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Ayurved Education: आयुर्वेदिक डॉक्टर बनने के लिए क्या करें, कैसी होती है पढ़ाई और अब तक क्या-क्या बदला? जानें
Wed, 19 Oct 2022 07:39 PM IST
हिमांशु मिश्रा
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: हिमांशु मिश्रा
Updated Wed, 19 Oct 2022 07:39 PM IST
सार
केंद्रीय आयुष मंत्रालय और राष्ट्रीय आयुर्वेद विद्यापीठ के संयुक्त तत्वावधान में वेबीनार आयोजित किया गया। इसमें बतौर वक्ता नेशनल कमिशन फॉर इंडियन सिस्टम ऑफ मेडिसिन (NCISM) के अध्यक्ष वैद्य जयंत देव पुजारी ने शिरकत की।
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वैद्य जयंत देव पुजारी
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
दुनियाभर में आयुर्वेद ने अपनी अलग पहचान बना ली है। आज बड़े-बड़े देश भारत की इस प्राचीन चिकित्सा प्रणाली को अपना रहे हैं। यही कारण है कि अब युवाओं में भी आयुर्वेद शिक्षा को लेकर काफी उत्साह देखने को मिल रहा है। ये बातें बुधवार को केंद्रीय आयुष मंत्रालय और राष्ट्रीय आयुर्वेद विद्यापीठ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित वेबीनार से निकलकर सामने आई। 'आयुष शिक्षा क्षेत्र में बदलते रुझान' विषय पर आयोजित वेबीनार में बतौर वक्ता नेशनल कमिशन फॉर इंडियन सिस्टम ऑफ मेडिसिन (NCISM) के अध्यक्ष वैद्य जयंत देव पुजारी ने शिरकत की।
पिछले 47 साल से आयुर्वेद के क्षेत्र में काम कर रहे वैद्य जयंत देव ने आयुर्वेद और आयुष शिक्षा को लेकर कई बातें बताईं। उन्होंने आयुष की पढ़ाई और दाखिले की प्रक्रिया समझाई। ये भी बताया कि कैसे युवा इस क्षेत्र में अपना करियर बना सकते हैं। आइए जानते हैं...
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पिछले 47 साल से आयुर्वेद के क्षेत्र में काम कर रहे वैद्य जयंत देव ने आयुर्वेद और आयुष शिक्षा को लेकर कई बातें बताईं। उन्होंने आयुष की पढ़ाई और दाखिले की प्रक्रिया समझाई। ये भी बताया कि कैसे युवा इस क्षेत्र में अपना करियर बना सकते हैं। आइए जानते हैं...
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आयुर्वेद शिक्षा को लेकर ढांचा किस तरह का है?
इस सवाल का जवाब देते हुए वैद्य जयंत देव ने कहा, 'आयुर्वेद की शिक्षा बहुत व्यवस्थित तौर पर संचालित होती है। मौजूदा समय बैचलर ऑफ आयुर्वेद मेडिसिन एंड सर्जरी (बीएएमएस) के ग्रेजुएट लेवल का कोर्स साढ़े पांच साल का होता है। इसमें साढ़े चार साल की पढ़ाई और एक साल की इंटर्नशिप होता है। इसमें से छह महीना आयुर्वेद कॉलेज और बाकी छह महीने का इंटर्नशिप प्राइमरी हेल्थ सेंटर, जिला अस्पताल या अन्य किसी जगह होता है। इस कोर्स में नीट के जरिए एडमिशन मिलता है। नीट क्वालीफाई करने वाले छात्र ही आयुर्वेद की पढ़ाई करने के लिए आते हैं।'
