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Amar Ujala Batras: लंबे घंटे, थकी जिंदगी, क्या यही है तरक्की? भारत के वर्किंग कल्चर पर सवाल, देखें पॉडकास्ट
Sat, 20 Sep 2025 08:16 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Sat, 20 Sep 2025 08:16 PM IST
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अमर उजाला बतरस।
- फोटो : Amar Ujala
अमर उजाला बतरस एक और हफ्ते आम लोगों की जिंदगी से जुड़े अहम मुद्दे के साथ हाजिर है। इस हफ्ते पॉडकास्ट में चर्चा हुई भारत के वर्किंग कल्चर पर। दरअसल, भारत में मानसिक स्वास्थ्य की महत्ता को लेकर लंबे समय से बहस छिड़ी है, खासकर वर्कप्लेस में आने वाले दबाव और काम के बढ़ते घंटों को लेकर। ऐसे में कर्मचारियों और उनके परिवारों के सामने नई-नई चुनौतियां आ रही हैं। एंकर नंदिता कुदेशिया ने इस हफ्ते बतरस में इन्हीं चुनौतियों को लेकर दो विशेषज्ञों से बात की और जाना कि आखिर भारत में भारत का वर्किंग कल्चर कैसा है और इसके सुधारों के लिए क्या किया जा सकता है।
इस पूरे पॉडकास्ट को आप शनिवार रात आठ बजे अमर उजाला के सभी सोशल मीडिया हैंडल्स पर सुन सकते हैं।
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इस पूरे पॉडकास्ट को आप शनिवार रात आठ बजे अमर उजाला के सभी सोशल मीडिया हैंडल्स पर सुन सकते हैं।
नंदिता कुदेशिया ने अमर उजाला के स्टूडियो में जिन दो विशेषज्ञों से चर्चा की, उनमें जनसंपर्क और व्यापारिक रणनीति के विशेषज्ञ रोबिन्दर सचदेवा और मानव संसाधन के विशेषज्ञ सात्यकी भट्टाचार्जी शामिल रहे। दोनों ही विशेषज्ञों ने कई अहम सवालों के जवाब दिए। मसलन- भारत के वर्किंग कल्चर पर सवाल क्यों उठ रहे हैं? ज्यादा काम, कम सुकून, लंबे घंटे और थकान भरे चेहरे, क्या यही है विकास का रास्ता? भारत में काम ज्यादा और आराम कम है, इससे कामकाजी संतुलन कैसे बनेगा? इसके अलावा जब दुनिया काम के घंटे घटा रही है तो भारत क्यों बढ़ा रहा?
इतना ही नहीं विशेषज्ञों ने दूसरे देशों की तुलना में काम के घंटों का भारत से तुलनात्मक विश्लेषण भी किया। इसके अलावा फैमिली टाइम वाला कल्चर भारत में कंपनियां क्यों नहीं मानतीं। दोनों ने बताया कि भारत में ये बदलाव संभव है या नहीं और क्या भारत में कंपनियों को ध्यान में रख कर नियम ज्यादा बनते हैं। इसके अलावा मानसिक स्वास्थ्य काम से भी प्रभावित होता है ये कैसे तय होगा।
इतना ही नहीं विशेषज्ञों ने दूसरे देशों की तुलना में काम के घंटों का भारत से तुलनात्मक विश्लेषण भी किया। इसके अलावा फैमिली टाइम वाला कल्चर भारत में कंपनियां क्यों नहीं मानतीं। दोनों ने बताया कि भारत में ये बदलाव संभव है या नहीं और क्या भारत में कंपनियों को ध्यान में रख कर नियम ज्यादा बनते हैं। इसके अलावा मानसिक स्वास्थ्य काम से भी प्रभावित होता है ये कैसे तय होगा।