रेस के चंद्रशेखर सिंह ने 22,280 वोट से जीत दर्ज की। चंद्रशेखर सिंह ने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के श्री कृष्ण सिंह को 12,697 वोट से हराया। यही चंद्रशेखर सिंह बाद में बिहार के मुख्यमंत्री भी बने।

1977: फाल्गुनी प्रसाद यादव को जीत
1977 के विधानसभा चुनाव में फाल्गुनी प्रसाद यादव निर्दलीय चुनाव लड़कर जीते। कभी भारतीय जनसंघ के टिकट पर हारे फाल्गुनी प्रसाद यादव ने जनता पार्टी के कुमार नरेंद्र प्रसाद सिंह को मात्र 95 वोट से हरा दिया था। तीसरे नंबर पर कांग्रेस के चंद्रशेखर सिंह रहे।  1972 में  चकाई से श्री कृष्ण सिंह को हार मिली थी। 1977 में उनके बेटे नरेंद्र प्रसाद सिंह को भी हार का सामना करना पड़ा। 

1980 के विधानसभा चुनाव में तत्कालीन विधायक फाल्गुनी प्रसाद यादव भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े। भाजपा के फाल्गुनी प्रसाद यादव ने जनता पार्टी के नरेंद्र कुमार सिंह को 8,374 वोट से हरा दिया। 

1985: लगातार दो हार के बाद नरेंद्र सिंह को मिली पहली जीत 
दो बार जनता पार्टी के टिकट पर हारने के बाद 1985 के विधानसभा चुनाव में नरेंद्र सिंह ने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा। पार्टी बदलने के साथ नरेंद्र सिंह की किस्मत भी बदली। इस बार उन्हें जीत मिली। नरेंद्र सिंह ने फाल्गुनी प्रसाद यादव को 33,128 वोट से हरा दिया। 

1990 के विधानसभा चुनाव में भी मुख्य मुकाबला नरेंद्र सिंह और फाल्गुनी प्रसाद के बीच ही हुआ। इस बार भी जीत नरेंद्र सिंह ने दर्ज की। इस बार नरेंद्र जनता दल के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे थे। उन्होंने भाजपा के फाल्गुनी प्रसाद यादव को 17,131 वोट से हरा दिया। 

1995: फाल्गुनी प्रसाद यादव ने की वापसी
1995 के विधानसभा चुनाव में फाल्गुनी प्रसाद यादव दो बार से लगातार जीत रहे जनता दल के नरेंद्र सिंह को 3,193 वोट से हरा दिया। भाजपा के फाल्गुनी प्रसाद यादव की चकाई सीट पर यह तीसरी जीत थी।  

2000: नरेंद्र सिंह ने लिया पिछली हार का बदला
2000 के विधानसभा चुनाव में नरेन्द्र सिंह निर्दलीय मैदान में उतरे। इस चुनाव में उन्होंने भाजपा के फाल्गुनी प्रसाद यादव को 30,471 वोट के बड़े अंतर से हराकर अपनी पिछली हार का बदला ले लिया। इसके साथ ही नरेंद्र सिंह ने चकाई में तीसरी जीत दर्ज कर फाल्गुनी यादव के रिकॉर्ड की बराबरी कर ली।  

2005: एक साल में दो चुनाव, दोनों खेमों को मिली एक-एक जीत 
2005 में बिहार में दो बार चुनाव हुए थे। एक चुनाव 2005 फरवरी में हुआ। इसके बाद अक्तूबर 2005 में भी नए सिरे से चुनाव हुए। फरवरी 2005 में हुए चुनाव में नरेंद्र सिंह के बेटे और लोक जनशक्ति पार्टी के उम्मीदवार अभय सिंह ने जीत दर्ज की। अभय सिंह ने भाजपा के फाल्गुनी यादव को  4,619 वोट से हराया। 

अक्तूबर 2005 के चुनाव में भाजपा के फाल्गुनी प्रसाद यादव ने चकाई सीट पर चौथी जीत दर्ज की। उन्होंने जेडीयू) के अर्जुन मंडल को 5683 वोट से हरा दिया था। इस चुनाव में नरेंद्र सिंह के बेटे अभय सिंह बगल की जमुई सीट से चुनाव लड़े और जीते।  

2010: श्री कृष्ण सिंह परिवार के एक और चेहरे को मिली जीत

2010 के विधानसभा चुनाव में चकाई सीट पर सुमित कुमार सिंह को जीत मिली। सुमित के दादा श्री कृष्ण दो बार और पिता नरेंद्र सिंह सीट से तीन बार विधायक रह चुके थे। सुमित के भाई अभय फरवरी 2005 में यहां से जीते थे। सुमित कुमार सिंह ने झारखंड मुक्ति मोर्चा के टिकट पर चुनाव लड़कर लोक जनशक्ति पार्टी के विजय कुमार सिंह को केवल 188 वोट से हरा दिया। 

2015: फाल्गुनी प्रसाद की पत्नी से हारे सुमित 

2015 के विधानसभा चुनाव में सुमित कुमार सिंह को हार मिली। उन्हें राजद की उम्मीदवार सवित्री देवी ने हराया। निर्दलीय चुनाव लड़ रहे सुमित कुमार सिंह को 12,113 वोट से हरा मिली। सावित्री देवी चार बार चकाई से जीते फाल्गुनी प्रसाद यादव की पत्नी हैं।

2020 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर सुमित सिंह और सावित्री देवी आमने-सामने थे। इस बार सुमित कुमार सिंह ने वापसी की। निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरे सुमित ने राजद की सावित्री देवी को महज 581 वोट से हरा दिया।

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