जयंत ने आगे कहा, 'स्नातक के बाद अगर छात्र को एमडी या एमएस करना है, तो उसके लिए ऑल इंडिया पीजी एंट्रेंस टेस्ट देना होता है। ये पीजी एंट्रेंस टेस्ट एनटीए की तरफ से कराया जाता है। इसमें सिलेक्ट होने वाले छात्र परास्नातक की पढ़ाई कर सकते हैं। परास्नातक कोर्स तीन साल का होता है।'
उन्होंने परास्नातक के बाद पीएचडी के विकल्प के बारे में भी बताया। बोले, 'कई विश्वविद्यालयों में आयुर्वेद से पीएचडी करने की सुविधा भी है। इसके लिए विश्वविद्यालय अपने स्तर पर एंट्रेंस टेस्ट लेते हैं। विश्वविद्यालयों के मानकों पर खरे उतरने वाले छात्रों को पीएचडी में दाखिला मिल जाता है।'
इस सवाल का जवाब देते हुए वैद्य जयंत देव ने कहा, 'आयुर्वेद की शिक्षा बहुत व्यवस्थित तौर पर संचालित होती है। मौजूदा समय बैचलर ऑफ आयुर्वेद मेडिसिन एंड सर्जरी (बीएएमएस) के ग्रेजुएट लेवल का कोर्स साढ़े पांच साल का होता है। इसमें साढ़े चार साल की पढ़ाई और एक साल की इंटर्नशिप होता है। इसमें से छह महीना आयुर्वेद कॉलेज और बाकी छह महीने का इंटर्नशिप प्राइमरी हेल्थ सेंटर, जिला अस्पताल या अन्य किसी जगह होता है। इस कोर्स में नीट के जरिए एडमिशन मिलता है। नीट क्वालीफाई करने वाले छात्र ही आयुर्वेद की पढ़ाई करने के लिए आते हैं।'
जयंत ने आगे कहा, 'स्नातक के बाद अगर छात्र को एमडी या एमएस करना है, तो उसके लिए ऑल इंडिया पीजी एंट्रेंस टेस्ट देना होता है। ये पीजी एंट्रेंस टेस्ट एनटीए की तरफ से कराया जाता है। इसमें सिलेक्ट होने वाले छात्र परास्नातक की पढ़ाई कर सकते हैं। परास्नातक कोर्स तीन साल का होता है।'
उन्होंने परास्नातक के बाद पीएचडी के विकल्प के बारे में भी बताया। बोले, 'कई विश्वविद्यालयों में आयुर्वेद से पीएचडी करने की सुविधा भी है। इसके लिए विश्वविद्यालय अपने स्तर पर एंट्रेंस टेस्ट लेते हैं। विश्वविद्यालयों के मानकों पर खरे उतरने वाले छात्रों को पीएचडी में दाखिला मिल जाता है।'
किस तरह के छात्र लेते हैं दाखिला?
पहले आयुर्वेद में वही छात्र लेते थे, जिनकी नीट में कम रैंकिंग होती थी। उनमें से भी ज्यादातर छात्र आयुर्वेद पढ़ने की बजाय ड्रॉप कर देते थे। ऐसे में आयुर्वेद छात्रों की संख्या काफी कम होती थी। पिछले कुछ सालों में छात्रों की सोच में बदलाव आया है। अब बड़ी संख्या में वो छात्र भी आयुर्वेद की पढ़ाई करते हैं, जिनका एमबीबीएस में एडमिशन हो सकता था। वो एमबीबीएस की सीट छोड़कर बीएएमएस करने के लिए आ रहे हैं। इसके पीछे समाज में आया बदलाव भी है।
पहले आयुर्वेद में वही छात्र लेते थे, जिनकी नीट में कम रैंकिंग होती थी। उनमें से भी ज्यादातर छात्र आयुर्वेद पढ़ने की बजाय ड्रॉप कर देते थे। ऐसे में आयुर्वेद छात्रों की संख्या काफी कम होती थी। पिछले कुछ सालों में छात्रों की सोच में बदलाव आया है। अब बड़ी संख्या में वो छात्र भी आयुर्वेद की पढ़ाई करते हैं, जिनका एमबीबीएस में एडमिशन हो सकता था। वो एमबीबीएस की सीट छोड़कर बीएएमएस करने के लिए आ रहे हैं। इसके पीछे समाज में आया बदलाव भी है।
आयुर्वेद शिक्षा पद्धति में क्या-क्या बदलाव हुए?
