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आंध्र-तेलंगाना अल्पसंख्यक आयोग तीन तलाक के खिलाफ

Mon, 26 Sep 2016 12:35 AM IST
एजेंसी/हैदराबाद
एजेंसी/हैदराबाद Updated Mon, 26 Sep 2016 12:35 AM IST
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Andhra telangana minority commission against three divorces

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना अल्पसंख्यक आयोग के प्रमुख ने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल बोर्ड से कहा है कि वह तीन तलाक के मसले पर अपना रुख बदले। आयोग ने यह भी दावा किया कि तीन तलाक का मसला ऐसा है, जिससे मुस्लिम पर्सनल लॉ की मान्यता कमजोर पडे़गी और इससे समान नागरिक संहिता को लागू करने को मजबूती मिलेगी। दोनों राज्यों के मानवाधिकार आयोग के प्रमुख आबिद रसूल खान ने कहा कि आज की तारीख में मुस्लिम समुदाय के सामने यह एक बड़ी सामाजिक समस्या है क्योंकि सही मायने में लाखों की संख्या में महिलाएं तलाक से पीड़ित है। 

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उनके आदमियों ने केवल तीन बार तलाक शब्द का इस्तेमाल कर उन्हें अलग कर दिया। खान ने कहा कि उन्होंने पर्सनल लॉ बोर्ड और जमियत-उलेमा-ए-हिंद को लिखा है कि पिछले तीन साल के उनके कार्यकाल में उन्होंने पाया है कि तमाम मुस्लिम महिलाएं उत्पीड़न, परित्याग, शारीरिक चोट, गुजारा भत्ता न मिलने जैसी समस्याओं से जूझ रही हैं। उन्होंने कहा कि वह सचेत करना चाहेंगे कि यदि बोर्ड तीन तलाक पर जोर देता है तो सही मायने में वह हमारी लाखों बहनों के साथ अन्याय कर रहा है और इस तरह वह सुप्रीम कोर्ट को मजबूर करेगा कि वह इस कानून को खारिज करे जो मानवाधिकार का हनन करता हो। 
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उन्होंने कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, इसे देखते हुए धार्मिक कानूनों को मान्यता तो है लेकिन अगर उससे मानवाधिकार का हनन होता है तो अदालत उसे खारिज कर देगी। सती रोकथाम कानून 1987 और हाल में हाजी अली दरगाह मामले में बांबे हाईकोर्ट का फैसला इसका ताजा उदाहरण है। उन्होंने कहा कि तीन तलाक के मसले पर भी ऐसा कदम संभव है। अगर ऐसा होता है तो मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड समान नागरिक संहिता को लागू करने के लिए जिम्मेदार होगा।  

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गैर इस्लामिक है पूरा मसला

Andhra telangana minority commission against three divorces

गैर इस्लामिक है पूरा मसला
खान ने कहा कि लाखों मुस्लिम महिलाएं तीन तलाक की पीड़ित हैं। उनके पतियों ने मामूली विवाद में या फिर एक महिला को कैसे तलाक दिया जाता है, इसकी जानकारी नहीं होने की वजह से ऐसा कर बैठे। आगे किसी तलाकशुदा महिला से शादी को भी निषेध कर दिया गया, जो गैर-इस्लामिक है। इस तरह एक युवा लड़की अपनी पूरी जिंदगी विधवा के रूप में जीने को मजबूर होती है। 

उन्होंने कहा कि इस्लाम में शादी को आसान और तलाक को कड़ा बनाने के पीछे का उद्देश्य सुलह कराना और शादी को बचाना है। लेकिन दुर्भाग्यवश इस देश में मुस्लिमों ने अपने ही नियम को दरकिनार कर शादी को बेहद खर्चीला बना दिया है। वे सारे खर्च दुलहन और उसके परिवार पर थोप देते हैं, जो इस्लाम का तरीका नहीं है। दूसरी तरफ मुस्लिम पुरुष ‘सुन्नाह’ का पालन करने की बजाय तलाक का दुरुपयोग कर रहे हैं। वे अपनी पत्नियों को सुलह का मौका दिए बिना उन्हें तलाक दे रहे हैं।

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