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Bharat Jodo Yatra: क्या बदलेगा दस्तूर? सिविल सोसायटी को इन दो जमातों में से चुननी पड़ी एक राह

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Fri, 09 Sep 2022 12:00 AM IST
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सार
Bharat Jodo Yatra: जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर डॉ. आनंद कुमार बताते हैं, समाजशास्त्र में राजनीतिक, सत्ता और आर्थिक तत्व जुड़े रहते हैं। लोगों को उम्मीद रहती है कि राजनीतिक दल तो फुल टाइम व्यवसाय की भांति हैं, वे लोगों को जागरूक करते हैं, उन्हें बदलाव की राह पर ले जाते हैं। अब दो दशकों से राजनीति में एक दोष आ गया है...
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Bharat Jodo Yatra: Prof Anand Kumar says, Civil society had to choose a path out of these two groups
Bharat Jodo Yatra: Rahul Gandhi with civil societies members - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

कांग्रेस पार्टी की 'भारत जोड़ो यात्रा' शुरू हो चुकी है। इस यात्रा की सफलता, यानी कांग्रेस पार्टी को इसका कितना फायदा मिलेगा, इस बाबत कयास लगाए जा रहे हैं। सवाल ये भी उठता है कि 'भारत जोड़ो यात्रा' से क्या दस्तूर बदलेगा। क्या राजनीतिक दलों और आम जनता के बीच की दूरी कम हो पाएगी। यात्रा में एक नई बात देखने को मिली है, वह है सिविल सोसायटी के करीब दो सौ सदस्यों द्वारा इस यात्रा को समर्थन देना। अभी तक ये सदस्य, जनहित के विभिन्न मुद्दों पर केंद्र एवं राज्यों सरकारों के खिलाफ आवाज उठाते रहे हैं। अब ऐसा क्या हो गया कि इन्हें 'सरकार के साथ, सरकार के खिलाफ', इन दो जमातों में से एक राह चुननी पड़ी। राजनीति एवं समाजशास्त्र के जानकार बताते हैं, एक 'डर' रहा है, जिसने सिविल सोसायटी को 'भारत जोड़ो यात्रा' के साथ खड़ा कर दिया।

देश में राजनीतिक लोगों का एक अलग 'वर्ग' बन गया है

जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर डॉ. आनंद कुमार, जिन्हें राजनीति एवं समाजशास्त्र का विशेषज्ञ कहा जाता है, उन्होंने 'मौजूदा परिस्थितियों' एवं 'भारत जोड़ो यात्रा' के संदर्भ में अमर उजाला डॉट कॉम के साथ विस्तृत बातचीत की है। योगेंद्र यादव, पी राजुगोपाल, गणेश देवी और एसपी दुबे कुमार सहित विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों ने भारत जोड़ो यात्रा को समर्थन दे दिया है। सिविल सोसायटी के अनेक सदस्य, यात्रा में शामिल भी हो रहे हैं। प्रो. आनंद कुमार बताते हैं, समाजशास्त्र में राजनीतिक, सत्ता और आर्थिक तत्व जुड़े रहते हैं। लोगों को उम्मीद रहती है कि राजनीतिक दल तो फुल टाइम व्यवसाय की भांति हैं, वे लोगों को जागरूक करते हैं, उन्हें बदलाव की राह पर ले जाते हैं। अब दो दशकों से राजनीति में एक दोष आ गया है। देश में राजनीतिक लोगों का एक अलग ही वर्ग बन गया है। उनकी अपनी जीवन शैली है और अपने ही नियम हैं। 1967 तक राजनीति का आधार 'सेवा' होता था। उसी मंत्र पर राजनीतिक दल और उनके नेता आगे बढ़ते थे। अब वह मंत्र बदल चुका है। उसकी जगह अब पैसे ने ले ली है।  

जनसाधारण से बढ़ती चली गई नए वर्ग की दूरी

राजनीति में अब पूरी तरह पैसे का बोलबाला है। पहले टिकट के लिए पैसा दो, फिर चुनाव में पैसा खर्च करो। कई जगहों पर वोटों के लिए पैसा देने के आरोप लगते रहे हैं। राजनेताओं के इस नए वर्ग ने जनसाधारण से दूरी बना ली है। पार्टी दफ्तर, अब घरों से चलने लगे हैं। एक नई संस्कृति, जिसे सत्ता संस्कृति कहा जाता है, आ चुकी है। इस नई संस्कृति में नागरिकों के लिए सरकार की आलोचना करना, एक जोखिम सा बनता जा रहा है। देश में दो ही जमात नजर आती हैं। उसमें आप 'सरकार के साथ हैं या खिलाफ हैं' इन्हीं में एक विकल्प चुनना है। दिक्कत ये है कि आम नागरिक, इनमें से किसी के साथ नहीं रहना चाहता। अगर वह बोलता है, तो उसे परेशानी झेलनी पड़ती है। अपने विरोधियों को पछाड़ने के लिए, ऐसे कदम जो पहले राजनीति में स्वीकार्य नहीं होते थे, आज चारों तरफ वही दिखाई दे रहे हैं। कांग्रेस पार्टी के शासन में भी ऐसा हुआ था। जवाहर लाल नेहरू ने कम्युनिस्टों को शांत कराने का प्रयास किया तो इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी में उन्हें बंद कर दिया था।