आयुर्वेद शिक्षा पहले गुरुकुल पद्धति में चल रही थी, जो 1970 से विश्वविद्यालय की पद्धति में बदल गई है। उसी दौरान देश में पहला इंडियन मेडिसिन सेंट्रल काउंसिल एक्ट पारित हुआ था और सीसीआईएम का भी गठन हुआ। उसका मूल उद्देश्य आयुर्वेद की शिक्षा को एक बड़ा स्तर दिलाना था। समय-समय पर जब भी इसमें बदलाव की जरूरत महसूस हुई, किया गया। आयुर्वेद शिक्षा को एडवांस बनाने के उद्देश्य से ही 2020 में नेशनल कमिशन फॉर इंडियन सिस्टम ऑफ मेडिसिन की स्थापना हुई। इससे अब और आयुर्वेद की शिक्षा को मजबूती मिल रही है।
आयुर्वेद शिक्षा पहले गुरुकुल पद्धति में चल रही थी, जो 1970 से विश्वविद्यालय की पद्धति में बदल गई है। उसी दौरान देश में पहला इंडियन मेडिसिन सेंट्रल काउंसिल एक्ट पारित हुआ था और सीसीआईएम का भी गठन हुआ। उसका मूल उद्देश्य आयुर्वेद की शिक्षा को एक बड़ा स्तर दिलाना था। समय-समय पर जब भी इसमें बदलाव की जरूरत महसूस हुई, किया गया। आयुर्वेद शिक्षा को एडवांस बनाने के उद्देश्य से ही 2020 में नेशनल कमिशन फॉर इंडियन सिस्टम ऑफ मेडिसिन की स्थापना हुई। इससे अब और आयुर्वेद की शिक्षा को मजबूती मिल रही है।
छात्रों के सामने कौन-कौन सी समस्याएं आती हैं?
विद्यार्थियों से जुड़ी समस्या की बात करें तो ये नीट क्वालीफाई करके आते हैं। 12वीं तक की शिक्षा में इन्हें फिजिक्स, केमिस्ट्री, बायोलॉजी जैसे विषय पढ़ाए जाते हैं। लेकिन, आयुर्वेद में अध्ययन की अलग पद्धति है। इन सब विषयों से अलग यहां पढ़ाया जाता है। इससे वह छात्र अपनी 12वीं तक की पढ़ाई में कभी भी रूबरू नहीं होते हैं।
आयुर्वेद शिक्षा का मूल ग्रंथ संस्कृत में होता है। छात्रों को इसकी सही जानकारी नहीं होती है। छात्रों को आयुर्वेद के बारे में भी कम ही मालूम रहता है। ऐसे में यहां आने के बाद छात्रों को थोड़ी कठिनाई होती है। हालांकि, कुछ समय के बाद वह इसको समझ लेता है। छात्रों को ये समझाने के लिए अब आयुर्वेद शिक्षा में एक इंट्रोडक्ट्री कोर्स भी लागू किया गया है। ये कोर्स 15 दिन का होता है, जिसमें छात्रों को आयुर्वेद और इसकी शिक्षा से जुड़ी सारी जानकारी दी जाती है। जिससे बाद में छात्र को ज्यादा दिक्कत न हो।
विद्यार्थियों से जुड़ी समस्या की बात करें तो ये नीट क्वालीफाई करके आते हैं। 12वीं तक की शिक्षा में इन्हें फिजिक्स, केमिस्ट्री, बायोलॉजी जैसे विषय पढ़ाए जाते हैं। लेकिन, आयुर्वेद में अध्ययन की अलग पद्धति है। इन सब विषयों से अलग यहां पढ़ाया जाता है। इससे वह छात्र अपनी 12वीं तक की पढ़ाई में कभी भी रूबरू नहीं होते हैं।
आयुर्वेद शिक्षा का मूल ग्रंथ संस्कृत में होता है। छात्रों को इसकी सही जानकारी नहीं होती है। छात्रों को आयुर्वेद के बारे में भी कम ही मालूम रहता है। ऐसे में यहां आने के बाद छात्रों को थोड़ी कठिनाई होती है। हालांकि, कुछ समय के बाद वह इसको समझ लेता है। छात्रों को ये समझाने के लिए अब आयुर्वेद शिक्षा में एक इंट्रोडक्ट्री कोर्स भी लागू किया गया है। ये कोर्स 15 दिन का होता है, जिसमें छात्रों को आयुर्वेद और इसकी शिक्षा से जुड़ी सारी जानकारी दी जाती है। जिससे बाद में छात्र को ज्यादा दिक्कत न हो।
समस्याओं को खत्म करने के लिए क्या समाधान है?
आयुर्वेद की शिक्षा हमारी धरोहर है। पहले हमें ये गुरुकुल पद्धति में पढ़ाई जाती थी। अब हर साल नए छात्र एडमिशन हो रहे हैं। ऐसे में हमें इन छात्रों को संभालने के लिए तकनीक का भी सहारा लेना पड़ेगा। इसके लिए प्रत्येक अध्यापकों को तकनीक को आत्मसात करना पड़ेगा। अध्यापकों को इसकी ट्रेनिंग दी जाती है। पहले हमने इसके लिए बाहर से एजुकेशनिस्ट बुलाए थे, जिन्होंने हमारे कुछ अध्यापकों को ट्रेनिंग दी। अब ट्रेनिंग हासिल कर चुके वही अध्यापक दूसरों को ट्रेनिंग दे रहे हैं। शिक्षकों में इसको लेकर रूचि भी है।
अब हम चाहते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे शिक्षाविद तैयार हों, जो विषयों के विशेषज्ञ रहें। इसके लिए हम कोशिश कर रहे हैं। नई पद्धति के अनुसार ही अब पाठ्यक्रम भी बनाए जा रहे हैं। अभी जो पाठ्यक्रम तैयार हो रहे हैं, उन्हें 2030 को देखते हुए बनाया जा रहा है।
आयुर्वेद की शिक्षा हमारी धरोहर है। पहले हमें ये गुरुकुल पद्धति में पढ़ाई जाती थी। अब हर साल नए छात्र एडमिशन हो रहे हैं। ऐसे में हमें इन छात्रों को संभालने के लिए तकनीक का भी सहारा लेना पड़ेगा। इसके लिए प्रत्येक अध्यापकों को तकनीक को आत्मसात करना पड़ेगा। अध्यापकों को इसकी ट्रेनिंग दी जाती है। पहले हमने इसके लिए बाहर से एजुकेशनिस्ट बुलाए थे, जिन्होंने हमारे कुछ अध्यापकों को ट्रेनिंग दी। अब ट्रेनिंग हासिल कर चुके वही अध्यापक दूसरों को ट्रेनिंग दे रहे हैं। शिक्षकों में इसको लेकर रूचि भी है।
अब हम चाहते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे शिक्षाविद तैयार हों, जो विषयों के विशेषज्ञ रहें। इसके लिए हम कोशिश कर रहे हैं। नई पद्धति के अनुसार ही अब पाठ्यक्रम भी बनाए जा रहे हैं। अभी जो पाठ्यक्रम तैयार हो रहे हैं, उन्हें 2030 को देखते हुए बनाया जा रहा है।
नई शिक्षा नीति के हिसाब से कितना बदलाव हो रहा है?
आज तक जो पढ़ाया जाता था, वो डाडेक्टिक टीचिंग रहता था। मतलब क्लासरूम लेक्चर का समय ज्यादा था और प्रैक्टिकल का कम। अगर 200 घंटे क्लासरूम लेक्चर होते थे, तो 100 घंटे का प्रैक्टिकल होता था। अब इसमें बदलाव किया गया है। प्रैक्टिकल का दायरा भी अब लैब, क्लिनिक तक ही सीमित नहीं है। ग्रुप डिस्कशन, सवाल-जवाब जैसी कुछ अन्य चीजों को भी इसमें जोड़ा गया है। अब एक घंटा क्लासरूम लेक्चर होगा, तो करीब दो घंटे का प्रैक्टिकल होगा।
आज तक जो पढ़ाया जाता था, वो डाडेक्टिक टीचिंग रहता था। मतलब क्लासरूम लेक्चर का समय ज्यादा था और प्रैक्टिकल का कम। अगर 200 घंटे क्लासरूम लेक्चर होते थे, तो 100 घंटे का प्रैक्टिकल होता था। अब इसमें बदलाव किया गया है। प्रैक्टिकल का दायरा भी अब लैब, क्लिनिक तक ही सीमित नहीं है। ग्रुप डिस्कशन, सवाल-जवाब जैसी कुछ अन्य चीजों को भी इसमें जोड़ा गया है। अब एक घंटा क्लासरूम लेक्चर होगा, तो करीब दो घंटे का प्रैक्टिकल होगा।
शिक्षा का स्तर कैसे बढ़ेगा?