जो सुधार चाहते हैं, सरकार उन्हें बंद कर रही है

बतौर डॉ. आनंद कुमार, मौजूदा सरकार में तो सारी हदें ही पार हो गई हैं। जो लोग राजनीति व समाज में सुधार करना चाहते हैं, उन्हें बंद कर रही है। राजनीति में जो एक 'निर्दलीय' क्षेत्र का भाव रहता था, वह अब खत्म हो चला है। आपको या तो साथ रहना है या खिलाफ। यही वजह है कि राजनीतिक प्रबंधन के आलोचकों को अब राजनीतिक दलों की शरण लेनी पड़ रही है। पिछले 30 वर्ष में नेता, राजनीति के व्यवसायीकरण का शिकार हुए हैं। उन्हें बस राजनीति का आर्थिक आधार व वोट बैंक ही दिखाई पड़ता है। इन दलों ने नागरिक समाज से रिश्ता खत्म कर लिया है। ऐसे में सिविल सोसायटी के सदस्य या दूसरे संगठन अकेले पड़ रहे हैं। राजनीतिक दल अपने उस दोष के शिकार हैं, जिसमें वे वोट बैंक के बाहर कुछ देखना ही नहीं चाहते। राजनेताओं को जहां वोट दिखता है, वे उसी विषय में रूचि लेते हैं। नतीजा, आज राजनीतिक दलों को पुर्नजीवित करना पड़ रहा है। पहले, जीत गए तो सत्ता मिलती है, यह धारणा रहती थी। भाजपा ने उसे बदल दिया है। सत्ताधारी दल को परेशान करना शुरु कर दो, सरकार गिराने की कोशिश करना, ये सब आरंभ हो गया है। क्षेत्रीय दलों के साथ ऐसा ही कुछ हो रहा है। विरोधी दलों को सबक सिखाने के नए रास्ते खोजने पड़ रहे हैं।

Prof Anand Kumar
Prof Anand Kumar - फोटो : Amar Ujala (File Photo)

'भारत जोड़ो यात्रा' का फायदा मिलेगा

डांडी यात्रा के बारे में सभी जानते हैं। यात्रा, जो भी हो, उसका फायदा मिलता है। लोग अपने नेता को सुनने आते हैं। आज तो ट्वीट और हेलीकॉप्टर का जमाना है। नेता लोग इन्हीं का इस्तेमाल करते हैं। इसका दूसरा पक्ष है कि लोग ऐसे नेताओं से दूरी बना लेते हैं। 'भारत जोड़ो यात्रा' में तीन प्रमुख मुद्दे उठाए जा रहे हैं। देश में सांप्रदायिकता का माहौल, किसानों की सुनवाई नहीं और नौजवानों का भविष्य, ये मुद्दे प्रमुख हैं। कई क्षेत्रीय दल, जो ट्वीटर व हेलीकॉप्टर से राजनीति कर रहे थे, वे भी इस यात्रा के बाद जनता से जुड़ने का उपाय खोजते हुए नजर आएंगे। कहीं पर लोग महंगाई का हल, इस पर कुछ सुनना चाहते हैं, तो आंध्र प्रदेश व तेलंगाना जैसे राज्य में सांप्रदायिकता को लोग बड़ा मुद्दा मानते हैं। संभव है कि भारत जोड़ो यात्रा के बाद वे भी ऐसी ही कोई क्षेत्रीय यात्रा निकालने को मजबूर हो जाएं। गैर भाजपाई दल, चौ. देवीलाल के जन्मदिवस पर हरियाणा में पहुंचने की तैयारी कर रहे हैं। राजनीतिक दल, जाति का तानाबाना बुन कर वोटरों की घेराबंदी करते रहे हैं। आज, जनता उस घेरे को तोड़ रही है।  

इलेक्शन बॉन्ड का ज्यादातर पैसा भाजपा के खाते में क्यों

प्रो. आनंद कुमार बताते हैं कि आज इलेक्शन बॉन्ड का सत्तर फीसदी पैसा, भाजपा के खाते में ही क्यों आता है। देश के बाकी तीन दर्जन प्रमुख दलों के पास कम पैसा क्यों पहुंचता है। ये सब बातें, सिविल सोसायटी के लोगों को कोई एक विकल्प चुनने को मजबूर कर रही हैं। कांगेस की यात्रा का असर लोगों पर होगा। अकेला राजनीतिक दल या सिविल सोसायटी के सदस्य, भाजपा, आरएसएस, सीबीआई, ईडी व मीडिया, इन पांचों का मुकाबला नहीं कर सकते। नतीजा, विपक्षी दल अब साथ आ रहे हैं। लालू यादव, नीतीश कुमार, स्टालिन या ममता बनर्जी आदि नेताओं के क्षेत्रों में सिविल सोसायटी की साख का इस्तेमाल किया जाएगा। सिविल सोसायटी के पास इतना पैसा नहीं था कि वे अपने दम पर 'यात्रा' निकाल सकें। नतीजा, वे कांग्रेस के पास चले गए। सत्याग्रह व असहयोग कर चुके इन सदस्यों को अब चुनाव के तरीके समझने हैं। दरअसल, आज राजनीतिक दलों ने चुनाव को ही 'आरंभ व अंत' मान लिया है। कांग्रेस पार्टी, अपनी भारत जोड़ो यात्रा के जरिए, इस मिथक को तोड़ सकती है। हालांकि इस दिशा में कांग्रेस को ठोस सफलता, तभी मिलेगी, जब वह अपनी रणनीति में बदलाव लाएगी। उसे यात्रा के अलावा, क्षेत्रीय दलों को अपने साथ लाना होगा।

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