अब तक की शिक्षा बहुत मोनोटोनस रही है। इंजीनियर, वैद्य, वकील या डॉक्टर को दूसरे के क्षेत्र के बारे में बिल्कुल जानकारी नहीं होती थी। मसलन एक इंजीनियर को स्वास्थ्य के बारे में कुछ नहीं मालूम रहता था। इसी तरह आयुर्वेद का डॉक्टर है, तो उसे आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के प्रयोग के बारे में नहीं मालूम रहता था। अब इसमें बड़ा बदलाव लाया जा रहा है। अभी जो पाठ्यक्रम तैयार किए गए हैं, उसके दो हिस्से हैं। पहला मेन कोर्स है, जिसमें आयुर्वेद शिक्षा के बारे में पढ़ाया जाएगा और दूसरा इलेक्टिव होगा। इसमें इंजीनियरिंग, मेडिकल इंस्ट्रूमेंशन, आईटी, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, लीगल समेत कई तरह के विषय होते हैं। ये कोर्स 45 से 50 घंटे का होता है। छात्र कोई भी कोर्स इसमें से सिलेक्ट करके पढ़ सकता है। कोर्स कंप्लीट करने के बाद उसे सर्टिफिकेट मिलता है और इसका नंबर छात्र के मेन कोर्स में भी जुड़ता है। इससे शिक्षा का स्तर काफी तेजी से मजबूत होगा। हालांकि, शिक्षा का स्तर तभी पूरी तरह से बदलेगा, जब निचले स्तर तक ये पहुंचेगा।
अब तक की शिक्षा बहुत मोनोटोनस रही है। इंजीनियर, वैद्य, वकील या डॉक्टर को दूसरे के क्षेत्र के बारे में बिल्कुल जानकारी नहीं होती थी। मसलन एक इंजीनियर को स्वास्थ्य के बारे में कुछ नहीं मालूम रहता था। इसी तरह आयुर्वेद का डॉक्टर है, तो उसे आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के प्रयोग के बारे में नहीं मालूम रहता था। अब इसमें बड़ा बदलाव लाया जा रहा है। अभी जो पाठ्यक्रम तैयार किए गए हैं, उसके दो हिस्से हैं। पहला मेन कोर्स है, जिसमें आयुर्वेद शिक्षा के बारे में पढ़ाया जाएगा और दूसरा इलेक्टिव होगा। इसमें इंजीनियरिंग, मेडिकल इंस्ट्रूमेंशन, आईटी, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, लीगल समेत कई तरह के विषय होते हैं। ये कोर्स 45 से 50 घंटे का होता है। छात्र कोई भी कोर्स इसमें से सिलेक्ट करके पढ़ सकता है। कोर्स कंप्लीट करने के बाद उसे सर्टिफिकेट मिलता है और इसका नंबर छात्र के मेन कोर्स में भी जुड़ता है। इससे शिक्षा का स्तर काफी तेजी से मजबूत होगा। हालांकि, शिक्षा का स्तर तभी पूरी तरह से बदलेगा, जब निचले स्तर तक ये पहुंचेगा।
आयुर्वेद शिक्षा में कितना आधुनिकरण हुआ है?
समय-समय पर इसमें बदलाव होता रहा है। आधुनिकता समय और जरूरत के हिसाब से आती रही है। आयुर्वेद में भी ये आ चुकी है। अब उसे व्यवहार में कैसे लाया जाए, इसके लिए कोशिश की जा रही है। पहले नाड़ी परीक्षण होता था, अब उसका एक यंत्र बन चुका है। आईआईटी के एक छात्र ने इसके लिए डिवाइस बनाया है। मैं चाहूंगा कि वो सभी छात्र तक पहुंचे। इसी तरह एक आर्युजिनॉमिक्स बनाया गया है। इसमें आधुनिक शास्त्र से आयुर्वेद को सीधे जोड़ दिया जाता है। आयुर्वेद की बायोलॉजी सामान्य बायोलॉजी से अलग है। आयुर्वेद में आहार का महत्व है। ये सब अब आधुनिकता से जुड़ रही हैं।
समय-समय पर इसमें बदलाव होता रहा है। आधुनिकता समय और जरूरत के हिसाब से आती रही है। आयुर्वेद में भी ये आ चुकी है। अब उसे व्यवहार में कैसे लाया जाए, इसके लिए कोशिश की जा रही है। पहले नाड़ी परीक्षण होता था, अब उसका एक यंत्र बन चुका है। आईआईटी के एक छात्र ने इसके लिए डिवाइस बनाया है। मैं चाहूंगा कि वो सभी छात्र तक पहुंचे। इसी तरह एक आर्युजिनॉमिक्स बनाया गया है। इसमें आधुनिक शास्त्र से आयुर्वेद को सीधे जोड़ दिया जाता है। आयुर्वेद की बायोलॉजी सामान्य बायोलॉजी से अलग है। आयुर्वेद में आहार का महत्व है। ये सब अब आधुनिकता से जुड़ रही हैं।
आयुर्वेद में शोध को कैसे बढ़ावा दिया जाता है?
शोध के लिए तो अलग-अलग संस्थानें और वैज्ञानिक काम करते ही रहते हैं। हम आयुर्वेद शिक्षा में भी इसे ला रहे हैं। परास्नातक में छात्रों को शोध के बारे में पढ़ाया जाएगा कि कैसे रिसर्च करें और किए हुए रिसर्च को उपयोग में कैसे लाया जाता है? अब आयुर्वेद इंडस्ट्री काफी बढ़ चुकी है। इंडस्ट्री और एकेडमिक गठजोड़ होगा। छात्रों को इंडस्ट्री और इंडस्ट्री को शिक्षा और छात्रों से जोड़ा जाएगा।
शोध के लिए तो अलग-अलग संस्थानें और वैज्ञानिक काम करते ही रहते हैं। हम आयुर्वेद शिक्षा में भी इसे ला रहे हैं। परास्नातक में छात्रों को शोध के बारे में पढ़ाया जाएगा कि कैसे रिसर्च करें और किए हुए रिसर्च को उपयोग में कैसे लाया जाता है? अब आयुर्वेद इंडस्ट्री काफी बढ़ चुकी है। इंडस्ट्री और एकेडमिक गठजोड़ होगा। छात्रों को इंडस्ट्री और इंडस्ट्री को शिक्षा और छात्रों से जोड़ा जाएगा।
आयुर्वेद का भविष्य कैसा होगा?
अभी चिकित्सा को लेकर आने वाला खर्च एक बड़ी समस्या है। ये खर्च लगातार बढ़ता ही जा रहा है। अगर किसी को बड़ी बीमारी हो जाती है तो लोग अपने घर, जमीन बेचकर इलाज कराते हैं। इस खर्च को कम करने में आयुर्वेद बड़ी भूमिका निभा सकता है। हम सभी का इसपर फोकस है।
अभी चिकित्सा को लेकर आने वाला खर्च एक बड़ी समस्या है। ये खर्च लगातार बढ़ता ही जा रहा है। अगर किसी को बड़ी बीमारी हो जाती है तो लोग अपने घर, जमीन बेचकर इलाज कराते हैं। इस खर्च को कम करने में आयुर्वेद बड़ी भूमिका निभा सकता है। हम सभी का इसपर फोकस है।